Islam and UCC: अगर ॐ और अल्लाह को एक मानते हो, तो समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों?
Islam and UCC: अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब दिल्ली के रामलीला मैदान में मौलाना अरशद मदनी ॐ और अल्लाह को एक बता रहे थे। लेकिन अब जैसे ही 22वें विधि आयोग द्वारा समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय मांगी गयी तो अरशद मदनी के लिए ॐ और अल्लाह अलग अलग हो गये। अब अशरद मदनी का कहना है कि 'समान नागरिक संहिता संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को दिये गये मौलिक अधिकारों के खिलाफ है इसलिए वो इसे लागू करने के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे।'
अरशद मदनी भारत की एक कट्टरपंथी इस्लामिक तंजीम से ताल्लुक रखते हैं जिसका नाम है जमीयत ए उलेमा ए हिन्द। यह तंजीम देओबंदी विचारधारा से जुड़ी हुई है। इस्लाम की देओबंदी विचारधारा भारतीय उपमहाद्वीप में अपने कट्टरपंथी विचार और आतंकवादी गतिविधियों के लिए जानी जाती है। अफगानिस्तान हो या कश्मीर, जहां भी इस्लामिक आतंकवाद का प्रसार हुआ वहां इसी विचारधारा ने टूल का काम किया।

जमीयत ए उलेमा ए हिन्द सौ साल से अधिक पुराना इस्लामिक संगठन है जिसकी कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक मुस्लिम समुदाय में गहरी पैठ है। अधिकांश मस्जिदों को आज इन्हीं के द्वारा नियुक्त इमाम संचालित कर रहे हैं। इस तरह प्रत्यक्ष रूप से इनकी संख्या बरेलवी मुस्लिमों से भले ही कम हो लेकिन परोक्ष रूप से ये देश में बहुत व्यापक स्तर पर मुस्लिमों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में अगर अरशद मदनी यह कह रहे हैं कि वो समान नागरिक संहिता के विरोध में 'कानून के दायरे' में रहकर सड़कों पर उतरेंगे तो इसका अर्थ है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर देशभर में हंगामा खड़ा किया जाएगा।
लेकिन मूल सवाल तो यह है कि अभी कुछ महीने पहले जो अरशद मदनी ॐ और अल्लाह को एक बताकर हिन्दू धर्म को इस्लाम जैसा ही बता रहे थे आज अल्पसंख्यक होने, मुस्लिमों को टार्गेट करने और संवैधानिक अधिकारों का हनन होने का रोना क्यों रो रहे हैं? अगर उन्हीं के मुताबित ॐ और अल्लाह के मानने वालों में कोई भेद नहीं है तो फिर दोनों के लिए नागरिक कानूनों में भेद क्यों रहना चाहिए? उन्हें तो बढ़ चढ़कर इस पहल का स्वागत करना चाहिए कि कुछ महीने पहले रामलीला मैदान में जिस धार्मिक एकता की बात उन्होंने शुरु की थी, मोदी सरकार उसी एकता को कानूनी तौर पर मजबूत कर रही है।
लेकिन मदनी हों या उनकी कट्टरपंथी देओबंदी तंजीम। इनके खाने के दांत अलग तथा दिखाने के दांत अलग होते हैं। वो जिस अरब के इस्लाम को फॉलो करते हैं वह किसी दूसरे के बराबर नागरिक अधिकारों को मान्यता ही नहीं देता। उनकी किताब में साफ तौर पर कहा गया है जो गैर मुस्लिम हैं वो नापाक, गंदे और इस्लाम को मानने वाले के मुकाबले में हीन और निकृष्ट हैं। ऐसे में कोई मुस्लिम ऐसे नापाक और गंदे लोगों के साथ कानूनी बराबरी पर कैसे सहमत हो सकता है? पाकिस्तान के इस्लामिक जानकार डॉ इसरार अहमद तो साफ तौर पर कहते थे कि वास्तविक इस्लामिक शासन में मूर्तिपूजकों को मुस्लिमों के समान नागरिक अधिकार नहीं दिये जा सकते। यहां तक कि इस्लामिक स्टेट में उनसे वोट देने का अधिकार भी वापस ले लिया जाना चाहिए।
यही कारण है कि पाकिस्तान में लंबे समय से वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू और ईसाई समान नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान की इस्लामिक हुकूमत इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वहां तो मुस्लिम बहुसंख्यक है फिर वहां वह गैर मुस्लिमों को समान नागरिक कानूनों से वंचित क्यों रखना चाहता है?
