'जय श्रीराम' का उदघोष कितना धार्मिक कितना राजनीतिक और कितना दबंगई?

नई दिल्ली। राम का नाम वैसे तो भारतीय परंपरा में गुत्थमगुत्था है। इसका आरंभ भी राम से और अंत भी राम से है। लेकिन यह राम अकेले नहीं हैं। यह राम सहचर्य के राम हैं। यह राम दरअसल सीता-राम हैं, सिया-राम हैं। यह राम रघुपति राघव राजाराम हैं।
परंतु विगत के कुछ सालों में आम-जन के अंतःकरण में बसने वाले इस राम पर 'एक और राम' का रंग, 'जय श्री राम' के उदघोष से चढ़ाया जा रहा है।

इस 'जय श्रीराम' की शुरुआत कब से मानी जाए?
इसकी शुरुआत सन 1990 से हुई जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से राम रथ यात्रा आरंभ की थी। इस यात्रा का नारा ही 'जय श्रीराम' था। इस नारे का उग्रतम रूप बिहार की राजधानी पटना में दिखा था जब वहाँ की सड़कों पर, आडवाणी समर्थक माथे पर भगवा पट्टी बांधे राह में आने वाले लगभग हर गाड़ी पर डंडा पटकते हुए, उसमें सवार लोगों को जय श्रीराम बोलने का धमकी भरा आग्रह कर रहे थे। यह आस्था से विचलित जय श्रीराम का हुंकार था। इसी समय तब के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की संभावना देखते हुये आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार करवा लिया था।

यह यात्रा क्या धार्मिक था?
बाद में आडवाणी नें खुद ही स्वीकार भी किया कि उनका राम रथ यात्रा धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक था। यह राजनीतिक रूप से हिंदुत्व को उभारकर अल्पसंख्यकों के बरक्स हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश थी। इस तरह यह नारा विशुद्ध राजनीतिक नारा था। लेकिन चूँकि इस राजनीतिक नारे में धर्म का लेप चढ़ा हुआ है और हमारे सामाजिक बुनावट में प्रयुक्त रेशमी धागा धर्म का भी है इसलिए यह हमारे बीच से आउटडेट नहीं हो सका है।

इससे हमारे समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
परंतु इसके राजनीतिकरण से धर्म के प्रतीकों का स्वरूप बिगड़ जरूर गया है। इसलिये धर्म को लेकर धारणायें भी बदलती दिख रही हैं। पहले के धार्मिक प्रतीक जैसे राम हनुमान आदि अपने उदात्त रुप में थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में सिक्स पैक ऐब वाले श्रीराम, एंग्री हनुमान और परशुराम की नई इमेज सामने आई है। प्रतीकों के इस कल्पना में सौम्यता के बदले नफ़रत भरी सोच का बिंब दिखता है।
इसने राम का चाल चरित्र और चेहरा बदल दिया है। पहले 'राम' के नाम से बेहतर शासन, न्याय, अत्याचार के खात्मे की कल्पना आदि जेहन में आती थी। लेकिन अब 'जय श्रीराम' का नारा डराने लगा है। इस नाम पर अब दंगे होने लगे हैं। तलवारें लहराई जाने लगी हैं। लोगों को पीट पीटकर मार डाला जाने लगा है।

कौन सी घटनाएं हैं जो इन धारणाओं को बल देता है?
झारखंड के खरसावां में तबरेज अंसारी की हत्या कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ महीनों में मुस्लिम-विरोधी कई आपराधिक घटनाएं हुई हैं जिनमें यह भी एक आपराधिक घटना थी। तबरेज को जय श्रीराम और जय बजरंगबली कहने पर मजबूर किया गया और फिर उसे इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।
हरियाणा के गुरुग्राम में मोहम्मद बरकत की बेरहमी से पिटाई की गई और उसे जबरन भारत माता की जय और जय श्रीराम कहने पर मजबूर किया गया।
बिहार के बेगूसराय में एक फेरी वाले मोहम्मद कासिम से उसके मज़हब के आधार पर पाकिस्तान जाने को कहा गया और फिर उसे गोली मार दी गई।
उत्तरी बंगाल में जय श्रीराम का नारा लगाने वाले कुछ लोगों ने हिजाब पहने एक महिला के साथ बदसलूकी की।
दिल्ली के रोहिणी इलाके में मोहम्मद मोमिन को एक कार से टक्कर मार दी गई, क्योंकि उन्होंने जय श्रीराम कहने से इंकार कर दिया था।

क्या यह धर्म की आड़ में दबंगई है?
यह सिलसिला और आगे चल ही रहा है। विडंबना है कि यह नारा लोकसभा चुनाव प्रचार से होते हुए अब लोक सभा में भी लग रहा है। जब लोक सभा में बीजेपी सांसद ओवैसी और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों को 'जय श्रीराम' और 'भारत माता की जय' कहकर चिढ़ाते हैं, तो संसद के बाहर के आपराधिक तत्वों को अल्पसंख्यकों के साथ ऐसा बर्ताव करने का हौसला बढ़ता है। यह और बात है कि हौसला बढ़ाने की ऐसी कोई मंशा सदन में नहीं होती है। फिर उन समूहों का यह बर्ताव धार्मिक चोले से राजनीतिक होते हुये दबंगई वाला हो जाता है। यह नारा एक समूह विशेष के प्रभुत्व का ऐलान हो जाता है।
आस्था विश्वास की चीज है। यह एकांतिक है। जब आस्था और विश्वास किसी के द्वारा जबरन पैदा किया जाने लगता है तब यह अपने क्रूरतम रूप में होता है। यह हिंसक हो जाता है। आस्था अपना औदात्य खो देती है। यह हर धर्म मजहब में एक सा है। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान। इसलिए जब भी धार्मिक नारा किसी गिरोह के द्वारा जबरन लगाया और थोपा जाय तो हमें यह समझना चाहिए कि यह उस गिरोह का एक राजनीतिक नारा है। उस गिरोह के दबंगई का ऐलान है। इस नारे का धार्मिक श्रद्धा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। चाहे वह नारा या उदघोष 'जय श्रीराम' का हो या 'अल्लाह हो अकबर' का हो या फिर 'हर हर महादेव' का ही क्यों न हो।
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