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जिन्ना और मौलाना आजाद की देन है वक्फ कानून

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भारत में आजकल वक्फ कानून चर्चा का विषय बना हुआ है। अब इसे संयोग कहें या कुछ और, लेकिन भारत के पिछले 100 सालों के इतिहास में यह कानून हमेशा ही चर्चा में रहा है। वैसे भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में इस कानून की सर्वाधिक पैरवी करने वाले कोई और नहीं बल्कि भारत के सांप्रदायिक विभाजन के जिम्मेदार और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना थे। यही नहीं, उनकी पार्टी मुस्लिम लीग इकलौता ऐसा राजनैतिक दल था जिसने अपने राष्ट्रीय अधिवेशनों में सबसे पहले इसके पक्ष में प्रस्ताव पारित किये थे।

Jinnah and Maulana Azad behind Waqf Law

वक्फ कानून में मोहम्मद अली जिन्ना का योगदान

वक्फ कानून की 1911 में शुरुआत ही एक ऐसे व्यक्ति द्वारा हुई जोकि खुद ही उस दौर का सर्वाधिक विवादास्पद नेता था। उसका नाम था मोहम्मद अली जिन्ना। जिन्ना ने ही सबसे पहले 1911 में वक्फ कानून की रूपरेखा सामने रखी थी। शायद इसलिए यह कानून सदैव विवादों में बना रहता है। मोहम्मद अली जिन्ना का राजनैतिक इतिहास बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम सब जानते है कि उन्होंने अपने जीवन में भारत विभाजन के सबसे बड़े राजनीतिक अपराध को अंजाम दिया था। मगर उनके अलावा भी ऐसे नेता थे जिन्होंने वक्फ को संवैधानिक दर्जा दिलाने के हरसंभव प्रयास किये। इसमें दूसरा सबसे बड़ा नाम अब्दुल करीम गजनवी का था।

अब्दुल करीम गजनवी ने 1905 में ब्रिटिश सरकार की बंगाल विभाजन (बंगभंग) की कुख्यात योजना का समर्थन किया था। जिस साइमन कमीशन के विरोध के चलते लाला लाजपत राय शहीद हुए, उसी साइमन कमीशन का समर्थन करने वालों में अब्दुल करीम गजनवी का नाम सबसे ऊपर आता है। जब 5 मार्च 1913 को काउंसिल ऑफ गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया में वक्फ विधेयक पर चर्चा हो रही थी तो अब्दुल करीम गजनवी का कहना था कि अंग्रेजों के भारत आने से पहले यह देश 'दारुल इस्लाम' हुआ करता था।

जबकि सच्चाई ये है कि भारत सैद्धांतिक एवं राजनैतिक रूप से कभी दारूल इस्लाम नहीं बना। यह बहुत ही सामान्य इतिहास है कि दिल्ली सल्तनत सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित रही। बाद में मुगलों का शासन आया तो वे राजपूताना को हासिल करने में हमेशा असमर्थ रहे और मराठों एवं सिक्खों ने उन्हें भारत पर एकछत्र शासन कभी नहीं करने दिया। हाँ, इतना जरुर है कि मोहम्मद बिन कासिम के सिंध पर हमले से लेकर औरंगजेब के निधन तक लगभग 1000 सालों में इस दिशा में हरसंभव प्रयास हुए लेकिन सफलता कभी नहीं मिली।

खैर, अब्दुल करीम गजनवी ने वक्फ की चर्चा के दौरान भारत को 'दारुल इस्लाम' संबोधित किया तो इसका कोई तो मतलब होगा? दरअसल, अब्दुल करीम और उनके भाई अब्दुल हलीम गजनवी मुस्लिम लीग के सदस्य थे और जब भी इन भाइयों को मौका मिला इन्होने भारत की एकता और अखंडता को हमेशा विघटित किया। जैसे अब्दुल हलीम गजनवी ने लन्दन में 1930 से 1932 में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में मुस्लिम लीग की तरफ से हिस्सा लिया और बर्मा को भारत से विभाजित करने की पुरजोर वकालत की। इनका निधन भी बंटवारे के बाद 1953 में पूर्वी पाकिस्तान में ही हुआ।

इस प्रकार कट्टर सांप्रदायिक एवं विभाजनकारी मानसिकता वाले नेताओं के साये में एक इस्लामिक मान्यता वाले वक्फ शरियत कानून को संवैधानिक दर्जा दिलाने की वकालत शुरू हुई थी। इसलिए जब 2022 में स्वाधीन भारत के तमिलनाडु स्थित एक हिन्दू बहुल गाँव और वहां के हिन्दू मंदिर की जमीन पर वक्फ बोर्ड अपना दावा करता है तो ध्यान में आता है कि इसी वक्फ के शुरूआती पैरोकार तो वे लोग थे जिन्होंने इस्लाम के नाम पर भारत को विभाजित कर दिया था।

वक्फ कानून का जिन्न

1947 में विभाजन की शर्त पर भारत स्वाधीन हो गया लेकिन इस वक्फ के 'जिन्न' ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा। इस बार मौलाना आजाद ने वक्फ को भारतीय संविधान का हिस्सा बनाने के लिए जोरशोर से प्रयत्न शुरू कर दिए। चाहे संविधान सभा की कार्यवाही हो अथवा प्रोविजनल पार्लियामेंट की, दर्जनों बार वक्फ पर कानून बनाने के लिए सम्बंधित विधेयक को सूचीबद्ध तो किया गया लेकिन अन्य जरुरी विधेयकों के चलते इसे समय नहीं मिल सका।

आखिरकार, 16 जुलाई 1952 को लोकसभा में पहली बार 'मुस्लिम वक्फ बिल' नाम से एक निजी विधेयक पेश किया गया। इसे सदन में कांग्रेस के सदस्य और जमियत उलेमा से जुड़े सईद मोहम्मद अहमद काज़मी ने पेश किया। इस विधेयक में कई सुधारों की आवश्यकता थी इसलिए इसे 13 मार्च 1953 को कानून एवं अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन मंत्री सीसी विस्वास की अध्यक्षता वाली एक सेलेक्ट कमेटी को भेज दिया गया।

इस समिति की दर्जनों बैठकों में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडलों की तरफ से विधेयक के प्रावधानों को इस्लामिक कानून के अनुसार रखने का दवाब बनाया गया। लगभग एक साल की मेहनत के बाद समिति ने वक्फ विधयेक का मसौदा अपनी रिपोर्ट में पेश किया जिसे 4 मार्च 1954 को संसद के पटल पर रखा गया।

विडम्बना देखिये कि मौलाना आजाद का इतना प्रभाव था कि यही मसौदा बिना किसी बदलाव के वक्फ कानून 1954 बन गया। लोकसभा में इस पर थोड़ी-बहुत चर्चा तो हुई लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति के कारण पूरी कांग्रेस इस मसौदे के आगे नतमस्तक सी हो गयी और राज्यसभा में तो इस पर कोई चर्चा ही नहीं हुई।

सामान्य प्रक्रिया है कि संसद में जो कानून पारित होते है वह पूरे देशभर में लागू होते है। अनुच्छेद 370 के चलते जम्मू और कश्मीर एक अपवाद बना रहा लेकिन वक्फ कानून 1954 में विशेष तौर पर उल्लेख किया गया कि यह जम्मू और कश्मीर सहित पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र एवं गुजरात के कुछ हिस्सों में लागू नहीं होगा। न जाने संसदीय परंपरा का यह कौन सा प्रारूप है कि भारत की संसद का एक कानून देश के एक बड़े हिस्से पर जानबूझकर लागू नहीं करवाया जाता है। इसलिए आज भी केंद्र सरकार को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि कई राज्यों के वक्फ बोर्ड्स की क्या स्थिति है। वे अपने मनमाने ढंग से काम करते है और उन्होंने अपनी एक अलग ही दुनिया बना ली है।

6 मई 1964 को पेट्रोलियम एवं कैमिकल मंत्री हुमायूँ कबीर ने इसी वक्फ कानून में एक संशोधन पेश किया था। उन्होंने क्या संशोधन पेश किया उसका कोई ख़ास मतलब नहीं है क्योंकि आगे चलकर वह भी निष्प्रभावी हो गया और बाद के वर्षों में उसमें भी संशोधन कर दिए गए। अब दूसरी स्थिति देखिये, आमतौर पर संसद में जब भी कोई विधेयक पेश किया जाता है तो उससे सम्बंधित मंत्रालय के मंत्री की उसे सदन के पटल पर रखने की जिम्मेदारी बनती है।

मगर वक्फ कानून का पेट्रोलियम एवं कैमिकल के मंत्री से क्या लेनादेना था? जबकि हुमायूँ कबीर के दायित्व से यह बाहर का विषय था और उन्हें मात्र एक 'मुस्लिम' होने के नाते वक्फ पर संशोधन पेश करने की जिम्मेदारी दी गयी थी। नीतिगत तौर पर तो यह काम तत्कालीन कानून मंत्री अशोक कुमार सेन का था।

वास्तव में वक्फ कानून बनाने से पहले इसके जिन्ना वाले इतिहास से सबक सीखने की बेहद जरुरत थी। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। जिन्ना ने 1911 में जिस वक्फ को संवैधानिक कानून बनाने का पुरजोर समर्थन किया वही आज भी भारत में मौजूद है। विगत वर्षों की गलत एवं असंवैधानिक परम्पराओं के कारण यह स्वाधीन भारत का सबसे बेहूदा कानून बन गया है। इसलिए बाद के वर्षों में इसमें दर्जनों बार संशोधन एवं सुधार किये गए फिर भी आजतक यह न सिर्फ सबसे विवादित कानूनों में से एक है बल्कि आज भी इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस हो रही है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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