Karnataka Elections: भाजपा के लिए करो या मरो का चुनाव क्यों बन गया है कर्नाटक?

10 मई को होने वाले मतदान से पहले कर्नाटक में आज चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। भाजपा ने कर्नाटक जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कर्नाटक का चुनाव भाजपा के लिए करो या मरो का चुनाव क्यों बन गया है?

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Karnataka Elections: भाजपा के लिए वैसे तो सभी चुनाव अहम होते हैं लेकिन 10 मई को कर्नाटक में होने जा रहा विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए इनमें अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसका कारण यह है कि कर्नाटक का चुनाव परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक घटनाओं को व्यापक स्तर पर प्रभावित कर सकता है। कर्नाटक के साथ 2023 में पांच बड़े राज्यों में चुनाव होने हैं जिन्हें आम चुनाव से पहले का 'सेमीफाइनल' कहा जा रहा है। कर्नाटक चुनाव के कुछ महीनों बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और तेलंगाना में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कर्नाटक में पार्टी का प्रदर्शन न केवल दक्षिण में बल्कि उत्तर में भी उसकी विजय पताका लहराने में मदद करेगा।

कर्नाटक के इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बड़े दांव लगे हैं। भाजपा के लिए कर्नाटक एकमात्र दक्षिणी राज्य है जहां उसके पास लोकसभा और विधानसभा दोनों में अच्छी खासी सीटें हैं। राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से भाजपा के पास 25 सीटें हैं। मौजूदा विधानसभा में 224 सीटों में से भाजपा के पास 118 सीटें है। दक्षिण के छह राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी की 130 लोकसभा सीटों में भाजपा के पास कुल 29 सीटें हैं, जिनमें करीब 90 प्रतिशत कर्नाटक से हैं। इसलिए कर्नाटक में भाजपा की जीत पड़ोसी तेलंगाना में भाजपा की उम्मीदों को पर लगायेगी। 2024 के आम चुनाव में भाजपा दक्षिण की कुल सीटों की कम से कम आधी यानी 65 सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है। भाजपा इस बात को भी समझती है कि कर्नाटक में जीत उसको 2024 के आम चुनाव से पहले सकारात्मक रफ्तार और शक्ति देगी।

हालांकि भाजपा के लिए कर्नाटक में एक समस्या यह रही है कि पिछले 15 वर्षो में उसे राज्य में शासन करने के दो मौके मिल चुके हैं लेकिन पार्टी कभी भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। 2008 में भाजपा को सबसे ज्यादा 110 सीटें मिली थीं जो 224 सदस्यीय विधानसभा में साधारण बहुमत से तीन कम थी। भाजपा की सबसे बड़ी समस्या मुख्यमंत्री के स्थायित्व को लेकर भी रही। 2008 और 2013 के बीच भाजपा के तीन मुख्यमंत्री बने। येदियुरप्पा, डीवी सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टार। 2018 के चुनाव में भाजपा बहुमत से दूर रही, कांग्रेस जेडीएस की सरकार बनी। भाजपा ने कांग्रेस जेडीएस की सरकार में दलबदल करवाकर अपनी सरकार बनाई। लेकिन उसमें भी मुख्यमंत्री दो बनाए गए। येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई।

इस बार कर्नाटक के चुनाव अभियान में भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। लेकिन इस बात की संभावना है कि पार्टी जीतती है तो बोम्मई मुख्यमंत्री बने रहेंगे। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बोम्मई की छवि बौद्धिक नेता की रही है लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए वे जनता पर छाप छोड़नेवाले नेता की छवि नहीं बना सके हैं। इस बार लिंगायत मतों के भाजपा की मुठ्ठी से फिसलने की खबरों ने भी भाजपा को परेशान कर दिया है। सरकार बनाने के लिए भाजपा को लिंगायत के साथ साथ अन्य जातियों का समर्थन भी पाना होगा, जो आसान नहीं लग रहा है।

तटीय कर्नाटक में जहां हिजाब और हलाल विवाद रहा है, वहां भाजपा बेहतर है। बजरंग दल पर कांग्रेस के बैन की घोषणा को भाजपा पूरी तरह से भुनाना चाहती है। मोदी के साथ साथ पूरी भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया है, लेकिन यह कितना कारगर होगा यह चुनाव के बाद ही मालूम चलेगा। बहरहाल, मोदी का करिश्मा, जनता से सीधा नाता जोड़ने की उनकी काबिलियत और लगातार धुंआधार प्रचार करने के बाद भाजपा को उम्मीद है कि कर्नाटक में वह सरकार बचा लेगी।

