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Film on Savarkar: बॉलीवुड में बनने लगी ‘वर्जित विषयों’ पर फिल्में

पॉलीटिकल नैरेटिव सेट करने का अड्डा बने बॉलीवुड के लिए धर्म एवं समाज से जुड़े कुछ विषय वर्जित हो गये थे। लेकिन अब उन विषयों पर फिल्मों की बाढ़ आने वाली है।

veer savarkar

महाराष्ट्र में नायक की तरह सम्मान पाने वाले विनायक दामोदर सावरकर पर मुंबई में ही रचे बसे बालीवुड ने कभी सार्थक फिल्म बनाने की कोशिश नहीं की जिससे उनके जीवन के संघर्षों के बारे में लोगों को पता चलता। लेकिन लगता है अब फिल्म जगत के लिए सावरकर अछूत नहीं रहे। इस साल सावरकर जयंती पर 28 मई को उनकी जिंदगी की कहानी बड़े परदे पर बताने वाली एक नहीं बल्कि दो फिल्मों का ऐलान हुआ।

एक बालीवुड से तो दूसरी साउथ से। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि साउथ की इस फिल्म से चिरंजीवी के बेटे राम चरण अपने प्रोडक्शन हाउस की शुरूआत कर रहे हैं। यूं तो सावरकर के चाहने वाले पूरे देश में हैं, फिर भी हिंदी और मराठी बेल्ट में उनका प्रभाव अधिक है। ऐसे में तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री में होने के बाद भी अपनी पहली फिल्म सावरकर पर लेकर आना वाकई में बड़ी बात है।

इस मूवी का नाम होगा 'इंडिया हाउस'। इस मूवी का टाइटल जारी करते हुए अपने ट्वीट में राम चरण ने लिखा है कि, "हमारे महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर गारू की 140वीं जयंती पर हम द इंडिया हाउस की सगर्व घोषणा करते हैं। जय हिन्द।" अपने प्रोडक्शन की पहली मूवी में राम चरण खुद काम नहीं करेंगे, बल्कि कार्तिकेयन सीरीज के हीरो निखिल सिद्धार्थ उसके हीरो होंगे। साथ में होंगे अनुपम खेर और डायरेक्टर होंगे राम वाम्सी कृष्णा जो स्क्रीन राइटर भी हैं और इतिहास कलेक्टिव के संस्थापक भी।

रामचरण के प्रोडक्शन हाउस का नाम है 'वी मेगा पिक्चर्स' जिसमें उनके पार्टनर हैं विक्रम। द इंडिया हाउस फिल्म की टैगलाइन होगी 'जय माता दी' और फिल्म में निखिल के किरदार का नाम होगा 'शिवा'। इससे ये भी पता चलता है कि फिल्म में निखिल सावरकर का रोल नहीं करेंगे और सावरकर के समय की कहानी भी शायद ही हो, बल्कि ये कहानी भी उसी तरह की हो सकती है, जिस तर्ज पर निखिल की बाकी फिल्में, कश्मीर फाइल्स, ताशकंद फाइल्स आदि बनी हैं। यानी थोड़ा सा फ्लैशबैक और उससे जोड़कर वर्तमान और इन्वेस्टीगेशन।

जाहिर है कहानी का नाम 'इंडिया हाउस' रखा गया है, तो कहानी भी इंडिया हाउस की उसी इमारत के इर्दगिर्द घूमेगी, जिसको कभी विदेशों में क्रांतिकारियों से सबसे बड़े संरक्षक श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में बनवाया था। सावरकर उन्हीं की स्कॉलरशिप पर वहां पढ़ने पहुंचे थे। बाद में श्यामजी ने इंडिया हाउस की कमान सावरकर को सौंप दी और खुद फ्रांस चले गए। सावरकर ने वहां मदन लाल धींगरा को प्रशिक्षण दिया जिन्होंने कर्जन वाइली को मार दिया था। वहीं रहते हुए सावरकर ने बम बनाने का फार्मूला पहली बार अनुशीलन समिति के लोगों तक पहुंचाया था, जिससे बम बनाकर खुदीराम बोस को दिया गया, और उन्होंने उसका इस्तेमाल भी किया। इंडिया हाउस में रहते हुए सावरकर ने 20 पिस्तौल भी भिजवाई थी जिनमें से एक से अनंत कन्हेरे ने नासिक के कलेक्टर जैक्सन को उड़ा दिया था। सावरकर की गिरफ्तारी के बाद इंडिया हाउस सील कर दिया गया। अनंत कन्हेरे और मदन लाल धींगरा को फांसी दे दी गई।

