Kamal Nath: कमलनाथ-भाजपा के कयासी गठबंधन का लाभ-हानि
Kamal Nath: इंदिरा गांधी का तीसरा बेटा 'हाथ का साथ' छोड़कर 'कमलदल' में नहीं जाएगा। तमाम अफवाहों और अटकलों के बीच उन्होंने राहुल गांधी की यात्रा में जाने का संकेत दिया है लेकिन उनके नाम पर जो सियासी प्रहसन हुआ क्या वह अनायास था?
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और कमलनाथ के खास समर्थक पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने मीडिया से बात करके यह स्पष्ट कर दिया है कि कमलनाथ कांग्रेस छोड़कर कहीं नहीं जा रहे हैं। हालांकि स्पष्टता कमलनाथ की ओर से आती तो अच्छा होता क्योंकि 20 फरवरी को प्रदेश प्रभारी जितेंद्र सिंह के भोपाल दौरे के जो होर्डिंग शहर में लगे हैं उनमें से कमलनाथ गायब हैं जो अभी भी पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को संदेहास्पद बनाते हैं।

कमलनाथ अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से नाराज हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। दरअसल, विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार की जिम्मेदारी उनके ऊपर मढ़ दी गई जिसके बाद उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को चुनावी खर्चे का लंबा-चौड़ा परचा भेज दिया।
इसके अलावा जब वे विदेश में थे तो उनकी सहमति के बिना ही राहुल गांधी समर्थक जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी नहीं बनाए गए। यहां तक कि ग्वालियर सीट से लगातार चार बार लोकसभा चुनाव हार चुके दिग्विजय सिंह के कट्टर समर्थक डॉ. अशोक सिंह को राज्यसभा की एकलौती सीट का टिकट मिलना भी कमलनाथ को गवारा नहीं हो रहा।
वहीं नकुल नाथ ने एलान कर दिया है कि छिंदवाड़ा से वो ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि किस पार्टी से लड़ेंगे, यह उन्होंने नहीं कहा जिसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि कमलनाथ अपने समर्थक कुनबे के साथ भाजपा में शामिल हो सकते हैं। ऊपर से उनके कुछ खास समर्थकों ने सोशल मीडिया के माध्यम से बगावती बयानों की झड़ी लगाते हुए इस पूरे प्रकरण को जटिल बना दिया।
मध्य प्रदेश भाजपा संगठन कमलनाथ और उनके समर्थकों को अपनाने को तैयार नहीं है किंतु वह खुलकर कुछ कहने से बच रहा है और उसकी नजर दिल्ली की ओर है। सीधा-सपाट बोलने से तो कमलनाथ भी बच रहे हैं क्योंकि उनकी भाजपा में आमद इतनी आसान नहीं है। तो क्या कमलनाथ मीडिया के बनाए माहौल से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर कोई दबाव बना रहे हैं या वास्तव में उनकी भाजपा में आमद को लेकर चल रही प्रतिक्रियाओं को मीडिया के माध्यम से समझने का प्रयास हो रहा है?
यह भी संभव है कि यह पूरा प्रपंच कमलनाथ की ओर से रचा गया हो जिसमें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की मूक सहमति हो। कमलनाथ-भाजपा का कयासी गठबंधन लाभ-हानि की कसौटी पर तोला जा रहा है। इस बीच इंदौर, देवास और उज्जैन के कई कांग्रेसी नेताओं ने कमलनाथ गुट के कांग्रेसी नेताओं के पुतले तक बनवाकर रख लिए हैं कि वे भाजपा में शामिल हों और पुतले जलाकर उनका विरोध किया जा सके। हालांकि वे अब तक मायूस हैं क्योंकि भोपाल से दिल्ली तक कुछ भी स्पष्टता से नहीं कहा जा रहा।
1997 को छोड़कर अब तक अजेय रहा है कमलनाथ का दुर्ग
कानपुर में जन्में कमलनाथ की दून स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई संजय गांधी से दोस्ती इतनी प्रगाढ़ होती गई कि 1980 के लोकसभा चुनाव के दौरान छिंदवाड़ा से चुनाव लड़ रहे कमलनाथ के चुनाव प्रचार में आईं इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा कह दिया। वे चुनाव जीत गए और 1985, 1989, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने छिंदवाड़ा का प्रतिनिधित्व किया।
