Holi: वैदिक शास्त्र से लोक साहित्य तक सनातन धर्म में होली
ईश्वर किसके साथ होली खेलता होगा? इसके समाधान में कहा जाता है कि अद्वैत ब्रह्म से प्रकट हुई सृष्टि समूह बोध से चलती है। यदि समूह न हो तो कोई दूसरा पर्व भले मना ले पर होली नहीं मनाई जा सकती। होली के लिए समूह की आवश्यकता है।

यही कारण है कि वह ब्रह्म होली के लिए एक से अनेक में बंट गया। अनेकत्व में एकत्व को व्यक्त करने का पर्व होली है। वेदों से लेकर लौकिक साहित्य तक आनंद वितरक पर्व के रूप में होली प्रतिष्ठित है। संस्कृत सहित प्राय: देशज भाषाओं में होली पर इतना लिखा गया है, जिससे होली सर्वश्रेष्ठ रसमय सनातन उत्सव के रूप में स्थापित है।
वासंती माधुर्य दृष्टि का नाम है होली। होली सुंदरतम है, जिसमें अमंगल भी मंगल होता है। होली की आहट शुरू तो हो जाती है फाल्गुन मास के शुरू में ही, पर यह पूरी तरह व्यक्त होती है 'फाल्गुनी' संकेत को वहन करने वाली फाल्गुनी पूर्णिमा पर। फाल्गुनी पूर्णिमा वैदिक काल से ही अध्यात्म और उल्लास के सम्मिलन की वाहिका रही है।
पुरातन काल में होली ऋषियों और कृषकों का संयुक्त पर्व था। गुरुकुलों में वटुक फाल्गुनी पूर्णिमा को 'साम-गान' यानी सामवेद के मंत्रों का सस्वर पाठ करते थे। सामवेद के 'तांड्य महाब्राह्मण' के इन मंत्रों का संबंध होली से है - 'गावो हाऽऽरे सुरभय इदम्मधु। गावो घृतस्य मातर इदम्मधु।।' गुरुकुलों में होली पर 'हुताशनी' अनुष्ठान होता है। वैदिक संस्कृति ने होली को 'अग्नि' से मिला दिया।
यजुर्वेद ने नए अनाज को 'वाज' कहा है। होली पर अग्नि में 'वाज' की आहुति देकर उस अन्न को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। यह 'नवधान्य-इष्टि' नामक वैदिक यज्ञ है। वास्तव में वैदिक काल की 'होलाका' अब 'होली' हो गई है। 'काठक-गृह्यसूत्र' ने होली को स्त्रियों द्वारा सौभाग्य वृद्धि के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान कहा है, जिसके देवता चंद्रमा हैं। वहीं, 'तंत्र-शास्त्र' में फागुनी पूनम 'दारुण-रात्रि' है।
भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने 'धर्मशास्त्र के इतिहास' में होली को सर्वोच्च उल्लास और आनंद का उत्सव कहा है। होली को मनाने में भिन्न-भिन्न मान्यताएं और भावनाएं हैं। बंगाल को छोड़कर होलिका-दहन प्राय: सर्वत्र होता है। बंगाल में फाल्गुन पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण का झूला प्रसिद्ध है। प्राय: लोग एक-दूसरे के रंग लगाते हैं और रंगमिश्रित जल की बौछारें एक-दूसरे पर छोड़ते हैं। पर इन सबके पीछे जो पारंपरिक गूढ धार्मिक तत्त्व है, वह है पुरोहितों द्वारा होलिका-पूजन और श्रीकृष्ण का गोप-गोपियों से होली खेलना।
प्राकृत भाषा में पहली सदी में लिखी 'गाहा-सतसई' ने होली को 'फाल्गुनोत्सव' कहा है। नदी किनारे इकट्ठे युवक-युवतियां एक-दूसरे पर बिना किसी भेदभाव के नदी का कीचड़ उछाल रहे हैं। 'गाहा-सतसई' की होली गांव की है। इस नाते गांवों के सारे संसाधन होली खेलने के काम आते हैं। उधर, वात्स्यायन अपने 'कामसूत्र' में सुवसंतक, उदकक्ष्वेडिका और अभ्यूषखादिका की चर्चा करते हैं। 'सुवसंतक' अब मनाए जाने वाली वसंत पंचमी है। 'उदकक्ष्वेडिका' पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। 'अभ्यूषखादिका' नए धान्य को आग में भूनकर खाने का उत्सव है।
होली का पुरातन साहित्यिक वर्णन सातवीं सदी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्द्धन ने 'रत्नावली' नाटक में किया है, जहां होली 'वसंतोत्सव' है। स्थान है कौशांबी, आज से ढाई हजार साल पुराना सुंदर शहर। कौशांबी में राजा उदयन किले पर खड़े होकर प्रजा को होली खेलते देख प्रमुदित हैं। स्त्रियां होली खेलने में व्यस्त हैं। उनकी मुट्ठियों में भरी कुंकुम आकाश में उड़कर लाल बादल बना रही हैं। कहीं-कहीं पीले गुलाल से बने बादल यूं बने हैं, मानो वे स्वर्ण के हों।
