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हैदराबाद डॉक्टर मर्डर: आरोपियों के एनकाउंटर करने से क्या-कुछ बदलेगा?

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हैदराबाद डॉक्टर मर्डर

नई दिल्ली। हैदराबाद डॉक्टर रेप और मर्डर के कथित आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया गया है। इससे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खुश है, वह जश्न मना रहा है। संसद से लेकर सड़क तक कुछ आवाजें ही इस एनकाउंटर से असहमति के हैं जिसका होना 'नक्‍कार खाने में तूती की आवाज' भर है'। दरअसल 'फैसला ऑन द स्पॉट' जैसे तरीकों पर पहले भी लोगों के बीच सहमति और असहमति थी, जैसा कि अभी भी है। राजनीतिक पार्टियां पहले भी अपनी जरूरतों के तहत एनकाउंटर और लिंचिंग पर नरम- गरम होते रहे हैं लेकिन इसे ठोस रूप में थोड़ा बहुत शह मिलना तब लगने लगा जब संसद में सांसद ही अभियुक्तों के लिए लिंचिंग की मांग करने लगे। जब ऐसी मांगों की पैरवी कानून बनाने वाले ही करने लगें तो यह खतरनाक स्थिति है। ऐसी मांग न्यायतंत्र की अपेक्षा भीड़तंत्र पर ज्यादा भरोसा होने के संकेत देते हैं।

घटनाएं

घटनाएं

हालांकि, रेप केस के मामलों में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का खून उबलने लगेगा। वह त्वरित न्याय चाहेगा भी और यह वाज़िब भी है की उसे ऐसा न्याय मिले भी। अपराधियों को बहुत जल्द सख्त सज़ा दिए जाने से किसे एतराज होगा भला? लेकिन इसके लिए बिना ट्रायल के सजा देना समस्याओं को ख़त्म करने की जगह समस्याओं को उत्पन्न करने वाला है। इसके लिए हाल की कुछ घटनाओं पर ही गौर करते हैं। शिमला के गुड़िया केस को याद करें। पुलिस ने आनन-फानन में किसी को भी जेल में डाल दिया था। जब मामला सीबीआई को सौंपा जाने लगा तो एक अभियुक्त की जेल में हत्या हो गई, बाद में असल गुनहगार कोई और निकला। गुड़गांव पुलिस ने भी एक स्कूल में बच्चे की हत्या के लिए उस स्कूल के बस ड्राइवर को जेल के अंदर डाल दिया था और शुरुआत में उसे ही गुनहगार बनाया था जबकि अपराधी एक अन्य छात्र था। हाई प्रोफाइल आरुषि मर्डर केस में ही जिन तीन नौकरों को गिरफ्तार किया गया था वो भी गुनहगार नहीं निकले। कहने का मतलब यह है कि देश में एक न्यायिक ढांचा है जिसका काम है असली गुनहगार को पकड़ना और सजा देना ताकि किसी निर्दोष की जान न जाए। यही प्राकृतिक न्याय भी है और एक बनाई गई व्यवस्था भी जो चीजों को अराजक होने से बचाती है।

कानून की खामियां

कानून की खामियां

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जो व्यवस्था चल रही है उस पर चुप ही रहा जाए और उनमें निहित खामियों पर आँखें मूंद ली जाएं। अपने यहां न्यायालय की प्रक्रिया लंबी चलती है, यह इसकी बड़ी खामी है। इसकी पुरजोर आलोचना होनी चाहिए। उस प्रक्रिया को बदलने पर जोर दिया जाए जो न्याय में देरी करता है। ऐसे मामलों में होना यह चाहिए कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट तेजी से सुनवाई कर कड़ी से कड़ी सजा सुनाए और उस सजा पर अमल करने की समयसीमा भी तय करे। जितने भी संवैधानिक प्रावधान हों उन्हें उस समयसीमा के भीतर निबटाया जाए। ऐसे मामलों को सर्वाधिक प्रार्थमिकता दी जाए। ऐसा करना तार्किक भी होगा और हमें बर्बर भी नहीं बनाएगा जैसा कि देर से मिला न्याय कभी कभी हमें इस मुहाने पर लाकर खड़ा कर देता है।

क्या होगा?

क्या होगा?

जैसा की पुलिस बता रही है कि तथाकथित अपराधी घटनास्थल से भाग रहे थे इस क्रम में मजबूरन उनका एनकाउंटर करना पड़ा और यह सच भी है तो भी इस आधार पर एनकाउंटर को न्याय मानकर जो खुश हो रहे हैं तो भी उन्हें एक बार ठहरकर सोचना चाहिए। शक्ति का सदुपयोग निर्माण करता है तो वहीं इसका दुरुपयोग विध्वंस लाता है। उन्हें यह भी दिमाग में रखना चाहिए कि अगर इस परिपार्टी का दुरुपयोग होगा तो वह इसे कैसे रोकेंगे? क्या यह जंगलराज नहीं हो जायेगा जहां जिसके पास ज्यादा शक्ति है वही विजेता है। इसलिए ऐसे एनकाउंटर पर अगर आम आदमी जश्न मना रहा है तो यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह खुद भी सोचे की आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों की आस्था उनके बनाए कानून से उठने लगी है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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English summary
Hyderabad Doctor Murder: What will change to the accused encounter?
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