Gyanvapi Issue: योगी ने विपक्षी गठबंधन का खेल बिगाड़ना शुरू किया

योगी आदित्यनाथ के एक इंटरव्यू से राजनीति में नया बवाल खड़ा हो गया है। उन्होंने ज्ञानवापी पर अपनी राय सार्वजनिक करके अन्य दलों को अपनी राय सार्वजनिक करने की चुनौती दे दी है।

उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि एलायंस इंडिया के सभी घटक दलों को अपनी राय व्यक्त करनी पड़ेगी। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ज्ञानवापी बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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अब तक सभी राजनीतिक दल ज्ञानवापी पर बयानबाजी से बचते रहे हैं। ज्ञानवापी क्योंकि अयोध्या की तरह सप्रमाण स्पष्ट केस है, इसलिए हिन्दुओं के लिए काफी अहम है। किसी भी शिव मन्दिर परिसर में नंदी का मुंह भगवान शिव की मूर्ति की तरफ होता है, लेकिन ज्ञानवापी में नंदी का मुंह तथाकथित मस्जिद की तरफ है। इतना ही नहीं, बल्कि दीवारों पर हिन्दू निशान जैसे स्वास्तिक, त्रिशूल, घंटी, दीपक अंकित हैं।

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    योगी आदित्यनाथ ने साफतौर पर कहा कि अगर ज्ञानवापी को मस्जिद कहेंगे, तो उस पर जरूर विवाद होगा, क्योंकि ज्ञानवापी में त्रिशूल है। उन्होंने इंटरव्यू करने वाली पत्रकार से पूछा कि वह खुद ही बताए कि मस्जिद में त्रिशूल क्या कर रहा है। उन्होंने कहा वह ज्योतिर्लिंग है, वहां पर कई मूर्तियां हैं, उसकी दीवारों पर भी हिन्दुओं से जुड़ी अनेक कलाकृतियां हैं, जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं कि यह मस्जिद नहीं मन्दिर था, जिसे तोड़ कर औरंगजेब ने अवैध रूप से मस्जिद बनवाई। मस्जिद की पिछली दीवार तो साफ़ बता रही है कि मन्दिर को तोड़ कर मस्जिद बनाई और उसकी पिछली दीवार मन्दिर की ही रखी गई।

    अयोध्या, मथुरा और काशी तीनों विश्व हिन्दू परिषद के एजेंडे पर थे। नब्बे के दशक में विहिप ने मुसलमानों के सामने प्रस्ताव रखा था कि अगर वे हिन्दुओं को ये तीन प्राचीन हिन्दू तीर्थ स्थल सौंप दें, तो वे किसी अन्य मन्दिर पर दावा नहीं करेंगे, जिसे मुगलकाल में तोड़कर मस्जिद बनाया गया था। हिन्दू मुस्लिम संबंधों में सौहार्द्र का वह टर्निंग प्वाइंट हो सकता था। लेकिन बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने विश्व हिन्दू परिषद का वह प्रस्ताव ठुकरा दिया था।

    अपने प्रधानमंत्रित्व काल में चन्द्रशेखर ने हिन्दुओं और मुसलमानों को आमने सामने बिठा कर एतिहासिक प्रमाणों के आधार पर मन्दिर मस्जिद के मसले सुलझाने की कोशिश की थी। लेकिन उस कोशिश को आगे बढ़ाने की बजाए नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने धार्मिक स्थल क़ानून पास करके आग में घी डालने का काम किया। इस क़ानून में कहा गया है कि श्रीरामजन्मभूमि बाबरी विवाद को छोड़कर बाकी सभी धार्मिक स्थलों की वही स्थिति रहेगी, जो 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के समय थी।

    यह क़ानून का उद्देश्य हिन्दुओं से उनका कानूनी हक छीनना था। इस कारण तनाव की राजनीति की शुरुआत इस क़ानून से हुई, जो एकपक्षीय क़ानून है। इस क़ानून का मतलब यह है कि मुगलकाल में तोड़े गए मन्दिर हिन्दुओं को वापस मांगने का कानूनी अधिकार नहीं है। इस क़ानून ने मुगलकाल के अवैध और अनैतिक कामों पर सरकारी मुहर लगाकर उन्हें जायज ठहरा दिया। यहीं से हिन्दुओं का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हुआ। नरसिंह राव सरकार के दौरान ही 6 दिसंबर 1992 में हिन्दुओं ने बाबरी ढांचा तोड़कर अपना रोष प्रकट किया, जबकि पांच सौ साल से हिन्दू इस मन्दिर के लिए लड़ रहे थे। आज़ादी के बाद लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन इतना आक्रोश कभी उत्पन्न नहीं हुआ था।

