Karnataka Caste Equations: विकास पर भारी जाति की दावेदारी
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण मेें भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और जनता दल एस में एक बात समान रही। तीनों दलों ने टिकट वितरण में जातिगत समीकरणों को साधने का पूरा ख्याल रखा है।

Karnataka Caste Equations: देश के हर राज्य की तरह कर्नाटक में होने वाले चुनाव भी जातिगत प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। यह भारत में विकास की राजनीति पर जाति के दबदबे को बताता है। कर्नाटक की राजनीति में जो एक बात साफ दिख रही है वह यह कि सभी राजनैतिक दलों ने विधायकों के विकास के प्रमाण पत्र से ज्यादा जाति के प्रमाण पत्र को महत्व दिया है। सभी राजनीतिक दल इस बात पर एकमत हैं कि चुनावी हार जीत क्षेत्र में किए गए काम से नहीं जाति के समीकरणों से सधती है।
राजनीतिक दल जानते हैं कि जमीन पर विकास नहीं बल्कि जाति का सिक्का चलता है इसलिए सभी दलों ने अपने जातीय समीकरण के अनुसार टिकट वितरण किया है। भाजपा ने लिंगायतों को टिकट बंटवारे में सबसे ज्यादा महत्व दिया है, लेकिन एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। वही कांग्रेस ने लिंगायतों, वोक्कलिग्गा, दलित और अल्पसंख्यकों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर सभी वर्गों को साधने की कोशिश की है। जनता दल सेकुलर ने अपने कोर वोटर वोक्कलिग्गा पर ज्यादा ध्यान दिया है।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने सबसे ज्यादा टिकट लिंगायत और फिर वोक्कालिगा समुदाय को दिए हैं, जबकि जेडीएस ने वोक्कालिग्गा को सबसे अधिक टिकट दिए हैं। कांग्रेस ने 15 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं और जेडीएस ने 20 मुस्लिम नेताओं को टिकट दिए है।
कर्नाटक में करीब 17% मतदाता लिंगायत समुदाय के हैं जिन पर भाजपा की मजबूत पकड़ रही है। इसलिए इस बार भी भाजपा ने सबसे अधिक लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट दिया है। उसके 30 प्रतिशत उम्मीदवार लिंगायत समुदाय से हैं। लिंगायत समुदाय का मुख्य मठ सिद्धगंगा है, जो तुमकुर में स्थित है। इसके अलावा प्रदेश में लिंगायतों के 400 से ज्यादा मठ हैं। भाजपा के दिग्गज लिंगायत नेता येदियुरप्पा और गृह मंत्री अमित शाह ने इन सभी मठ प्रमुखों से लगातार संपर्क रखकर इन्हें भाजपा के साथ बनाए रखने की हरसंभव कोशिश की है।
भाजपा के दिग्गज लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी द्वारा भाजपा छोड़ कांग्रेस का हाथ पकड़ने के बाद कांग्रेस को उम्मीद है कि इस चुनाव में लिंगायत वोटर का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ आ सकता है। इसी कारण कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 23% टिकट लिंगायत नेताओं को और उसके बाद 20% वोक्कालिग्गा समुदाय के नेताओं को दिये हैं। बीजेपी ने लिंगायत समुदाय के 68 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस के 51 और जेडीएस के 23 उम्मीदवार लिंगायत समाज से हैं। वोक्कालिग्गा की बात करें तो इस समुदाय से बीजेपी के 42 उम्मीदवार, कांग्रेस के 45 और जेडीएस के 47 उम्मीदवार मैदान में हैं। जेडीएस का सबसे बड़ा आंकड़ा इसी समुदाय का है।
वोक्कलिग्गा समुदाय जेडीएस का परंपरागत वोटर रहा है और इसी को ध्यान में रखते हुए जेडीएस ने सबसे ज़्यादा टिकट वोक्कालिग्गा समुदाय को दिए हैं। बीजेपी ने यूपी, गुजरात की तरह कर्नाटक में भी किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस ने 13% मुस्लिम आबादी वाले कर्नाटक में 7% टिकट मुसलमानों को दिए हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने लिंगायत प्रभाव वाली सीटों में से 47 सीटें जीती थीं और लिंगायत समुदाय के 42.5% वोट हासिल किए थे। कांग्रेस को 25 सीटें और 38.6% वोट मिले थे। जेडीएस ने लिंगायत प्रभाव वाली 5 सीटें जीती थीं और 10.6% वोट हासिल किए थे।