हालांकि हवाला कांड में नाम आने के कारण 1996 में उनकी पत्नी अलका नाथ ने छिंदवाड़ा से चुनाव जीता किंतु लुटियंस में बड़े बंगले की चाह ने कमलनाथ से वो करवा दिया जिसकी अपेक्षा किसी को नहीं थी। उन्होंने अपनी पत्नी से संसद सदस्यता से त्यागपत्र दिलवाया और 1997 उपचुनाव में स्वयं चुनाव लड़ने खड़े हुए किंतु इस बार भाजपा ने भी दिग्गज नेता सुंदरलाल पटवा को कमलनाथ के सामने खड़ा किया और अप्रत्याशित रूप से कमलनाथ की हार हुई।
एक वर्ष बाद हुए लोकसभा चुनाव में कमलनाथ पुनः विजयी हुए किंतु उनकी 50 वर्षों से अधिक की राजनीतिक यात्रा में 1997 की हार काला धब्बा है जिसका उन्हें हमेशा मलाल रहता है। अपने कुशल नेतृत्व, संगठन कौशल एवं लोकप्रियता के दम पर कमलनाथ ने छिंदवाड़ा को कांग्रेस का अजेय दुर्ग बना दिया है।
2019 में प्रचंड मोदी लहर के बाद भी उनके पुत्र नकुल नाथ चुनाव जीते। वर्तमान में छिंदवाड़ा लोकसभा के अंतर्गत आने वाली सातों विधानसभा सीटों पर भी उनके समर्थक कांग्रेसी विधायक हैं और भाजपा हमेशा की भांति खाली हाथ है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रदेश भाजपा संगठन ने छिंदवाड़ा को लेकर जो आक्रामक चुनावी रणनीति बनाई है, उससे नाथ परिवार सहमा जरूर है।
क्या वास्तव में कमलनाथ और भाजपा को एक-दूसरे की आवश्यकता है?
कमलनाथ भाजपा में शामिल होंगे या नहीं यह संशय बरकरार है किंतु यहां सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या वास्तव में कमलनाथ को भाजपा की और भाजपा को कमलनाथ की आवश्यकता है। वह भी ऐसे दौर में जबकि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर की लहर पर सवार होकर 'अबकी बार 400 पार' के नारे लगा रहे हैं और मध्य प्रदेश विधानसभा में भी भाजपा को प्रचंड बहुमत प्राप्त है। हालांकि कमलनाथ के भाजपा प्रवेश के आड़े वे नेता भी हैं जिनका व्यवसायिक एवं राजनीतिक हित उनके कांग्रेस में रहने से सधता है।
1984 के सिख विरोधी दंगे में कमलनाथ की भूमिका संदिग्ध है और मात्र छिंदवाड़ा सीट कब्जाने के लिए पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाले सिख समुदाय को भाजपा शायद ही नाराज करे। हां, यदि कमलनाथ सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लें और बेटे नकुल नाथ सहित उनके समर्थक भाजपा में शामिल हों तो इसका सिख समुदाय पर संभवतः बड़ा नकारात्मक असर न हो।
कमलनाथ को किसी राज्य का राज्यपाल बनाकर सम्मानजनक राजनीतिक विदाई की सौगात दी जा सकती है। वहीं 'भाजपाई' होकर कमलनाथ अपने भांजे रतुल पुरी के ऊपर चल रही ईडी-सीबीआई की जांच की धार को कुंद करने का प्रयास करना चाहते होंगे।
भाजपा इस बात पर अवश्य खुश हो सकती है कि यदि नकुलनाथ भी अपने समर्थकों के साथ पार्टी में शामिल होते हैं तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस संगठन तहस-नहस हो जाएगा जिसका संदेश देशभर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच उनके अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित करेगा।
आने वाले कुछ दिन भाजपा सहित कमलनाथ और मध्य प्रदेश कांग्रेस के लिए राजनीतिक उठापटक वाले होंगे। भाजपा अगर आमचुनाव से पहले नकुलनाथ को साथ लाकर मध्य प्रदेश में अपने आपको अजेय बनाने की कोशिश करेगी तो वहीं कांग्रेस के राहुल दरबार में भी शायद कमलनाथ की आवाज सुनी जाए। परिस्थिति जो भी हो, इस सियासी अफवाह से फायदे में कमलनाथ ही रहनेवाले हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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