Guru Purnima: आषाढ़ पूर्णिमा को ही क्यों होती है गुरु पूर्णिमा?
Guru Purnima: प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। गुरु पूर्णिमा का भारतीय संस्कृति में विशिष्ट महत्व है। हमारे यहाँ गुरु का स्थान ईश्वर तुल्य ही नहीं अपितु उनसे भी ऊपर कहा गया है। लेकिन ऐसी कौन सी व्यवस्था है कि आषाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है? प्राकृतिक रुपक की दृष्टि से दर्शन कहता है कि जब वर्षा ऋतु में घनघोर काले मेघ छा जाते हैं और वातावरण में प्रकाश कम हो जाता है। ऐसे में हमें गुरु के ज्ञान रूपी प्रकाश की आवश्यकता होती है। 'गुरु' शब्द का अर्थ ही 'अंधकार को दूर करने से है।'
हमारी उत्सव धर्मी संस्कृति में सर्वाधिक उत्सव वर्षा ऋतु के चार महीनों में ही आते हैं। इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है। इस काल में गुरु के सानिध्य में रहने का विशिष्ट अर्थ है। आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु की पूजा कर उनका आशीर्वाद लेने का विधान है। गुरु पूर्णिमा से पहले देवशयनी एकादशी होती है। मान्यता है कि इसी देवशयनी एकादशी से संसार के पालनहार भगवान विष्णु 4 महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद देवोत्थान एकादशी को भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागते हैं। तभी सभी मांगलिक कार्यों की दोबारा शुरुआत होती है।

इसलिए चातुर्मास के इन चार महीनों में जब संसार की संचरण उर्जा विष्णु सुप्त हो जाती है तब इस चातुर्मास में गुरु ही होते हैं जो ईश्वरीय कार्यों को अपने ऊपर लेते हैं। इसी धारणा के कारण देव शयनी एकादशी के बाद पड़ने वाली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है क्योंकि जब तक भगवान विष्णु निद्रा में लीन हैं तब तक लौकिक रूप से गुरु ही पथ प्रदर्शक का कार्य करते हैं।
गुरु अपने शिष्यों का विभिन्न प्रकार से कल्याण करते हैं। सनातन परंपरा में गुरु को देवताओं से भी उच्च स्थान दिया गया है। देवाधिदेव महादेव के वचन के रूप में यह उद्धृत भी है -
'गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो, गुरौ निष्ठा परं तपः।
गुरोः परतरं नास्ति, त्रिवारं कथयामि ते॥"
इसका अर्थ है -"गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है। गुरु से अधिक और पार, कुछ नहीं है। यह मैं तीन बार कहता हूँ।" अर्थात् मनुष्य ही नहीं बल्कि देवताओं के लिए भी गुरु का महत्व है। गुरु के विषय में यह भी कहा जाता है - 'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर'। इसका अर्थ यह है कि यदि भगवान रूठ जाएं तो गुरु की शरण मिलती है और जब गुरु रूठ जाएं फिर तो कहीं भी शरण नहीं मिलती। इसलिए जीवन में गुरु का सानिध्य होना महत्वपूर्ण होता है।
गुरु ही वे होते हैं जो हमें लौकिक मोह के दुःख से परमात्मा से जुड़ने का मार्ग बताते हैं। जीवन में आनंद प्राप्ति के लिए आत्म को जानना और परमात्मा से नैसर्गिक प्रेम की अनुभूति होना महत्वपूर्ण है। अब हम यह सोच सकते हैं कि प्रेम तो प्रेम होता है। जब कर्ता एक ही हो तो इस भाव में क्रिया और परिणाम कैसे बदल सकता है। किन्तु इसे एक गुरु दृष्टि से देखा जाय तो स्पष्ट होता है कि साधारण प्रेम स्वार्थी होता है, जो गहरी अज्ञानता के कारण इच्छा तथा सन्तुष्टि में सुदृढ़ है। जबकि गुरु के और ईश्वर के दिव्य प्रेम में कोई शर्त, कोई सीमा, कोई परिवर्तन नहीं होता। यहाँ शरणागति में मानव हृदय की चंचलता पवित्र प्रेम के स्तम्भनकारी स्पर्श से सदा के लिए समाप्त हो जाती है।
