Judicial Overreach: न्यायपालिका द्वारा अब चुनाव आयोग पर नियंत्रण की कोशिश

सुप्रीमकोर्ट के कई फैसलों और टिप्पणियों को देख कर लगता है कि भारत की न्यायपालिका धीरे धीरे लोकतंत्र के अन्य घटकों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और कार्यपालिका को संचालित करने की कोशिश की है, कई बार तो विधायिका को भी संचालित करने की कोशिश की है। अटार्नी जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को कई बार अदालत में कहना पड़ता है कि यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है, इसके बावजूद अदालतें सरकारों को निर्देश देती रहती हैं।
यह प्रवृति लोकतंत्र के लिए घातक है, लेकिन राजनीतिक विद्वेष के चलते राजनीति दल एकजुट होकर विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं। विधायिका और कार्यपालिका पर न्यायपालिका के हावी होने की स्थिति 1993 और 1998 के उन दो फैसलों से पैदा हुई है, जिनमें सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से न्यायधीशों की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोकतंत्र के तीन मजबूत स्तंभ हैं। विधायिका का चयन जनता द्वारा वोट देकर किया जाता है, कार्यपालिका का चयन यूपीएससी परीक्षाओं के माध्यम से एक तय चयन प्रक्रिया के अंतर्गत होता है, जिसमें सरकार का दखल नहीं होता। लेकिन सुप्रीमकोर्ट के उपरोक्त दो फैसलों से सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्टों के जजों की नियुक्ति का अधिकार खुद सुप्रीमकोर्ट ने अपने हाथ में ले लिया है, इस तरह न्यायपालिका लोकतंत्र पर हावी हो गई है।
सरकार ने न्यायपालिका में भी कार्यपालिका की तरह चयन व्यवस्था कायम करने के लिए 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने का क़ानून पास किया था। यह क़ानून सर्वसम्मति से पास हुआ था। जिसमें व्यवस्था की गई थी कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के छह सदस्य होंगे, वे सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्टों के जजों की नियुक्ति का फैसला करेंगे, इनमें चीफ जस्टिस को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था, सुप्रीमकोर्ट के दो अन्य जजों को भी आयोग का सदस्य बनाया गया था।
इसके अलावा चौथे सदस्य क़ानून मंत्री होंते और दो अन्य सदस्य देश की दो प्रमुख हस्तियाँ होतीं, जिनका चयन प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस और लोकसभा में सबसे बड़े दल का नेता मिल कर करते, समन्वय और संयोजन काम विधि सचिव करते, दो सदस्यों के चयन में विधि सचिव की कोई भूमिका नहीं होती।
पहली ही नजर में यह व्यवस्था पारदर्शी लगती है, लेकिन पांच जजों जस्टिस जे.एस. केहर, जस्टिस जे. चलमेश्वर, जस्टिस मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ और ए.के. गोयल ने संसद से पारित क़ानून को 16 अक्टूबर 2015 को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया। जजों को क़ानून मंत्री को शामिल करने और प्रमुख हस्तियों को चीफ जस्टिस के बराबर बिठाने पर एतराज था।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग सुप्रीमकोर्ट की कोलिजियम प्रणाली की जगह लेता, जिसमें सुप्रीमकोर्ट के पांच वरिष्ठ जजों ने हाईकोर्टों और सुप्रीमकोर्ट के जजों की नियुक्ति का अधिकार सरकार से छीन कर अपने हाथ में लिया हुआ है।
क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के कोलिजियम सिस्टम को खत्म करने का मामला था, इसलिए सिर्फ सात महीनों में सुप्रीमकोर्ट ने अपने हक में फैसला कर लिया था, जबकि आम आदमी के मुकद्दमें दशकों तक लटके रहते हैं। हालांकि इस फैसले में कहा तो यह गया था कि संविधान के 99वें संशोधन से राष्ट्रपति का अधिकार छीन लिया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कोलिजियम सिस्टम ने सरकार और राष्ट्रपति दोनों को पंगु बना दिया है। इस के बाद से तो लगातार ऐसे फैसले आ रहे हैं, जिन पर सामान्य नागरिक भी सवाल उठा रहे हैं।
सुप्रीमकोर्ट तब से न्यायपालिका से अतिरिक्त कार्यपालिका के क्षेत्र में आने वाली नियुक्तियों और स्वायत संस्थाओं की नियुक्तियों में दखल देने की कोशिश कर रही है, और उन नियुक्तियों में भी न्यापालिका का हिस्सा मान रही है।