असल मामला अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक का है ही नहीं। जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहां गैर मुस्लिमों को समान नागरिक अधिकार नहीं दिये जाते और जहां वह अल्पसंख्यक है वहां अल्पसंख्यक के नाम पर अपने 'शरई अधिकारों' को तब तक बचाकर रखना चाहता है जब तक कि वह समान या बहुसंख्यक न हो जाए। इसके मूल में कुछ ऐसे कस्टम या मान्यताएं हैं जिसे इस्लाम में शरीयत कहा जाता है। इसमें 9 साल की लड़की से शादी इस्लामिक शरीयत से मान्य समझी जाती है। हालांकि व्यावहारिक तौर पर आज अफगानिस्तान जैसे कुछ अपवाद को छोड़ दें तो मुस्लिम समुदाय में ही 9 साल की उम्र में कोई अपनी लड़की की शादी नहीं करता। फिर भी वो इस सुन्नत से सैद्धांतिक रूप से कोई समझौता नहीं करना चाहता।
इसी तरह इस्लामिक किताब में निकाह के कुछ तरीके बताये गये हैं जिसमें 'उज़रत' देकर निकाह करने या कपड़ा/चादर देकर मुताह करने का भी प्रावधान है। ये निकाह और मुताह असल में स्त्री के साथ सेक्स करने का अनुबंध हैं जिसमें उनको उनकी उज़रत (मेहनताना) देने का प्रावधान है। निकाह जहां अनिश्चित समय के लिए किया गया सेक्स अनुंबध होता है वहीं मुताह एक निश्चित समय के लिए किया जाने वाला सेक्स अनुबंध होता है। दोनों ही परिस्थितियों में मुस्लिम मर्द उस औरत को उसकी उज़रत (पारिश्रमिक) देकर उसे छोड़ सकता है।
अब क्योंकि इस्लाम में निकाह एक प्रकार का सेक्स अनुबंध है इसलिए इस्लाम में मर्द के लिए तलाक लेने या औरत को जब चाहे तब अपने से अलग कर देने के नियम भी बहुत सरल हैं। मर्द जब चाहे तब औरत को तलाक दे सकता है लेकिन औरत अगर मर्द को छोड़ना चाहे तो वह अपनी ओर से नहीं छोड़ सकती। इस्लामिक जानकार इसके लिए 'खुला' मांगने का उल्लेख करते हैं जिसमें अगर कोई मुस्लिम औरत अपने मर्द पार्टनर से अलग होना चाहे तो उसे इसका प्रस्ताव काजी के जरिए उस तक भेजना होता है। यह मर्द के ऊपर है कि वह उस औरत को तलाक दे या न दे।
इसके साथ ही इस्लामिक शरीयत में चार बीवियों को रखने की अनुमति है। इसके लिए मुसलमान अपने मजहब की किताब का हवाला देता है कि उनकी आसमानी किताब उन्हें चार निकाह करने के लिए कहती है। हालांकि मुस्लिम अपनी जिस किताब का हवाला देते हैं उसमें एक-एक, दो-दो, तीन-तीन और चार-चार बीवीयों को रखने के लिए कहा गया है। अगर इन सबको जोड़े तो कुल मिलाकर 20 बीवियों को रखने का हक बन जाता है। किस हिसाब से वो चार बीवीयों की बात करते हैं इसे आज तक कोई इस्लामिक जानकार स्पष्ट नहीं कर पाया है।
निकाह से अलग इस्लाम में और भी कई ऐसे मसले हैं जिन्हें वो सामान्य कानूनी अधिकार के तहत नहीं लाना चाहते। जैसे, इस्लाम में बच्चा गोद लेने की अनुमति नहीं है। अगर मुस्लिम महिला का शौहर मर जाए तो उसे परिवार की संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में तो उस महिला के बच्चों को भी परिवार की संपत्ति में हिस्सेदारी से रोका जा सकता है।
शादी विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े यही वो कुछ 'विशिष्ट शरई कवानीन' हैं जिसके कारण वह दुनिया के दूसरे धर्म के मानने वालों से अपने आपको श्रेष्ठ मानता है। वह मानता है कि ये जो नियम हैं वो उनके अल्लाह के द्वारा बनाये गये हैं इसलिए इन नियमों में कोई समझौता नहीं कर सकते। अपने अल्लाह के बनाये इन्हीं 'विशिष्ट नियमों' के संरक्षण को वो भारत में अपना अल्पसंख्यक अधिकार मानते हैं जिसकी रखवाली के लिए अरशद मदनी हों या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दोनों ही देशभर में सड़कों पर उतरने की 'धमकी' दे रहे हैं।
स्वाभाविक है वर्तमान सिविल सोसायटी के सिद्धांतों की कसौटी पर ये सारे नियम काल बाह्य हो चुके हैं। महिला, उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार के ज्यादा आधुनिक और उन्नत नियम दुनिया भर के समाजों ने अपना लिया है। कहीं परंपरा से ये नियम आ रहे हैं तो कहीं नये कानून बनाकर समकालीन समाज के अनुरूप नियम बनाये गये हैं। लेकिन इस्लाम में शरीयत एक ऐसा मजहबी प्रतिबंध है जिसके कारण मुसलमान किसी भी तरह का प्रोग्रेसिव या वैकल्पिक विचार नहीं अपना पाता है।
अगर मुस्लिम समुदाय कॉमन सिविल कोड को स्वीकार करता है तो इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी उसके अपने परिवार की बहन बेटियां ही होने वाली हैं। लेकिन इस बिरादरी की एक बुनियादी समस्या यह रही है कि इस समुदाय के मर्द बाप-भाई बनकर सोचना नहीं जानते। वो चाहकर भी ऐसा इसलिए नहीं सोच पाते क्योंकि उनको अपनी किताब में बताये गये अल्लाह के आदेशों के खिलाफ चले जाने का डर सताता है। किताब को मानने वाला मर तो सकता है लेकिन अल्लाह के आदेशों के खिलाफ नहीं जा सकता क्योंकि वो मानता है कि मरकर उसे आखिरकार उसी अल्लाह के पास जाना है जिसके बारे में अरबी किताब में बताया गया है।
अब मरने के बाद कौन कहां जाएगा, जाएगा भी या नहीं जाएगा इसका कोई प्रमाण मानव जाति के पास अब तक तो नहीं है। किसी भी समाज या समुदाय में मरने के बाद की जो कुछ धारणाएं हैं वो सब अपनी अपनी कल्पनाएं ही हैं जिसका कोई ठोस आधार किसी के पास नहीं है। फिर भी अगर कोई समुदाय ऐसी काल्पनिक बातों को ही सच मानकर वास्तविक जीवन को संकटों से भर देता हो तो इसमें कोई क्या कर सकता है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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