Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Krishna Janmashtami: कोमल किशन कन्हैया या परम प्रतापी योगेश्वर कृष्ण?

Krishna Janmashtami: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यह विचार प्रासंगिक एवं उपयुक्त ही होगा कि महापराक्रमी, नीतिज्ञ श्रीकृष्ण का यशोगायन करने के बजाय क्यों अधिकांश साहित्यकारों और कवियों ने उनके कोमल एवं रसिक स्वरूप का ही अधिकाधिक चित्रण किया? क्या श्रीकृष्ण ने केवल कोमल और प्रेमिल भावों को ही जिया? क्या उनके जीवन एवं व्यक्तित्व को केवल रासलीलाओं और प्रेमिल प्रसंगों की परिधि में आबद्ध कर कथा-कहानियों, काव्यों-साहित्यों, प्रवचनों-आख्यानों में प्रस्तुत करना उनके विराट, बृहत्तर, कर्मयोगी व्यक्तित्व के साथ अन्याय नहीं है?

वीरता के स्थान पर भीरुता और पलायन-वृत्ति के अनुसरण की सामाजिक प्रवृत्ति के पीछे क्या कवियों-चिंतकों-प्रवचनकारों की ये प्रवृत्तियाँ जिम्मेदार नहीं हैं? क्या इन प्रवृत्तियों ने हमारे समाज एवं युवाओं को वीरता के स्थान पर भीरूता का पाठ नहीं पढ़ाया है? यह निरपेक्ष और स्वतंत्र विश्लेषण की अपेक्षा रखता है कि क्या राधा-कृष्ण एवं रासलीला के प्रसंगों में अतिशय रुचि लेने या ऐसे प्रसंगों को अतिरिक्त रुचि ले-लेकर प्रस्तुत करने की साहित्यिक-सामाजिक प्रवृत्ति ने केवल भक्ति की भाव-गंगा बहाई या समाज को उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी बनाने में भी उसकी कोई भूमिका रही?

Janmashtami 2023 Gentle kishan kanhaiya Mitra or the most glorious Yogeshwar Krishna?

जबकि विद्वतजन जानते हैं कि योगेश्वर एवं गीतोपदेशक श्रीकृष्ण के प्राचीनतम एवं प्रामाणिक जीवनचरित ''भागवतपुराण' में राधा का उल्लेख तक नहीं है। बाद में, मुख्यतया भक्ति और रीतिकाल में राधा का पूरा परिवार, उनके माता-पिता, गाँव-ठिकाना, कथा-प्रसंग अपनी पूर्णता तक जा पहुँचा और तमाम भक्त तो कृष्णमय से अधिक राधामय ही हो उठे। कृष्ण और राधा के जिस दिव्य एवं आत्मिक प्रेम की चर्चा पूर्ववर्त्ती कवियों-कथाकारों में प्रारंभिक अवस्था में दृष्टिगोचर होती है, कालांतर में वह दिशाहीन होकर ऐंद्रिकता और दैहिकता की सीमा तक जा पहुँचती है। कई बार इन प्रसंगों की आड़ लेकर स्वेच्छाचारिता एवं अमर्यादित उन्मुक्तता को भी सही सिद्ध करने की सामाजिक कुचेष्टाएँ दिख पड़ती हैं।

अनायास ही यह प्रश्न भी मन को उद्वेलित करता है कि सन 1192 में मोहम्मद गोरी के हाथों निर्णायक एवं अपमानजनक पराजय के पश्चात भारतवर्ष लगातार विदेशी आक्रांताओं से जूझता-लड़ता रहा, पराजय की पीड़ा से उबर फिर-फिर खड़ा होता रहा और सन 1857 के वीरतापूर्ण विद्रोह के पश्चात विदेशी साम्राज्यवाद के चंगुल में से भी 100 वर्ष बीतते-बीतते मुक्त हुआ। परंतु घोर आश्चर्य है कि अपमान, प्रताड़ना, गुलामी और उससे मुक्त होने की अपराजेय जिजीविषा एवं अनथक संघर्ष के उस दौर में भी तुलसी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो हमारा संपूर्ण भक्ति एवं रीति कालीन साहित्य और चिंतन धनुर्धारी राम के बजाय बाँकेबिहारी, रासबिहारी, कुंजबिहारी श्रीकृष्ण के आस-पास ही घूमता-मंडराता रहा।

जबकि पीड़ा व संघर्ष की उन सदियों में वीरता, स्वतंत्रता एवं सुषुप्त राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाले प्रसंगों को अधिक प्रमुखता से उभारा जाना चाहिए था। तब और कमोवेश आज के विषम, प्रतिकूल एवं अंतर्बाह्य चुनौतियों से घिरे कालखंड में हमें योगेश्वर के रूप में उस महाबली योद्धा श्रीकृष्ण की अधिक आवश्यकता है, जो शिशुपाल-जरासंध जैसे आतताइयों का नाश करते हैं, अबला एवं दुर्बलों की रक्षा करता हैं, चाणूर-मुष्टिक और कंस जैसे महाबलियों एवं महा आतताइयों का संहार करते हैं, और महाभारत के युद्ध में 'शठे शाठ्यम समाचरेत' की नीति का अनुसरण करते हुए धर्म की जीत और अधर्म की हार सुनिश्चित करते हैं।

मध्यकालीन कवियों-चिंतकों को केवल माखन चुराने वाले, मटकी फोड़नेवाले, वंशी बजाने वाले, चाँदनी रात में रासलीला रचाने वाले, गोपियों के वस्त्र उठाने वाले, कुंजों में ब्रजबालाओं के संग दुपहरियाँ बितानेवाले श्रीकृष्ण ही याद रहते हैं, पर उन्हें उसी आयु, बल्कि उससे भी छोटी आयु में प्रलंब, धेनुक, कालिय और बक जैसे न जाने कितने असुरों की नकेल कसने वाले श्रीकृष्ण; 'महाभारत' और 'भगवद्गीता' के महानायक और उद्घोषक श्रीकृष्ण - लगभग नहीं के बराबर याद आते!

कविता-कहानियों का जनमानस पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो समाज भी साहित्य से ही प्रेरणा-संदेश ग्रहण करता है। साहित्य ही उसे आदर्श और जीवन-मूल्य प्रदान करता है। आज समय आ गया है कि जो भूल मध्यकालीन कवियों-साहित्यकारों से हुई, वर्तमान में उसका परिमार्जन हो। माना कि लोकमानस कोमल-मधुर भावपूर्ण प्रसंगों में अधिक रुचि लेता है, पर साहित्य एवं साहित्यकारों का उद्देश्य केवल लोक का रंजन नहीं, चरित्र का गठन और संस्कारों का विकास भी होना चाहिए। और यह तभी संभव होगा, जब वह अपने लोकनायकों का युगीन एवं आदर्श चित्र व चरित्र प्रस्तुत करे।

आज भी वंशी बजैया, रास रचैया, गाय चरैया, लोक लुभैया, गोपियों के वस्त्र उठानेवाले, माखन चुराने वाले, मटकी फोड़ने वाले कृष्ण-रूप का ही सर्वत्र बोलबाला है। श्रीकृष्ण वादक हैं, नर्त्तक हैं, मुरलीधर हैं, चक्रधारी हैं, गीता के प्रवर्त्तक हैं, धर्म-संस्थापक हैं, मर्यादा-स्थापक हैं, निर्बलों के रक्षक, असुरों के संहारक हैं, वे देश के स्वाभिमान और शौर्य के प्रतीक भी हैं। कथा-काव्यों से लेकर प्रसंगों में उनके इन समग्र रूपों के दर्शन होने चाहिए।

अंतर्बाह्य चुनौतियों से घिरे और संपूर्ण भारतवासियों के प्रयास एवं पुरुषार्थ के बल पर उन चुनौतियों से उबरने का सफल प्रयास करते भारतवर्ष में भगवान श्रीकृष्ण के ''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'' संदेश की महत्ता एवं प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। एक ऐसे दौर में जबकि हमारा देश विस्तारवाद, साम्रज्यवाद, अलगाववाद, आतंकवाद, प्रांतवाद जैसी बड़ी चिंताओं और समस्याओं की चपेट में है, हमें श्रीकृष्ण के चक्रधारी रूप की महती आवश्यकता है। हमें उनके जैसा ही दूरदर्शी एवं रणनीतिक नेतृत्व भी चाहिए, जो दुष्टों के लिए मारक एवं संहारक, चतुरों के लिए चतुर तो सज्जनों के लिए कल्याणकारी हो।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+