पहला उदाहरण तब सामने आया था, जब पहले पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट और फिर सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्यों के सूचना आयोगों में मुख्य सूचना आयुक्त के पदों पर रिटायर्ड जजों को नियुक्त किया जाए। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने सुप्रीमकोर्ट का यह निर्देश मानने से इनकार कर दिया। क्योंकि यह संसद की ओर से पारित क़ानून में तय नियुक्ति की व्यवस्था का उलंघन था, जिसमें प्रधानमंत्री/ मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ लोकसभा/विधानसभा स्पीकर से बनी कमेटी सूचना आयुक्तों और मुख्य सूचना आयुक्त का चयन करती है।
हालांकि इस क़ानून का भी बेजा इस्तेमाल हो रहा है, सुप्रीमकोर्ट चाहती तो इसमें सुधार कर सकती थी, लेकिन खुद पद हथियाने के चक्कर में सुप्रीमकोर्ट और कार्यपालिका में ठन गई, इसमें सरकार ने कार्यपालिका का साथ दिया और न्यायपालिका मुख्य सूचना आयुक्त का पद हथियाने में नाकाम रही।
मुख्य सूचना आयुक्त पद की नियुक्ति के क़ानून में कोई खामी नहीं है, लेकिन अपने प्रभाव के चलते कार्यपालिका ने मुख्मन्त्रियों से सांठगाँठ कर के सारे देश के सभी राज्यों में यह पद अवैध तरीके से हथियाया हुआ है, यहाँ तक कि केंद्र भी इससे अछूता नहीं है।
क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, फिर भी हर राज्य में रिटायर होने वाला मुख्य सचिव ही मुख्य सूचना आयुक्त बनता है, ज्यादातर सूचना आयुक्त भी रिटायर्ड आईएएस बनते हैं, क्योंकि रिटायर होने से पहले वे मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता के अवैध काम करके उन्हें अपने पक्ष में कर लेते हैं। इन पदों पर रिटायर्ड सरकारी अफसरों की नियुक्ति प्रतिबंधित होनी चाहिए, क्योंकि यही अफसर तो पारदर्शिता के खिलाफ होते हैं।
बीच में सुप्रीमकोर्ट ने एक बार मुख्य चुनाव आयुक्त का पद हथियाने की भी कोशिश की थी, यह कोशिश अभी भी जारी है। इसी मंगलवार को सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि संविधान ने मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों के 'नाजुक कंधों' पर बहुत अधिक शक्तियां निहित की हैं। इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ऐसे व्यक्ति को होना चाहिए जो खुद को प्रभावित ना होने दे या यह ऐसा व्यक्ति हो जो पूरी तरह से गैर-राजनीति हो। जैसी कि पहले भी कोशिश होती रही है, इस बार भी सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि 'तटस्थता' की स्थिति बनाए रखने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में चीफ जस्टिस को भी शामिल किया जाना चाहिए।
यह आईडिया असल में सरकार के अधिकार क्षेत्र में पिछले दरवाजे से हस्तक्षेप की अनाधिकृत कोशिश है, एक कहावत है ना कि उंगली पकड़ कर गला पकड़ना, न्यायपालिका संवैधानिक और स्वायत संस्थायों के साथ यही कर रही है। इस बेंच में जस्टिस जोसेफ, जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ह्रषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल थे। हालांकि कोर्ट ने सरकार को सिर्फ सलाह दी है, लेकिन मुख्य सूचना आयुक्त के उदाहरण को सामने रखें तो न्यायपालिका की मंशा को समझना मुश्किल नहीं।
पांच सदस्यों की पीठ ने अपने फैसले में टी.एन. शेषन की तारीफ़ करके जनमत का समर्थन हासिल करने की भी कोशिश की है। टी.एन. शेषन का जनता में इसलिए सम्मान है क्योंकि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए चुनाव प्रणाली में व्यापक सुधार हुए थे। उन्हीं के कार्यकाल में सरकार का दखल भी लगभग खत्म हो गया था।
उस समय की कांग्रेस सरकार उन के सख्त आदेशों और फैसलों से परेशान हो गई थी, इसीलिए चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाया गया था ताकि मुख्य चुनाव आयुक्त न्यायपालिका की तरह निरंकुश न हो जाए।
शेषन पर लगाम लगाने के लिए 1993 में कांग्रेस सरकार ने आर्टिकल 342 (2)[3] के तहत एक अध्यादेश के जरिए एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया था। टी.एन. शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती भी दी थी, लेकिन अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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