G20 Summit: विश्व बिरादरी में भारत की नेतृत्व क्षमता को स्थापित करने का लक्ष्य
G20 Summit: 8 से 10 सितंबर तक दिल्ली में आयोजित हो रहा G20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल एक मेगा शो नहीं है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुखों के इस जमावड़े का उद्देश्य विश्व में भारत के नेतृत्व को स्थापित करना है। इसके पहले एक साथ कभी भी विश्व राजनीति के इतने नियंता यहां एक साथ कभी इकट्ठे नहीं हुए।
यह अवसर भारत के लिए अपनी विशालता, भव्यता और बहुलता दिखाने का भी है। पर भारत के लिए कुछ चुनौतियां भी हैं। G20 के वास्तविक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सर्वसम्मति कायम करना, एक समान अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था, अलग अलग गलाकाट आर्थिक प्रतियोगिता पर रोक, आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के काम काज में सुधार और खानों में बंटे देशों के बीच समन्वय आसान नहीं होगा। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के नहीं आने से फिर इस आशंका को बल मिला है कि G20 की इस बैठक का कोई बड़ा परिणाम निकलेगा या नहीं।

जब G20 का गठन हुआ तो इस बात पर लगभग सभी सदस्य देशों की सहमति थी कि G20 यह विचार करे कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बिखरी विश्व व्यवस्था में दुनिया को एक साथ कैसे रखा जाए। बड़े देश आपसी प्रतिद्वंद्विता के बजाय एक मुक्त व्यापार की व्यवस्था बनाएं, जिसमें सभी के लिए अवसर हो। दुनिया भर के आशावादियों को यह उम्मीद थी कि G20 संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी पुरानी संस्थाओं को बल देने का एक बड़ा आधार बनेगा और दुनिया के सामने आने वाली आर्थिक चुनौतियों से पार पाने का रास्ता सुझाएगा। पर अभी तक इसमें बहुत कुछ प्रगति नहीं हुई है।
2021 के G20 सम्मेलन में यह प्रस्ताव आया कि व्यापार में एक समान अवसर के लिए 15 प्रतिशत की दर से एक न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय आयात शुल्क की व्यवस्था लागू की जाए, लेकिन अभी तक इस पर कोई प्रगति नहीं हुई है। इस पर भी चर्चा हुई थी कि दुनिया भर में फैली अमेजन और अली बाबा जैसी मल्टी ब्रांड वाली कंपनियां उस देश में कुछ ना कुछ टैक्स जरूर दें, जहां वह सामान बेच रही हैं, भले ही उन्होंने अपना वहां कार्यालय खोला हो या ना खोला हो। जी 20 का एक मुद्दा सदस्यता को लेकर भी है।
यह कहा जा रहा है कि अर्जेंटिना जैसे देश इसके सदस्य हैं जिनकी न तो अर्थव्यवस्था बड़ी है और ना ही विश्व व्यापार में उनका कोई बड़ा योगदान है। दूसरी तरफ साउथ अफ्रीका को छोड़ कर कोई अन्य अफ्रीकी देश अभी G20 का स्थाई सदस्य नहीं बन पाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे अफ्रीकन यूनियन को G20 का पूर्ण सदस्य बनाने का प्रस्ताव किया है, जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी सहमति जताई है। पर चीन नये सदस्यों के शामिल किए जाने के तरीकों पर प्रश्न उठाता रहा है।
अफ्रीकी यूनियन में 54 देश शामिल हैं। भारत ने बांग्लादेश, नीदरलैंड, नाइजीरिया, इजिप्ट, मॉरीशस, ओमान, सिंगापोर, स्पेन और संयुक्त अरब अमीरात को भी ऑब्जर्वर देश के रूप में आमंत्रित किया है। G20 देशों के बीच में इस समय कई ऐसे द्विपक्षीय मामले उठ खड़े हुए हैं, जिससे इस संगठन से एक आवाज निकलने का इसका प्रारंभिक उद्देश्य विफल हो रहा है। खासकर चीन और रूस का अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ टकराव G20 को भी प्रभावित कर रहा है। दिल्ली की बैठक से चीनी राष्ट्रपति का अंतिम समय में अनुपस्थित रहने का फैसला इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। वैसे पुतिन भी नहीं आ रहे हैं, उन पर इंटरनेशनल क्राइम कोर्ट से गिरफ्तारी का वारंट निकला हुआ है, इसलिए वह रूस छोड़कर निकलने को तैयार नहीं है। मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के भी नहीं आने की खबर है।
अब सवाल यह है कि क्या चीन खेल बिगाड़ने में लगा है? निश्चय ही G20 के एक महत्वपूर्ण सदस्य होने के बावजूद चीन इसके महत्व को कम करने में लगा है। 2013 के बाद से ही चीन G20 को लेकर सवाल खड़ा करता रहा है। चीन का कहना है कि जी 20 में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन का बोलबाला है और उन्हीं के हितों की बात ज्यादा की जाती है। चीन ने कई मौकों पर खुलेआम यह बयान दिया है कि G20 के मंच से लिए गए फैसले लागू नहीं किए जाते या उनमें जानबूझ कर देरी की जाती है। खासकर आईएमफ कोटा में सुधार और पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी के मामले अभी भी लटके हुए हैं। बीजिंग ने यहां तक आरोप लगाया कि अमेरिका ने अपने लालच के कारण G20 को अपाहिज बना कर रखा हुआ है।
केवल चीन ही नहीं, रूस भी यह धमकी दे चुका है कि यदि दिल्ली के G20 मंच से यूक्रेन के मामले में रूस के रूख का विरोध किया गया तो वह संयुक्त घोषणा पत्र को आने नहीं देगा। यूक्रेन के मामले में अमेरिका और यूरोपीय यूनियन का रवैया एक दम रूस के खिलाफ है। अमेरिका समेत सभी नाटो देश रूस के खिलाफ यूक्रेन को लड़ने के लिए हथियार समेत सभी तरह की मदद पहुंचा रहे हैं। रूसी विदेश मंत्री इस सम्मेलन में आ रहे हैं, जिनको लेकर कई विवादास्पद बयान आ चुके हैं।
भारत के लिए अच्छी स्थिति यह है कि वह बिना अमेरिकी रूख से सहमति जताए रूस के साथ एक स्वतंत्र संबध बनाए हुए है। G20 की बैठक से पहले पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच टेलिफोन पर बातचीत हो चुकी है। इसलिए इस बैठक में रूस को लेकर कोई बड़ा हंगामा होने की संभावना नहीं है।
भारत इस मेगा इवेंट के जरिए ना सिर्फ दुनिया को यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि वह बिना किसी पक्ष के साथ खड़े हुए अंतरराष्ट्रीय संगठनों का नेतृत्व कर सकता है। इसके अलावा भारत इस अवसर का उपयोग द्विपक्षीय संबंधों को और प्रगाढ़ करने में करने वाला है। भारत-अमेरिका, भारत-फ्रांस और भारत यूएई की अलग से द्विपक्षीय वार्ता होने वाली है, जिसमें रणनीतिक मामलों से लेकर आर्थिक मामलों पर चर्चा होने वाली है।
यह भारत के लिए सौभाग्य की बात है कि कुछ ही दिनों के भीतर ब्रिक्स, आशियान और G20 जैसे सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक साथ अपनी आवाज बुलंद करने का अवसर मिला है। प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश है कि भारत जल्दी ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यव्यस्था बन जाए, उसका रास्ता इन्हीं संगठनों और भारत के सदस्य देशों के साथ आत्मीय संबंधों से निकलने वाला है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications