Wildlife India: वन्यजीवन की नयी संभावनाओं से भरा है भारत
Wildlife India: भारत के वन्य जीवन के लिए यह एक सुखद समय है। एक ओर जहां इसी महीने की शुरुआत में जानकारी आयी थी कि भारत ने वर्ष 2022 में अपने नए वन्यजीव डाटाबेस में 664 प्राणी समूह की प्रजातियों को जोड़ा है। इसमें 467 नई प्रजातियां और 197 नए रिकॉर्ड (जिन्हें पहली बार भारत में पाया गया) शामिल हैं। वहीं महीने के आखिर में अब खबर आयी है कि देश में बाघों की संख्या बढकर 3,682 हो गयी है। अर्थात संसार में पाये जानेवाले बाघों में इस समय 75 प्रतिशत भारत में मौजूद हैं।
जहां तक पशु पक्षियों की नई प्रजातियों से जुड़ी जानकारी के संकलन का सवाल है तो यह जूलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया के एक प्रकाशन में किया गया है। इसका शीर्षक है, 'एनिमल डिस्कवरीज, न्यू स्पीशीज एंड न्यू रिकॉर्डस 2023'। इसी प्रकार पुष्प से जुड़ी खोजों की सारी जानकारी भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण द्वारा प्रकाशित प्लांट डिस्कवरीज 2022 में शामिल हैं।

मेघालय का चमगादड़
खोजी गई स्तनपायी प्रजातियों में चमगादड़ की दो प्रजातियां शामिल हैं। दोनों ही मेघालय से हैं। पहला मिनी ऑप्टेरस फिलिप्स एक लंबी उंगलियों वाला चमगादड़ है। दूसरा ग्लिस्क्रोपस मेघालायनस बांस के बीच रहने वाला चमगादड़ है। वैज्ञानिकों की एक टीम ने इसे हाल में ही बांस के एक जंगल से खोजा था। मेघालय राज्य में मिलने की वजह से इसे 'ग्लिस्क्रोपस मेघालयनस' नाम दिया गया है। इस खोज के साथ, भारत में 131 चमगादड़ की कुल प्रजातियों की संख्या हो गई है, जिसमें चमगादड़ की 67 प्रजातियों के साथ सबसे अधिक विविधता मेघालय में दर्ज की गई है।
अरुणाचल के बंदर
वानर परिवार का सेला मकाक (मकाका सेलाई) पश्चिमी और मध्य अरुणाचल प्रदेश में खोजी गई एक नई मकाक प्रजाति है। सेला दर्रे में पाए जाने के कारण इसका नाम सेला मकाक या मकाका सेलाई रखा गया है। अरुणाचल मकाक प्रजाति के बंदर तवांग में पाए जाते हैं लेकिन सेला दर्रे में जो विशेषज्ञों को जो नई प्रजाति मिली है, वह तवांग जिले के अरुणाचल मकाक प्रजाति से भिन्न है। सेला मकाक पर एक शोध पत्र हाल में ही 'मॉलिक्यूलर फाइलोजेनेटिक्स एंड इवोल्यूशन' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
इसी प्रकार मकाका ल्यूकोजेनिस एक सफेद गाल वाला मकाक है जो भारत में पहली बार 2022 में पश्चिम कामेंग, अरुणाचल प्रदेश में देखा गया था। इसके संबंध में इसी साल अंतरराष्ट्रीय जनरल 'एनिमल जेने' में प्रकाशित हुआ। वर्ष 2015 में दक्षिणपूर्वी तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में पहली बार इसे देखा गया था। उस वक्त इसकी उपस्थिति आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं हो पाई थी। अब मकाका ल्यूकोजेनिस की उपस्थिति अरुणाचल प्रदेश की जैव विविधता को समृद्ध कर रही है और यह खोज भारत के स्तनधारी प्राणियों में वृद्धि का संकेत दे रही है।
सफ़ेद गाल वाले मकाक अरुणाचल प्रदेश में पाए जाने वाले अन्य मकाकों से अलग दिखाई पड़ते हैं। भारत में मकाक की छह प्रजातियां पाई जाती हैं। सभी मकाक प्रजातियाँ अवैध शिकार, वनों की कटाई और अपने प्राकृतिक आवास में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के खतरों का सामना कर रही हैं। हालाँकि, इस सबके बावजूद इन्हें अभी तक भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में शामिल नहीं किया गया है।
जैव विविधता और नई खोज
