D.K. Shivakumar: मुख्यमंत्री की दावेदारी से पीछे कैसे हटे 'संकटमोचक' डीके शिवकुमार?
कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा करके कांग्रेस में धर्मसंकट पैदा करने वाले कांग्रेस के संकटमोचक डीके शिवकुमार अपने दावे से पीछे कैसे हटे? कौन था जिसकी बात मानकर पीछे हट गये?

D.K. Shivakumar: सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनेंगे, यह फैसला कांग्रेस नेतृत्व बहुत पहले ले चुका था, लेकिन डीके शिवकुमार इस फैसले पर पेंच फंसा देगे इसका अनुमान किसी को नहीं था। जब कर्नाटक का चुनाव परिणाम सामने आया, कांग्रेस अध्यक्ष मल्ल्किार्जुन खड़गे भी कर्नाटक में ही थे। उन्होंने जीत के बाद कर्नाटक जीत के शिल्पकार और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार का अपने आवास पर मुंह मीठा कराया। जब वो ऐसा कर रहे थे, उसी समय डीके ने मल्लिकार्जुन खड़गे से कह दिया था कि मेरे मुख्यमंत्री बनने के बाद आपको ही पहली बार मुंह मीठा कराना पड़ेगा। डीके का संदेश अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को साफ था कि वह मुख्यमंत्री पद से कम पर मानेंगे नहीं।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के तमाम मान मनौव्वल के बाद भी डीके टस से मस नहीं हुए और आखिरकार राहुल गांधी को मामले को अपने हाथ में लेना पड़ा। कांग्रेस के माथे पर तब बल पड़ गए जब डीके शिवकुमार ने राहुल गांधी से कहा कि आपका सम्मान करते हुए मैं कोई पद नहीं लूंगा और सिर्फ विधायक बनकर पार्टी के लिए काम करता रहूंगा। राहुल गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे। वो शिवकुमार की इस जिद के कारण कर्नाटक सरकार और 10 माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव पर पड़ने वाले असर को समझ रहे थे। उपमुख्यमंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष बने रहने के प्रस्ताव को डीके स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। बगावत होने की आशंका और मीडिया में कांग्रेस की हो रही फजीहत को देखते हुए राहुल गांधी ने अपनी मां सोनिया गांधी को डीके से बात करने के लिए कहा।
जब पूरी कांग्रेस डीके को समझाने में असमर्थ रही तब सोनिया गांधी ने मामला अपने हाथ में लिया। सोनिया गांधी इस समय हिमाचल में हैं इसलिए डीके से कहा गया कि वो मैडम से बुधवार देर रात वीडियो कांफ्रेसिंग से जुड़ें। पार्टी सूत्रों के मुताबिक वीडियो कांफ्रेसिंग से हुई बातचीत में सोनिया गांधी ने डीके से कहा 'मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है और कांग्रेस की स्थिति भी ठीक नहीं है। क्या आप दोनों को तकलीफ देना चाहते हो?' सोनिया से यह सुनते ही डीके ने सोनिया से हाथ जोड़कर कहा कि 'मैडम आप ऐसा न कहें। मेरे डीएनए में कांग्रेस हैं। मैं ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता।"
सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने डीके से कहा कि 'तुम मेरे लिए राहुल जैसे हो और मेरे सबसे भरोसेमंद हो। मेरे रहते तुमने यह कैसे सोच लिया कि तुम्हारे साथ पार्टी अन्याय करेगी। तुम्हारे लिए मुख्यमंत्री का पद महत्वपूर्ण है या मेरा और राहुल का भरोसा?' सोनिया से यह सुनते ही डीके भावुक होकर बोले 'मैडम आप के आदेश से बढ़कर कुछ भी नहीं। आप जैसा निर्णय लेंगी वैसा ही मुझे स्वीकार होगा।" तब सोनिया गांधी ने डीके से कहा कि 'आप यह सुनिश्चित करने में जुट जाओ कि लोकसभा में वही परिणाम आए जो विधानसभा में आए हैं। बाकी मुझ पर छोड़ दो।'
