Ganga Vilas cruise: देश को गौरवान्वित करता ‘गंगा विलास’
51 दिन, दो देश, पांच राज्य, सात नदियां, 27 रिवर सिस्टम और 3200 किमी लंबी यात्रा। सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण 50 से अधिक पर्यटन आकर्षण। यही सब चीजें हैं जो गंगा विलास की यात्रा को खास बनाती हैं।

Ganga Vilas cruise: शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उद्घाटन के बाद गंगा विलास क्रूज की उत्तर प्रदेश के वाराणसी से शुरू होकर असम के डिब्रूगढ़ में समाप्त होने वाली यह यात्रा एक और बात के लिए चर्चा में है। यह दुनिया का सबसे लंबा रिवर क्रूज रूट है। इस मौके पर मोदी ने कहा कि "भारत को शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है, इसे केवल दिल से अनुभव किया जा सकता है।"
जलीय मार्ग से यात्राएं भारत के लिए नयी नहीं हैं। सदियों से अंतर्देशीय व अंतरराष्ट्रीय यात्रायें जल मार्ग से की जाती रही हैं। इतिहास में ऐसे अनेक प्रसिद्ध यात्रियों के नाम दर्ज हैं, जो शोध या व्यापार के उद्देश्य से भारत आते थे। देश के भीतर पहले से ही जल परिवहन काफी लोकप्रिय रहा है।
परंपराओं को पुनर्जीवन
2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी तो उसने कई ऐसे क्षेत्रों में संभावनायें तलाशना शुरू किया, जो दशकों से लगभग उपेक्षित जैसे थे। स्वदेशी जल परिवहन की प्राचीन परंपराओं को पुनर्जीवित करने का विचार भी इन्हीं संभावनाओं की तलाश का एक हिस्सा था।
हमारी संसद ने देश की 111 नदियों का इस्तेमाल करते हुए अंतर्देशीय जलमार्गों का विकास करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय जलमार्ग विधेयक पास किया। लेकिन, इस विचार को अमली जामा पहनाया गया अगस्त 2016 में, जब उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और प. बंगाल की गंगा, भागीरथी और हुगली नदियों को जोड़ कर वाराणसी से हल्दिया तक, 1620 किमी लंबे देश के पहले राष्ट्रीय जलमार्ग पर परिचालन शुरू किया गया।
नवंबर 2018 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी में भारत के पहले मल्टी- मॉडल टर्मिनल का उद्घाटन कर, इस घाटों की नगरी को इनलैंड वाटर हाइवे- वन का प्रमुख केन्द्र बना दिया। तभी से इस बात पर काफी जोर दिया जा रहा था कि जलमार्गों को सिर्फ सामान लाने-ले जाने तक ही सीमित न रखते हुए, इन्हें पर्यटन व यात्री परिवहन के साधन के रूप में भी लोकप्रिय बनाया जाये। गंगा विलास इसी दिशा में किये गये प्रयासों का एक भव्य और महत्वाकांक्षी परिणाम है।
पर्यटन के लिए वरदान
आज देश में जिस तरह से सड़क, रेल और हवाई मार्गों पर लगातार ट्रैफिक बढ़ रहा है, वह बड़ी संख्या में लोगों को यात्राओं के प्रति हतोत्साहित करता है। जाहिर है कि इसका असर पर्यटन पर भी पड़ता है। नदी मार्ग से किया जाने वाला परिवहन इस कोलाहल और भीड़-भाड़ से निकालकर एक शांत और अपेक्षाकृत नये वातावरण से साक्षात्कार का अनुभव देता है। इस दृष्टि से जलमार्ग को प्रोत्साहित करने से भारतीय पर्यटन उद्योग को काफी लाभ मिल सकता है। वैसे भी विश्व भर में रिवर कूज पर्यटन की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। रिवर क्रूज का ग्लोबल मार्केट सालाना पाँच प्रतिशत की दर से फैल रहा है। माना जा रहा है कि वर्ष 2027 में क्रूज मार्केट में रिवर क्रूज की 37 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी।