भाजपा कर्नाटक में सरकार बनाकर विपक्ष के उन आरोपों का जवाब देना चाहती है कि भाजपा उत्तर भारत और हिंदी बोलने वाले राज्यों की पार्टी है। ऐसे में औद्योगिक तौर पर समृद्ध और अंतरराष्ट्रीय दबदबा रखने वाले कर्नाटक में सत्ता बरकरार रखना भाजपा के मिशन साउथ के लिए अहम है। कर्नाटक दक्षिण में तमिलनाडु के बाद दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के बाद देश की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। कर्नाटक धनबल की सुविधा उपलब्ध कराने वाला सूबा भी माना जाता है। अगर कर्नाटक में भाजपा हारती है तो इसका असर मोदी की लोकप्रियता में गिरावट के साथ इसका असर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के चुनाव पर भी पड़ेगा।

भाजपा जानती है कि कर्नाटक में अनोखा जातिगत समीकरण है। जिसमें दलितों, लिंगायतों और वोक्कलिग्गा का वर्चस्व है। अमित शाह, जेपी नड्डा और भाजपा के नेताओं ने प्रचार अभियान के दौरान 33 हिंदू मठों की परिक्रमा की। जिसमें से कुछ मठ दलितों के भी थे। कर्नाटक में नाथ संप्रदाय के अनुयायियों की अच्छी खासी तादात को देखते हुए यूपी के मुख्यमंत्री योगी को उनके पीछे लगाया। खबर है कि योगी ने 1400 साल पुराने आदि चुनचुनगिरी मठ के मठाधीश से फोन पर चर्चा की और उनसे समर्थन मांगा है।

भाजपा को इस बात का डर है कि 2018 की तुलना में इस बार कांग्रेस के पक्ष में थोड़ा भी वोट स्विंग हुआ तो इतने भर से कांग्रेस को बहुमत मिल जाएगा। आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं। पिछले चार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट मिले है। हालांकि सीटों की संख्या में कांग्रेस जरूर भाजपा से पिछड़ती रही। 2018 में कांग्रेस को 38.1 प्रतिशत मत मिले जो भाजपा से लगभग दो प्रतिशत अधिक थे। लेकिन भाजपा को 104 सीटें मिली और कांग्रेस को सिर्फ 80 सीटें मिली। 2008 में भी भाजपा को 33.9 प्रतिशत मत मिले थे और कांग्रेस को 34.8 प्रतिशत मत मिले थे। पर कांग्रेस की 80 सीटों की तुलना में भाजपा 110 सीटें जीतने में सफल रही थी। 2004 में भाजपा ने 28.3 प्रतिशत वोट के साथ 79 सीटें जीतीं वहीं कांग्रेस 35.3 प्रतिशत मत के साथ 65 सीटें ही जीत सकी थी।

कर्नाटक में भाजपा के कम वोट के बाद भी अधिक सीट जीतने का कारण यह रहा है कि उसका वोट शेयर मुख्यत: तीन संगठित क्षेत्रों तटवर्ती, मध्य और मुम्बई कर्नाटक से है। लेकिन कांग्रेस का वोटर पूरे राज्य में यत्र तत्र बिखरा हुआ है। भाजपा को यही डर है कि कांग्रेस के पक्ष में हल्का सा स्विंग होता है तो कांग्रेस को बहुमत मिल जाएगा।

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    कर्नाटक में कांग्रेस का आधार बहुवर्णी है। ऐसे में भाजपा से नाराजगी को देखते हुए कांग्रेस के प्रति वोट शिफ्ट की अपेक्षा की जा सकती है। मोदी और भाजपा इसी 4 प्रतिशत वोट शिफ्ट को कांग्रेस की ओर जाने से रोकने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। इसलिए पिछली बार जिन सीटों को मामूली अंतर से हारे थे, इस बार उसे जीतने की रणनीति पर काम कर रही है। वह इसमें कितना सफल हुए हैं, यह जानने के लिए 13 मई की प्रतीक्षा करनी होगी।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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