इसी तरह दूसरे बड़े वोट बैंक वोक्कालिंगा समुदाय पर जेडीएस का दबदबा है जो राज्य में 12 से 13 प्रतिशत हैं। इनके समर्थन से पिछले चुनाव में जेडीएस के 22 विधायक इसी समुदाय से चुनकर आए थे। भाजपा के वोक्कलिग्गा विधायकों की संख्या 12 और कांग्रेस के वोक्कलिग्गा विधायकों की संख्या 10 थी। जनता दल एस प्रमुख देवगोड़ा इसी वोक्कलिग्गा समुदाय से आते हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी वोक्कलिंगा समुदाय से ही आते हैं। कांग्रेस की सरकार आने पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बन सकते हैं इस कारण कांग्रेस को उम्मीद है कि वोक्कलिग्गा समुदाय का एक बड़ा वर्ग जनता दल एस की बजाय कांग्रेस को वोट कर सकता है। भाजपा अगर सरकार बरकरार रखना चाहती है तो उसे लिंगायत के साथ साथ वोक्कलिग्गा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अपने साथ लाना होगा।
राज्य में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 17 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 7 प्रतिशत है। इसी अनुपात में इन वर्गों के लिए 51 सीटें आरक्षित की गयी हैं। इनका आखिरी परीसीमन 2008 में किया गया था। इस परिसीमन के विश्लेषण से पता चलता है कि जिस पार्टी ने सबसे अधिक आरक्षित सीटें जीतीं, उसी ने कर्नाटक में हमेशा सरकार बनाई है। कर्नाटक में 51 सीटों में से 15 अनुसूचित जनजाति (एसटी) और 36 अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हैं। अनुसूचित जाति के बीजेपी ने 38, कांग्रेस ने 36 और जेडीएस ने 31 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। अनुसूचित जनजाति समुदाय से बीजेपी के 17, कांग्रेस के 16 और जेडीएस के 17 प्रत्याशी हैं।
2008 में जब बीएस येदियुरप्पा ने बीजेपी का नेतृत्व किया, तो भगवा पार्टी ने आरक्षित 51 में से 29 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं। 2013 में सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार सत्ता में आई। तब कांग्रेस ने कुल आरक्षित सीटों में से 27 सीटें जीती थीं, वहीं बीजेपी को महज 8 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। 2018 में कांग्रेस की 8 सीटें कम हो गईं और पार्टी ने महज 19 सीटें जीतीं। 2018 में बीजेपी की सीटों की संख्या सुधरी और यह 23 पर पहुंच गई।
कर्नाटक में कास्ट फैक्टर में दलितों का भी बड़ा रोल है। ऐसे में कोई भी दल दलित मतदाताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दलित हैं और कर्नाटक के पुराने नेता हैं। कांग्रेस कर्नाटक में इस बात को भुनाने की हरसंभव कोशिश कर रही है कि कांग्रेस ने कर्नाटक से आने वाले दलित को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है, ऐसे में दलित कांग्रेस को वोट देकर मल्लिकार्जुन खड़गे का हाथ मजबूत करें। हालांकि दलितों में भाजपा ने पिछले कुछ सालों में अच्छी पैठ बनाई है। ऐसे में इस बार दलित कहां जाते हैं, यह देखना होगा। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कारण कांग्रेस को कुरबा जाति के वोट से बड़ी उम्मीदे हैं। सिद्धारमैया कुरबा जाति के हैं जो प्रदेश में 7 प्रतिशत हैं।
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जातिगत दबदबे से भरी कर्नाटक की राजनीति में कौन सी जाति किस दल को कितना वोट देती है, इसे देखने के लिए 13 मई तक इंतजार करना होगा। लेकिन यह सही है कि कोई भी दल किसी भी जाति का वोट छोड़ना नहीं चाहता। सभी दल सभी जातियों को साथ लाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। कौनसा दल इस प्रयास में सफल होता है, यह चुनाव परिणाम आने पर ही पता चलेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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