सोनिया गांधी से हुई इस बातचीत के बाद डीके शिवकुमार ने कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल को फोन कर कहा कि पार्टी जो निर्णय लेगी वह मुझे स्वीकार है। पार्टी आगे बढ़े। इस तरह किंगमेकर से न्यूजमेकर बने डीके शिवकुमार घटनाक्रम का दिल्ली में पटाक्षेप हो गया। लेकिन डीके के जीवन में यह पहला मौका नहीं था जब वो न्यूजमेकर बने हैं।
डीके शिवकुमार के माता पिता को शादी के चार साल बाद भी कोई संतान नहीं हुई थी। संतान न होने से परेशान डीके के माता पिता भगवान शिव के मंदिर शिवालधप्पा गए। वहां उन्होने बच्चे के लिए प्रार्थना और पूजा अर्चना की। इसके बाद उनके घर बेटे का जन्म हुआ। बच्चे का नाम उन्होंने शिवकुमार रखा। उनके गांव का नाम डोड्डालाहल्ली है, पिता का नाम केम्पेगौड़ा। इसलिए शिवकुमार का नाम हो गया डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार, यानी डीके शिवकुमार।
डीके शिवकुमार ने जब से होश संभाला तब से कांग्रेस के सिपाही बन गए। डीके 17 साल के थे तब कर्नाटक कांग्रेस के दिग्गज और कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री देवराज उर्स इंदिरा गांधी से अलग हो गए। देवराज उर्स के साथ कर्नाटक के ज्यादातर नेता चले गए। डीके के गांव की पूरी कांग्रेस देवराज उर्स के साथ थी लेकिन डीके अकेले इंदिरा कांग्रेस के साथ खड़े रहे। युवा डीके के जुझारूपन को देखते हुए इंदिरा कांग्रेस ने इस युवा को स्थानीय कांग्रेस की बागडोर सौंपी। डीके के संगठनात्मक कौशल से प्रभावित कांग्रेस ने युवा डीके शिवकुमार को 1985 के विधानसभा चुनाव में देवगौड़ा जैसे दिग्गज के सामने मैदान में उतार दिया। चार बार के विधायक और दो बार विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे एचडी देवगौड़ा इस चुनाव में दो सीटों होलानरसीपुर और साथनूर सीट से मैदान में थे। देवगौड़ा जैसे दिग्गज नेता के सामने बेहद युवा शिवकुमार ने जमकर चुनाव लड़ा और चुनाव को रोचक बना दिया। डीके शिवकुमार सिर्फ 15 हजार वोटों से हार गए।
चुनाव परिणाम के बाद देवगौड़ा ने डीके शिवकुमार को मिलने के लिए बुलाया और कहा कि 'तुम आज चुनाव जरूर हार गए हो लेकिन तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है।' बाद में देवगौड़ा ने साथनूर सीट छोड़ दी। यहां उपचुनाव हुए तो डीके शिवकुमार फिर मैदान में उतरे और जीत गए।
डीके के असली सियासी कैरियर की शुरुआत यहीं से हुई। इसके बाद फिर शिवकुमार साथनूर से जीते और एस. बंगारप्पा की सरकार में मंत्री बने। उस समय डीके सबसे युवा मंत्री थे। 1999 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को साथनूर से हराया था। डीके शिवकुमार लगातार 4 बार 1989, 1994, 1999 और 2004 में साथनूर से चुनाव जीते। मार्जिन हमेशा 40 हजार से ज्यादा ही रहा। 2008 से डीके कनकपुरा से चुनाव लड़ रहे हैं और अब तक कभी नहीं हारे। इस चुनाव में डीके शिवकुमार 1 लाख 22 हजार 392 वोटों से जीते। भाजपा ने अपने दिग्गज मंत्री आर अशोक को डीके के सामने चुनौती के रूप में उतारा था लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई। इस बार सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का रिकार्ड भी डीके के नाम रहा।