अभी इस क्षेत्र में 60 फीसदी हिस्सेदारी के साथ यूरोप का दबदबा है। इस हिसाब से भारत में तो यह अभी शैशवावस्था में ही है। यहाँ वाराणसी और कोलकाता के बीच रिवर क्रूज वेसल (छोटे जहाज) चलाये जा रहे हैं। ब्रह्मपुत्र नदी में नेशनल वाटरवे -2 पर भी क्रूज गतिविधियाँ शुरू हो चुकी हैं। यहाँ अभी चार रिवर क्रूज का परिचालन किया जा रहा है और यात्रियों की सुविधा के लिए दस यात्री टर्मिनल विकसित किये जा रहे हैं। गंगा विलास की यह शुरुआत घरेलू जल मार्ग पर्यटन को बढ़ावा देने वाली साबित होगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि इस राह में अनेक चुनौतियाँ भी हैं। सबसे बड़ी समस्या तो भारत में मौसम का अक्सर बदलता-बिगड़ता मिजाज ही है। नदियों का तो स्वभाव ही बदलना है। कभी सूख जाती हैं, कभी लबालब भरकर सीमायें तोड़कर बहने लग जाती हैं तो कभी रास्ता ही बदल लेती हैं। सर्दियों में धुंध और मानसून में मूसलाधार बारिश के दौरान जलयात्राओं पर क्या असर होता है, किसी से छिपा नहीं है।
पिछले साल जून महीने में वाराणसी- हल्दिया जलमार्ग पर ऐसी ही एक समस्या सामने आयी थी। गर्मी बढ़ने से गंगा में पानी कम हुआ तो जगह-जगह बालू के टीले बन गये, जिसने जहाजों के आवागमन को प्रभावित किया। बाढ़ के दौरान नदियों में आने वाली गाद एक और बड़ी समस्या है। बाढ़ की वजह से हर साल करीब 54 मिलियन टन गाद गंगा में जाती है। इसका सिर्फ 80 प्रतिशत हिस्सा ही बहकर समुद्र में जा पाता है, बाकी गंगा में ही रह जाता है। इससे नदी की गहराई कम होती जाती है और जहाजों का परिवहन सुचारू नहीं रह पाता।
इन्हीं सब आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) लगातार प्रयास कर रहा है कि भविष्य में सामने आने वाली समस्याओं से बचा जा सके। पानी को चैनलाइज कर और ड्रेजिंग के जरिये पानी की न्यूनतम गहराई सुनिश्चित की गयी है। इसके अलावा गंगा और हुगली के जल स्तर की ऊँचाई के बीच 15 मीटर का अंतर है। इसे दूर करने के लिए फरक्का नेविगेशन लॉक का प्रयोग करने की योजना है, ताकि नदी बदलते हुए जहाजों को कोई दिक्कत न हो।
गंगा विलास की यात्रा में आगे किस तरह की चुनौतियाँ सामने आ सकती है, इसके अध्ययन के लिए आईडब्ल्यूएआई का एक पायलट सर्वे वेसल उसके आगे-आगे चलेगा।
पर्यावरण भी है एक प्रश्न
एक चीज जिसके बारे में अभी कोई बात नहीं की जा रही है, वह है इस प्रकार की यात्राओं के पर्यावरणीय प्रभाव। रिवर क्रूज यात्रा देश में अभी शुरू ही हुई है। कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन, जब ये बढ़ेंगी तो नदियों के स्वस्थ जल और इनमें पायी जाने वाली जैव विविधता को इनकी वजह से क्या क्षति हो सकती है, इसका अध्ययन भी आवश्यक है।
सी क्रूज दुनिया भर में पहले से ही काफी लोकप्रिय है। इनकी वजह से मैरीन लाइफ को हो रहे नुकसानों को लेकर पर्यावरण प्रेमी अक्सर काफी चिंता और विरोध जताते नजर आते हैं। कहीं रिवर क्रूज भी तो ऐसा ही अनुभव नहीं करायेंगे, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
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जहाँ तक गंगा विलास की बात है तो दुनिया की सबसे लंबी जल यात्रा कराने वाले रिवर क्रूज के रूप में इसका कीर्तिमान, हम सब के लिए गर्व का विषय है। लेकिन, यह गौरव और प्रतिष्ठा, तब और बढ़ेगा, जब यह विश्व का सबसे अधिक ईको फ्रेंडली क्रूज भी कहलाये।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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