Lok sabha elections 2019: क्या इस चुनाव में प्यार, नफरत और छवि भी है निर्णायक मुद्दा?

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के छठें चरण के मतदान के दौरान एक बार फिर चुनावी विमर्श में प्यार, नफरत और छवि का छौंक लगता नजर आया। इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा कि क्या इस चुनाव में प्यार, नफरत और छवि भी कोई बड़ा निर्णायक चुनावी मुद्दा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके आधार पर वोट मांगा जा रहा है और मतदाता मतदान कर रहा है। इसे समझने के लिए कुछ वक्तव्यों को देखना जरूरी है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के दो बड़े नेता अपने भाषणों, साक्षात्कारों और बयानों में इसका उल्लेख बहुत मजबूती के साथ क्यों कर रहे हैं। यह भी देखने की बात हो सकती है कि इन नेताओं को जरूर इसका अहसास होगा कि इसके आधार पर भी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है और वोट हासिल किए जा सकते हैं। तभी तो मौके बेमौके इसे आजमाने से चूकना नहीं चाहते।

हमने और हमारी पार्टी ने प्यार का प्रयोग किया है

हमने और हमारी पार्टी ने प्यार का प्रयोग किया है

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छठे चरण में दिल्ली में मतदान करने के बाद पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा कि इस चुनाव में हमने और हमारी पार्टी ने प्यार का प्रयोग किया है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में नफरत का उपयोग किया। राहुल ने यह भी कहा कि इस चुनाव में प्यारजीतने वाला है और नफरत की हार होने वाली है। इससे तो यही ध्वनि निकलती है कि प्यार और नफरत ही वह मुद्दा होगा जिससे हार-जीत तय होने वाली है। कांग्रेस की ही नेता और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने भी मतदान के बाद कहा कि प्यार और नफरत को ध्यान में रखते हुए कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 घंटे भी तपस्या की होती, तो ऐसी नफरत भरी बातें नहीं करते। मतलब उन्होंने भी प्यार और नफरत की राजनीति की बात की।

45 वर्षों की मेरी तपस्या ने छवि बनाई है जिसे आप तबाह नहीं कर सकते

45 वर्षों की मेरी तपस्या ने छवि बनाई है जिसे आप तबाह नहीं कर सकते

हालांकि वह प्रधानमंत्री मोदी के उस साक्षात्कार की उस बात का जवाब दे रही थीं जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी छवि दिल्ली की खान मार्केट गैंग और लुटियन्स दिल्ली ने नहीं बनाई है। 45 वर्षों की मेरी तपस्या ने छवि बनाई है जिसे आप तबाह नहीं कर सकते। उनका इशारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ओर था जिन्हें कभी मिस्टर क्लीन कहा जाता है औरजिसके बारे में प्रधानमंत्री ने चुनाव के दौरान ही कहा था कि उनका अंत भ्रष्टाचारी नंबर के रूप में हुआ। इस वक्तव्य को भी कांग्रेस ने उनकी नफरत की राजनीति के चश्मे से ही देखा था। जाहिर है यहां बात छवि की हो रही है लेकिन इसमें भी कहीं न कहीं नफरत की राजनीति को आड़े हाथ लिए जाने की कोशिश की गई है। यह है देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के बड़े नेताओं के वे वक्तव्य जिनमें प्यार, नफरत और छवि को चुनावी मुद्दे के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

 मोदी ने कहा कि प्रेम के नाम पर वे हमें क्या-क्या नहीं कहते

मोदी ने कहा कि प्रेम के नाम पर वे हमें क्या-क्या नहीं कहते

इस संदर्भ में कुछ और उदाहरणों को भी देख लेने से स्थिति कुछ ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुरुक्षेत्र में एक चुनावी रैली में अपने उद्गार में विपक्ष पर उनके साथ व्यक्तिगत नफरत की राजनीति के आरोप लगाए थे। उन्होंने एक तरह से कांग्रेस और उसकी प्यार की राजनीति पर सीधे तंज कसा था। प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया था कि उन्हें तरह-तरह की गालियां दी जाती हैं। कहा था कि मेरी मां तक को नहीं छोड़ा जाता। मोदी ने कहा कि प्रेम के नाम पर वे हमें क्या-क्या नहीं कहते। ‘गंदी नाली का कीड़ा', ‘पागल कुत्ता', ‘भस्मासुर', ‘गंगू तेली', ‘हिटलर', ‘मुसोलिनी', ‘दाउद इब्राहिम', ‘वायरस' और भी कितने ऐसे ही नामों से पुकारते हैं। मोदी ने यह भी कहा कि मैं
जानता हूं कि सार्वजनिक मंच पर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए क्योंकि बच्चे भी इसे सुनते हैं। लेकिन कांग्रेस को भी इस तरह भाषा नहीं बोलनी चाहिए। प्रधानमंत्री की ओर से लगाए ये सारे आरोप काफी हद तक सही माने जा सकते हैं क्योंकि कांग्रेस से लेकर कई अन्य पार्टियों के नेताओं की ओर से भी इस तरह के संबोधन किए गए हैं जिसे किसी भी तरह से शिष्ट आचरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनके मन में काफी सम्मान है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनके मन में काफी सम्मान है

दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के वक्तव्यों को भी देखा जाना चाहिए जिसमें वे प्यार, नफरत और छवि को जरिया बनाते हैं। वह अक्सर प्यार की राजनीति की बात करते हैं। वह यह भी कहते हैं कि उनके मन में किसी तरह की घृणा का भाव नहीं आता। वह दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनके मन में काफी सम्मान है। वह संसद में उनकी सीट पर जाकर गले भी लगाते हैं। वह यह भी कहते हैं कि प्रधानमंत्री चाहे जितना हमारे पिता, हमारी मां, हमारी दादी, हमारे परदादा और खुद हमारे बारे में कुछ भी कहें, मैं कभी बुरा नहीं मानता बल्कि उनसे सीखता भी हूं। यह भी कहा कि मैं अपने पिता, दादा, दादी की सच्चाई जानता हुं। इसलिए कोई कुछ भी कहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह कहते हैं कि उन्हें पप्पू आदि से संबोधित किया जाता है लेकिन कभी बुरा नहीं लगता। अभी एक टीवी साक्षात्कार में राहुल ने कहा कि देश के जो कुछ हुआ प्यार की वजह से हुआ। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का मेरे प्रति व्यक्तिगत विद्वेष साफ झलकता है। लोकसभा चुनाव से पहले भी राहुल लगातार कांग्रेस की प्यार की राजनीति की बात करते रहे हैं और उनका यह कहना होता है कि भारत में नफरत की राजनीति नहीं चल
सकती क्योंकि लोग एक-दूसरे से दूसरे से प्यार करते हैं और वही चाहते भी हैं।

 क्या इस चुनाव में प्यार, नफरत और छवि भी कोई मुद्दा बन पाया था अथवा नहीं

क्या इस चुनाव में प्यार, नफरत और छवि भी कोई मुद्दा बन पाया था अथवा नहीं

इस तरह के वक्तव्यों से दोनों ही बातें एक साथ सामने आती हैं। पहली तो यह कि राजनीति में नफरत बहुत तेजी से घर कर गई है और उसे अपने-अपने तरीके से फैलाया भी जा रहा है जिसे हर तरह से समाज और देश के लिए नुकसानदेह ही कहा जाएगा। दूसरा यह कि इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया जा रहा है और इसके जरिये सहानुभूति अर्जित करने की कोशिश की जा रही है। यहां इसे भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि यह चुनाव इस लिहाज से एकदम अलहदा कहा जा सकता है कि इसमें बुनियादी मुद्दे केंद्र में नहीं आ पा रहे हैं। यह अलग बात है कि विपक्ष की ओर से इसको सामने लाने की कोशिशें जरूर की जा रही हैं लेकिन वे नाकाफी ही लगती है। ऐसे में यह देखने की बात होगी कि मतदाता क्या उन्हीं मुद्दों पर वोट दे रहा है अथवा उसके मन में कहीं उसके अपने दैनंदिन वाले सवाल भी हैं जिनसे उसे रोज दो-चार होना पड़ता है। यह भी देखने की बात होगी कि क्या इस चुनाव में प्यार, नफरत और छवि भी कोई मुद्दा बन पाया था अथवा नहीं।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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