राजमहल के भीतर होली यूं जमी है कि मदमस्त लोग पिचकारियों से एक-दूसरे पर सुगंधित जल डाल रहे हैं, जिससे महल में भारी कीचड़ मचा है। मतवाली कामिनियों के मस्तक का सिंदूर पानी के साथ बहकर नीचे फैल गया है। हर्षवर्द्धन ने पिचकारी का संस्कृत नाम दिया है - शृंगक। कौशांबी में दिन भर नाच-गान चलता है। सांझ में लोग फिर जुट गए हैं कामदेव के पूजन के लिए। राजा उदयन अपने 'मकरंद-उद्यान' में लगे लाल अशोक वृक्ष में कामदेव के विग्रह का पूजन करते हैं।
पिछली शताब्दी के रससिद्ध संस्कृत कवि भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने 'जयपुर-वैभवम्' में एक ही श्लोक में उर्दू, ब्रज, ढूंढ़ाडी व संस्कृत, चार भाषाओं का अनूठा प्रयोग होली के लिए किया है, जो दुर्लभ है-
मौसिमे बहार देख खोला मुंह बुलबुलों ने आतिशये हिज्र का निकाला इश्क ने शोला,
दूधिया छनाओ यार! नीठ नरचोला मिल्यो बोला भर पीके फिर बोलो बस बम भोला।
आओला कदेक, कद गाओला रंगीली फाग ढोला! कद गोराजी ने हिवडै लगाओला,
मानिनामनङ्गेनाऽद्य दोलामधिनीतं मनो नो लास्यं दधाति रसिकानां किमसौ होला?।।
धीरे-धीरे होली वैदिक अनुष्ठान से इतर लोक गाथाओं में गुंथ गया। पौराणिक कथाओं से यह भक्तशिरोमणि प्रह्लाद की उन गाथाओं से जुड़ गया, जिसमें भक्ति के बल से प्रह्लाद बच गए और होली जल गई। वहीं, श्रीकृष्ण की लोकोत्तर लीलाएं भी होली से आ जुड़ीं। भक्तिकाल के बाद तो देशज भाषाओं में लिखने वाले सभी संत-भक्त-कवियों ने विभिन्न साहित्यिक पद्यों में राधा-कृष्ण की मोहक होली लीलाओं का अनुपम वर्णन किया।
केवल ब्रज अंचल ही नहीं बल्कि मेवाड़ के महलों में मीरा बाई से लेकर बाद के सभी संत अपने श्यामसुंदर से होली खेलने लगे। ये काव्य योजनाएं इतनी अनूठी थीं कि न केवल कृष्ण भक्तों ने ही बल्कि रामभक्तों ने 'राजा दशरथ के द्वार मची होली' गाकर श्रीराम के हाथों भी कनक पिचकारी चलवाई। वहीं 'खेले मसाने में होरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी' गाते हुए काशी में बाबा विश्वनाथ के भी भूत-प्रेतों के साथ भस्म की होली खेलने के सुंदर प्रसंग दिखाए।
ब्रज-भक्ति-साहित्य में सर्वाधिक प्रसिद्ध और किशनगढ़ (अजमेर) के संत नागरीदास का होली चित्रण बेजोड़ है। वे लिखते हैं - "जाऊं कहां जितही निकसौं तितही लखिए अति ऊधम भारी, गावत गारी ठठोल ठगी इत नंद को लाल बड़ो ही धुतारी। रंगनि सौं भरि देत है अंगनि 'नागरिया' बस नांह हमारौ, और हूं गांव सखी बहुतैं पर गोकुल गांम कौ पैड़ो ई न्यारौ।।"
निर्गुणियों की होली में आदिम रंग का गहरा चमत्कार है। उनकी होरी नाच-गान और धूम-धड़ाके से दूर है। नाम जप को महत्त्व देने वाले निर्गुणी संप्रदायों के लिए यह पर्व पुराणों के प्रह्लाद उपाख्यान से जुड़ा है। महात्मा दादू, गुरु जंभेश्वर, रामचरण और ब्रह्मानंद जैसे निर्गुणियों के साथ सगुण भक्ति धारा की मीरां बाई और सूरदास ने होरी की लाली को भीतर तक उतारा।
ब्रह्मानंद के कन्हाई ऐसी अजीब होली मचा देते हैं, जिसका अचरज भारी है - एक समय श्रीकृष्ण प्रभु को होली खेलने की मन में आई। पर अकेले होली नहीं खेली जा सकती, इससे उन्होंने 'बहुताई' प्रकट कर दी। पांच महाभूतों से एक पिचकारी बनाई, जिसमें चौदह भुवनों के रंग भरकर उनकी सृष्टि कर दी। पांच ज्ञानेंद्रियों के विषय यानी रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श की गुलाल बनाकर बीच ब्रह्मांड में उड़ाई। जिन-जिन की आंखों में यह गुलाल पड़ी, उनकी सुध-बुध जाती रही। उन्हें कुछ सूझ ही नहीं पा रहा है।
मीरा होली को असाधारण रूप से प्रकट कर रही है - फागुन के दिन चार रे होली खेल मना रे। श्याम रंग में रंगी मीरां की चुनरिया को श्याम पिया खुद रंगने आता है। अब बदलते परिवेश की काली छाया इन अनूठे रंगों को बिगाड़ने पर तुली है, जहां मादकता आ जुड़ी है। पर होली के चिरंतन रंग अमर हैं, जिन्हें कोई बदरंग नहीं कर सकता।
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