    यह एक एतिहासिक तथ्य है कि 1977 और 1989 में कांग्रेस की हार राजनीतिक कारणों से हुई थी, लेकिन बाबरी ढांचा टूटने के बाद 1996 से अब तक हुए सात लोकसभा चुनावों में उसे कभी बहुमत नहीं मिला, पांच चुनावों के बाद तो उसे गठबंधन की सरकार बनाने का मौक़ा भी नहीं मिला। वहीं रामजन्मभूमि आन्दोलन का समर्थन करने वाली भारतीय जनता पार्टी को इन सात चुनावों में से चार बार सरकार बनाने का मौक़ा मिला, जिनमें से दो बार तो भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला।

    श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर का निर्माण अंतिम स्टेज पर है, लोकसभा चुनाव से पहले जनवरी 2024 में मन्दिर का शिलान्यास भी हो जाएगा। 1991 के धार्मिक स्थल संरक्ष्ण क़ानून के बावजूद मथुरा और काशी के मन्दिरों की लड़ाई अदालतों में है। मुस्लिम समाज बाबरी ढाँचे की तरह ही एतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों को दरकिनार कर 1991 के क़ानून के आधार पर कानूनी जंग जीतने का दावा कर रहा है।

    काशी और मथुरा के मन्दिरों के अदालती केसों में मुस्लिम पक्ष ने 1991 के क़ानून को आधार बनाया है। फिर सवाल पैदा होता है कि अदालत केस की सुनवाई कैसे कर रही है। दोनों मामलों की अलग अलग वजह है, मथुरा के मामले में तो वजह यह है कि यह विवाद इंदिरा गांधी के जमाने में तब शुरू हुआ, जब एक हिन्दू संस्था ने राजनीतिक दबाव के चलते मन्दिर की जमीन मुसलमानों को सौंप कर मस्जिद बनवा दी थी। क्योंकि यह मसला 1947 के बाद का बन गया, इसलिए अदालत ने मथुरा मामले में हिन्दुओं की याचिका स्वीकार की है।
    काशी की ज्ञानवापी मस्जिद का अदालत में दरवाजा इसलिए खुला क्योंकि मुलायम सिंह के शासनकाल में मस्जिद की पिछली दीवार में बने श्रृंगार गौरी मंदिर की पूजा के दरवाजे हिन्दू महिलाओं के लिए बंद कर दिए गए। जबकि उससे पहले वहां हर रोज पूजा अर्चना का प्रावधान था। अगस्त 2021 में पांच महिलाओं ने वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिविजन) के सामने एक केस दायर करके ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में बने श्रृंगार गौरी मंदिर में रोजाना पूजा और दर्शन करने की अनुमति देने की मांग की थी।

    महिलाओं की याचिका पर जज रवि कुमार दिवाकर ने मस्जिद परिसर का एडवोकेट सर्वे कराने का आदेश दे दिया। कोर्ट के आदेश पर पिछले साल तीन दिन तक सर्वे हुआ था। सर्वे के दौरान मुसलमानों की तरफ से वजु के लिए इस्तेमाल किए जाने तालाब में शिवलिंगनुमा आकृति का गोल पत्थर मिला। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि यह शिवलिंग है, हालांकि मुस्लिम पक्ष का कहना था कि वो शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा है जो हर मस्जिद में होता है। हिंदू पक्ष की मांग पर विवादित स्थल को सील कर दिया गया। मुस्लिम पक्ष की यही दलील थी कि उपासना स्थल कानून 1991 के अनुसार हिन्दू दावा नहीं कर सकते, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने भी उनकी यह दलील नहीं मानी क्योंकि श्रृंगार गौरी की पूजा तो नब्बे के दशक तक हर रोज हुआ करती थी।

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी अदित्यानाथ ने मुसलमानों को एक बार फिर मौक़ा दिया है कि वे ज्ञानवापी परिसर को हिन्दुओं के सुपुर्द कर दें। अंतर यह है कि नब्बे के दशक में मुसलमानों को तीन मन्दिर छोड़ने का प्रस्ताव हिन्दुओं की संस्था विश्व हिन्दू परिषद ने दिया था, लेकिन अब भाजपा के बड़े नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दिया है। अब क्योंकि मुख्यमंत्री ने यह प्रस्ताव दिया है, तो लाजिमी है कि अब यह राजनीति का बड़ा मुद्दा बनेगा।

    असदुद्दीन ओवेसी ने योगी आदित्यनाथ के बयान की आलोचना करके इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। अब न चाहते हुए भी समाजवादी पार्टी और एलायंस इंडिया के घटक दलों को ज्ञानवापी पर स्टैंड लेना पड़ेगा। पांच विधानसभाओं और लोकसभा चुनावों को ज्ञानवापी का मुद्दा उसी तरह प्रभावित करने का काम करेगा, जैसे पिछले सात लोकसभा चुनावों को अयोध्या मुद्दा प्रभावित करता रहा है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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