डीके ने अपनी सियासी रणनीति में माहिर होने का सबूत 2004 लोकसभा चुनाव में भी दिखाया था। डीके ने कनकपुरा लोकसभा सीट से बिना अनुभव वाली कांग्रेसी नेता तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिलवा दिया। कांग्रेस के नेता एचडी देवगौडा के सामने अनुभवहीन नेता को टिकट देना नहीं चाहते थे। लेकिन डीके अड़ गए। तेजस्विनी को टिकट मिला और चुनाव की कमान डीके ने संभाली। यह डीके की रणनीति ही थी कि तेजस्विनी ने देवगौड़ा को एक लाख से ज्यादा वोटों से हरा दिया।
इस जीत से डीके कर्नाटक के बड़े नेता के रूप में उभरे। उनकी साख इतनी मजबूत हो गई कि समर्थक उन्हें 'कनकपुरदे बंदे' यानी कनकपुरा की चट्टान बुलाने लगे। 2004 में मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा ने शिवकुमार को शहरी विकास मंत्री बनाया। यही दौर था जब डीके शिवकुमार ने अपनी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में तेजी से छलांग लगाई।
कांग्रेस जब भी संकट में फंसी डीके कांग्रेस के संकटमोचक बनकर उभरे। 2002 में महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख सरकार के संकट में फंसने पर डीके शिवकुमार अहमद पटेल के कहने पर महाराष्ट्र की सरकार बचाने के लिए सक्रिय हुए और कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस तथा निर्दलीय विधायकों को रातों रात मुम्बई से बैंगलोर ले उड़े थे। यह डीके ही थे जिसके कारण विलासराव देशमुख की सरकार बच गई थी।
2017 में डीके ने गुजरात राज्यसभा चुनाव में अपना कौशल दिखाया। सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव और करीबी रहे अहमद पटेल की राज्यसभा सीट दांव पर थी। सोनिया गांधी ने डीके शिवकुमार को सीधे फोन कर अहमद पटेल की मदद करने को कहा। यहां भी डीके शिवकुमार ने कांग्रेस के 44 विधायकों को चार्टर प्लेन से लाकर बेंगलुरू रिसोर्ट में रखा। डीके की रणनीति के कारण अहमद पटेल राज्यसभा का चुनाव जीत गए।
कांग्रेस के लिए हमेशा संकटमोचक की भूमिका निभाने वाले डीके शिवकुमार 2019 में खुद भी संकट में फंस गए थे जब मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी से जुड़े एक मामले में 3 सितंबर 2019 को ईडी ने लगातार 4 दिन की पूछताछ के बाद डीके को गिरफ्तार कर लिया। डीके करीब चार महीने जेल में रहे। इस दौरान सोनिया गांधी डीके से मिलने जेल गई। सोनिया ने डीके से जेल में कहा था कि पूरी कांग्रेस तुम्हारे साथ है, खुद को अकेला मत समझना। सोनिया के तिहाड़ जाकर डीके से मिलने से डीके बेहद भावुक हो गए थे। डीके ने जेल से सोनिया को वादा किया था कि वह कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनवाएंगे और 2023 में उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया।
कर्नाटक कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि 'डीके के पास जाति समूहों के किसी भी वर्ग में मज़बूत समर्थन का आधार नहीं है, लेकिन वह जानते हैं कि मुद्दों से कैसे निपटना है। उनके पास एक ऐसा व्यक्तित्व है जो उनके विरोधियों के बीच भय पैदा करता है। अपनी आर्थिक सम्पन्नता को वह राजनैतिक सम्पन्नता पर खर्च करने से नहीं चूकते। डीके के लिए कहा जा सकता है कि वह राजनीति से कमाते हैं और राजनीति पर खर्च करते है।
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बहरहाल, डीके भले ही मुख्यमंत्री नहीं बन सके लेकिन सोनिया गांधी के लिए दूसरे राहुल की हैसियत रखने वाले डीके शिवकुमार ही कर्नाटक सरकार के सुपर सीएम होंगे इसमें कोई दो राय नहीं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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