खोजी गई प्रमुख जीव प्रजातियों में तीन प्रमुख प्रजातियां और स्तनधारियों का एक नया रिकॉर्ड है, और पक्षियों के दो नए रिकॉर्ड शामिल हैं। 30 नई प्रजातियां और सरिसृपों के दो नए रिकॉर्ड, छह नई प्रजातियां और उभयचर का एक नया रिकॉर्ड 28 नई प्रजातियां और मछलियों के 08 नए रिकॉर्ड भी इसमें शामिल है।
पीले दुम वाला फ्लाईकैचर फिलिडुला जैंथोपाइगिया पिछले साल अंडमान द्वीप समूह के नारकोंडम द्वीप में पाया गया था। नए जीव जंतु की खोज में सबसे अधिक संख्या अकशेरूकी जीवों की है। जिनकी 583 प्रजातियां हैं। जबकि कशेरुक जीवों की 81 प्रजातियां हैं। अकशेरुकी जीवों में 384 प्रजातियों के साथ कीड़ों का प्रभुत्व है। जबकि कशेरुक जीवों में मछलियों का वर्चस्व है। इसके बाद सरिसृप, उभयचर और स्तनधारी हैं।
2022 में पौधों और जानवरों की सबसे अधिक खोज केरल से हुई। बात जीव जगत की करें तो जिन जीवों की खोज हुई है, उनमें सबसे अधिक केरल की 14.6 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। उसके बाद 13.2 प्रतिशत के साथ कर्नाटक है। तमिलनाडु की भागीदारी तीसरे नंबर पर 12.6 फीसदी की है। पशु पक्षी की सभी खोजों में अंडमान निकोबार का प्रतिशत 8.4 रहा। पश्चिम बंगाल 7.6 और अरुणाचल प्रदेश 5.7 प्रतिशत पर रहकर छठे स्थान पर रहा। पौधों की खोज में भी केरल 16.8 प्रतिशत से नंबर वन पर रहा।
जैव विविधता की तमाम तरह की चुनौतियों के बीच यह नई खबर भारत का हौसला बढ़ाने वाली है। इन नई खोजों और अभिलेखों को संकलित करके, भारत में पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को बचाने के लिए हो रहे प्रयासों के महत्व को सरकारी स्तर पर अब रेखांकित करने की आवश्यकता है, जिससे यह देश अपने जीव-जंतुओं और पुष्प विविधता के बारे में अपने ज्ञान का विस्तार करना जारी रख पाए।
जहां नए नए जीव और पौधों की खोज सामने आ रहीं हैं वहीं इनके संरक्षण का काम उतना ही अधिक चुनौती भरा रहेगा। इस बात को पर्यावरण मंत्रालय भी स्वीकार करता है कि देश की जैव विविधता की रक्षा का काम आसान नहीं है। लेकिन साथ साथ यह जोड़ना भी समीचीन होगा कि जैव विविधता की रक्षा करना केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में भी शामिल है।
भारत बन गया बाघ बहादुर का देश
यह संयोग है कि जब देश में प्राणि और पौधों के डाटाबेस में 1000 से अधिक प्रजातियों का समावेश हुआ है। उसी दौरान एक अच्छी खबर 29 जुलाई को बाघ दिवस के दिन आई। 50 साल पहले जब भारत में प्रोजेक्ट टाइगर प्रारंभ हुआ था, उस वक्त बाघों की गिरती संख्या सबकी चिंता के केन्द्र में थी। मौजूदा वक्त में भारत, दुनिया के 75 फीसदी जंगली बाघों का घर है। बाघों की स्थिति को लेकर 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2018 से 2022 के बीच इनकी संख्या 2,967 से बढ़कर 3,682 हो गई है।
केन्द्र सरकार की तरफ से 2006 से लेकर 2022 तक के बाघों की संख्या के आंकड़े जारी हुए है। आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश बाघों के लिए सबसे उपयुक्त प्रदेश है। आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 485 बाघ बढ़े हैं, जहां 2006 में प्रदेश में 300 बाघ थे तो वहीं 2022 में यह आंकड़ा बढ़कर 785 तक पहुंच गया। जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर कर्नाटक (563) और उत्तराखंड (560) है।
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में करीब 50 साल पहले 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की गई थी। उस साल देश में 09 टाइगर रिजर्व थे। प्रकाशित खबरों के मुताबिक उस समय देश में बाघों की संख्या केवल 268 रह गई थी। आज भारत में 53 टाइगर रिजर्व हैं और उनकी संख्या बढकर 3,682 हो गयी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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