इतना ही नहीं गुरु भी स्वीकारते हैं कि उनके लिए शिष्य भी संतुलन बनाए रखने और उनके गुरु तत्व को उच्च अवस्था में बनाए रखने के लिए अपरिहार्य भूमिका में होते हैं। एक योगी के गुरु ने उन्हें कहा था कि "यदि तुम कभी मुझे ईश्वरानुभूति की अवस्था से गिरते हुए पाओ तो कृपया मेरे सिर को अपनी गोद में रखकर मुझे वापस उस परम प्रियतम के पास लाने की सहायता का वचन दो जिसे हम दोनों पूजते हैं।"
यह एक प्रकार की आध्यात्मिक सन्धि होती है। जिसके उपरांत ही एक शिष्य के लिए अपने गुरु का महत्त्व स्पष्ट होता है। गुरु मात्र एक दैहिक मानव नहीं बल्कि वे एक दिव्य चेतना होते हैं। गुरु की उस दिव्य चेतना के साथ बिना शर्त, निष्ठा तथा भक्ति से अन्तर्सम्पर्क से ही शिष्य के जीवन में आनंद, सन्तुष्टि, और ईश्वर से सम्पर्क का मार्ग प्रशस्त होता है।
गुरु पूर्णिमा आज के दिन ही मनाने के पीछे मान्यता यह भी है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास की जयंती होती है। वेदव्यास को हम कृष्णद्वैपायन के नाम से भी जानते हैं। महर्षि वेदव्यास ने ही वेद को लोक तक पहुँचाने का कार्य किया। उन्होंने वेदों के जटिल सूत्रों को सरल सहज संज्ञात्मक स्मृति में ढालकर इसे लोक में व्याप्त कर दिया। उन्होंने पुराण और महाभारत की रचना की। हिन्दू धर्म में वेदव्यास सभी के गुरु के रूप में पूज्य माने जाते हैं। इस दिन वेदव्यास का जन्म होने के कारण इसे गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा के अतिरिक्त एक और नाम 'मुडिया पूनो' भी कहा जाता है। यह ऋतु का संधिकाल होता है, क्योंकि इस समय के बाद से सूर्य क्षीण होते हैं और वर्षा में तेजी आती है। पुराने समय में ऋषि, साधु, संत एक स्थान से दूसरे स्थान यात्रा करते थे। इस चातुर्मास में वे 4 माह के लिए किसी एक स्थान पर ही रुक जाते थे। आषाढ़ की पूर्णिमा से 4 माह तक रुकते थे, और शिष्यों को उनका सानिध्य, ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त होता था।
यदि दर्शन की बात करें तो मनुष्य के जीवन में गुरु के कई रूप होते हैं। गुरु की सबसे पहली तीन श्रेणियां मानी जा सकती हैं - शैक्षिक गुरु, मार्गिक गुरु और दैविक गुरु। इसके अलावा गुरु रूप में जो प्रतिष्ठापित होते हैं, वे हैं - धार्मिक गुरु, आध्यात्मिक गुरु, शिक्षक गुरु, माता-पिता गुरु, मित्र गुरु, योग गुरु और धन कमाने, सफलता के गुण सिखाने वाला गुरु आदि। इसके अतिरिक्त लोग अपने-अपने गुरुओं को लौकिक भाषा में 'सद्गुरु' कहते हैं। किन्तु सभी गुरु, सद्गुरु नहीं हो सकते। सद्गुरु सत् के भाव से संपृक्त चेतना वाले गुरु ही होते हैं।
सत् का अर्थ आत्म चैतन्य, तत्व दर्शन ज्ञान से है। वह जिसे प्राप्त हुआ है वैसे गुरु सद्गुरु हैं। आत्मज्ञानी ही सदगुरु कहलाते हैं, जिन्हें आत्मा का अनुभव हो चुका होता है। सभी गुरुओं को आत्मज्ञान नहीं होता। इसलिए जो निरंतर सत् में ही रहते हैं, अविनाशी तत्व में ही रहते हैं, वे ही सद्गुरु कहलाते हैं। एक हमारे गाइड रूपी गुरु होते हैं। जिनके सात्विक आचरण विचार और व्यवहार से उनके मार्गदर्शन में हम चलते हैं। रास्ते में कोई दुविधा मिलने पर उनका मार्गदर्शन लेते हैं और जटिलताओं से निकलने का मार्ग बनाते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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