गांधी@150: आज जिंदा होते गांधी तो लिंचिंग को कैसे देखते?
नई दिल्ली। 2 अक्टूबर आने में अब कुछ ही दिन रह गये हैं। गांधी जयंती मनाने की जोर शोर से तैयारी चल रही है। 150 वीं जयंती है तो जश्न की खास तैयारी है। पटना स्थित गांधी संग्रहालय को विशेष तौर पर सजाया जा रहा है। मैं भी यहां मौजूद हूं। साज-सजावट देख तो रहा हूं लेकिन मन में तरह-तरह के विचार आ रहे हैं। वैसे तो हमने गांधी जी को कब का भुला दिया है लेकिन 2 अक्टूबर को याद करना एक परिपाटी है। ये औपचारिकता निभायी जा रही है। लेकिन सच ये है कि हम गांधी जी बिसारने की बहुत बड़ी कीमत चुका रहे हैं। गांधीवाद के बिना राजनीति और समाज आज किस गर्त में है, ये किसी से छिपा नहीं है। अगर गांधी जी आज जिंदा होते क्या महसूस करते?

गांधी जी को चबूतरे पर बैठा देखा
शाम को घर लौटा तो दिमाग में गांधी ही उमड़-घुमड़ रहे थे। रात को सोया तो मन के सवाल सपने में आ गये। सपनों ने उड़ान भरी तो खुद को चम्पारण के भितहरवा आश्रम में पाया। अब इसका हुलिया पूरी तरह बदल गया है। गांधी जी की कुटिया की जगह अब ईंट-गारे का पक्का मकान बन गया है। एक चबूतरे पर गांधी जी को बैठा देख कर हैरान हो जाता हूं। उनके नजदीक जाने की कोशिश करता हूं तो वे उठने लगते हैं। लगता है वे देखना चाहते हैं कि 150 साल बाद यहां के लोग उन्हें किस तरह याद करने वाले हैं। अनुनय-विनय के बाद वे बात करने के लिए राजी होते हैं। मैं धन्य-धन्य हो जाता हूं। फिर उनसे कहता हूं, हे महामानव ! अगर आप अभी भितिहरवा आश्रम में होते तो सबसे पहले क्या करते ? वे कुछ देर आसमान की ओर देखते हैं और फिर कहते हैं, आज के दौर में राजनीति और समाज दोनों अमानवीय हैं। दोनों निर्मम हो गये हैं। मैंने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थी। मॉब लिंचिंग की बला से मैं हैरान हूं। क्या हम फिर से आदिम युग के बर्बर दौर में दाखिल हो गये हैं ? मैं होता तो ऐसा कभी नहीं होता।

मॉब लिंचिंग को देख कर क्या कहते गांधी जी?
मैं गांधी जी से नम्रतापूर्वक कहता हूं, अगर आप आज जिंदा होते तो मॉब लिंचिंग को कैसे रोकते ? वे मेरी तरफ हैरानी से देखते हैं, फिर कहते हैं, इस देश के नेताओं ने तो पढ़ना - गुणना छोड़ ही दिया, क्या नौजवान पीढ़ी भी किताबों से विमुख हो गयी है ? मॉब लिंचिंग के अधिकांश मामले गोरक्षा के नाम पर हुए हैं। मैंने तो बहुत पहले ही लिख दिया था कि मैं गाय को पूजता हूं लेकिन मुसलमान को नहीं मारूंगा। ऐसा नहीं है कि गोरक्षा का आंदोलन आज शुरू हुआ है। 1872 में ही गोरक्षणी सभा बन गयी थी। तब विरोध हिंसक नहीं था। लेकिन अब तो मौत का तांडव हो रहा है। मैं खुद को अखलाख, पहलू , तबरेज जैसे लोगों की मौत का गुनहगार मानता हूं। गांधी जी बहुत बुझे मन से कहते हैं, घर जाओ और पढ़ो कि मैंने 92 साल पहले क्या लिखा है। लगता है गांधी जी आत्मा अपने सपनों का भारत बनाने के लिए आज भी भटक रही है।

92 साल पहले बताया था मॉब लिंचिंग का तोड़
सबेरे नींद खुलती है । सपनों की दुनिया से हकीकत में लौटता हूं। ये सपना काल्पनिक था लेकिन कई बातें स्मृतियों में अटकी हुई थीं। मन में जिज्ञाषा हुई कि आखिर पढ़े तो कि गांधी जी ने गोरक्षा और मुसलमानों के बारे में क्या लिखा है। लाइब्रेरी में गांधी साहित्य की खाक छानी। गांधी जी एक पत्रिका निकालते थे जिसका नाम था ‘यंग इंडिया'। ‘यंग इंडिया' में उन्होंने 7 जुलाई 1927 को गोरक्षा के बारे में लिखा था। इसके अलावा उन्होंने अपनी किताब ‘हिंद स्वराज' में विस्तार से लिखा था कि गाय की रक्षा के नाम पर किसी मुसलमान को क्यों नहीं मारना चाहिए।

एक की जान बचाने के लिए दूसरे की जान क्यों लें?
‘हिंद स्वराज' में पृष्ठ संख्या 32 से 34 तक इस बात का जिक्र है। गांधी जी ने लिखा है, मैं खुद गाय को पूजता हूं। गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है क्यों कि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का आधार है। ऐसा इसलिए है क्यों कि हिंदुस्तान खेती प्रधान देश है। मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे कि गाय उपयोगी है। जैसे मैं गाय को पूजता हूं वैसे ही मनुष्य को भी पूजता हूं। फिर वह चाहे हिंदू हो या मुसलमान। गाय रक्षा के लिए किसी से विनती की जा सकती है। अगर मैं बालिश्त भर नमूंगा ( झुकूंगा) तो वह हाथ भर नमेगा। अगर वह नहीं भी नमेगा तो मेरा नमना गलत नहीं कहलाएगा। लेकिन इसके लिए किसी मुसलमान की जान नहीं ली जा सकती। एक की जान बचाने के लिए दूसरे की जान कैसे ली जा सकती है। गांधी जी तो नहीं रहे, लेकिन अगर गांधीवाद भी जिंदा होता तो ऐसा भारत कभी न बनता।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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