इंडिया हाउस का मोदी कनेक्शन
सावरकर को काला पानी भेज दिया गया, इधर श्यामजी कृष्ण वर्मा की स्विटजरलैंड में मौत हो गई। मौत से पहले उन्होंने अपनी व पत्नी की अस्थियों के लिए वहां के एक अस्थि बैंक से टाईअप कर लिया था। अस्थियों को 100 साल की फीस देकर वहां रखवा दिया यह कहकर कि देश जब आजाद होगा तो कोई देशभक्त इन्हें भारत ले जाएगा।

देश 17 साल बाद आजाद भी हो गया और 55 साल और गुजर गए। 2003 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को जब इसके बारे में पता चला तो वह खुद इस गुजराती सपूत की अस्थियां भारत लेकर आए।

गुजरात के मांडवी के रहने वाले थे श्याम जी कृष्ण वर्मा, उनकी याद में मोदी ने मांडवी में ही इंडिया हाउस जैसा ही उनका स्मारक बनवाया, हूबहू वैसा ही। उसके बाहर उन दोनों की मूर्तियां भी लगवाईं। सावरकर के संरक्षक श्याम जी की जब मौत हुई थी तो जेल में बंद भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ शोक सभा भी रखी थी। अब सवाल ये है कि 'इंडिया हाउस' की ही कहानी दिखाएंगे राम चरण या फिर उसके इर्द गिर्द कार्तिकेय जैसी ही कोई फंतासी रचेंगे, इसके लिए इंतजार करना होगा।

हुड्डा की मूवी के टीजर में ही कांग्रेस पर निशाना
दूसरी फिल्म है 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर', जिसे लेकर आ रहे हैं रणदीप हुड्डा। फिल्म का जो टीजर जारी हुआ है वह बताता है कि यह सावरकर के जीवन पर बनी है। इस फिल्म को आनंद पंडित और संदीप सिंह ने प्रोडयूस किया है। संदीप सिंह की पहचान उरी, पीएम नरेन्द्र मोदी, मैरी कॉम, सरबजीत जैसी असली कहानियों पर फिल्में बनाने के लिए है। ऐसे में सरबजीत के एक्टर रणदीप हुडडा को ही उन्होंने डायरेक्शन की कमान सौंप दी है, जिसमें सावरकर का रोल भी वो खुद ही कर रहे हैं।

हालांकि उनकी मूवी का टीजर विवाद पैदा करने वाला है। उन्होंने अपने टीजर में लिखा है कि सावरकर ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस और भगत सिंह को प्रेरणा दी। इस पर नेताजी बोस पर शोध करने वाले लेखक चंद्रचूड़ घोष ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्वीट किया है कि नेताजी बोस और खुदीराम बोस ने सावरकर से प्रेरणा नहीं ली, हालांकि उनके रिश्ते रहे हैं।

ये तो सर्वविदित तथ्य है कि खुदीराम बोस ने जो बम फेंका था, उसे सावरकर द्वारा भेजे गए बम मैन्युअल से ही बनाया गया था। सावरकर द्वारा नेताजी को एक सशस्त्र फौज बनाने की सलाह भी काफी चर्चा में रही है। फॉरवर्ड ब्लॉक का हिंदू महासभा के साथ चुनावों में टाईअप भी रहा था, लेकिन ये भी सही है कि सावरकर का राजनीतिक स्वरूप बोस को पसंद नहीं आया था। तब नेताजी ने एक दो बयान उनके खिलाफ भी दे दिये थे, जिसे सावरकर विरोधी इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन ये भी सर्वविदित है कि आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को प्रेरणा देने के लिए बोस ने सावरकर की किताब '1857 का स्वातंत्र्य समर' का बंगाली अनुवाद भी करवाया था।

हालांकि ये मूवी टीजर में सीधे सीधे कांग्रेस के आजादी की लड़ाई में योगदान को खारिज करती है और गांधीजी के अहिंसात्मक रवैये पर सवाल उठाती है। इस मूवी का एक डॉयलॉग सामने आया है जिसमें कहा जाता है कि 'आजादी की लड़ाई लड़ने वाले तो कम ही थे, बाकी सब तो सत्ता के भूखे थे।' इस टीजर में एक डॉयलॉग और है कि 'गांधीजी अहिंसात्मक रवैया ना अपनाते तो आजादी 35 साल पहले मिल जाती।'

इसी तरह राजस्थान चुनाव से पहले बड़ा धमाका 'अजमेर 92' फिल्म के रूप में होने वाला है, जो कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। दरअसल 1992 में अजमेर में एक बड़ा खुलासा हुआ था कि कैसे युवक कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दो स्कूलों की 250 लड़कियों को एक एक करके जाल में फंसा लिया था। उनके फोटोज, वीडियोज बना लिए और लम्बे समय तक उनका यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग की। इन नेताओं में दो युवा नेता अजमेर दरगाह के खादिम थे। इस मूवी को पुष्पेन्द्र सिंह निर्देशित कर रहे हैं जो 14 जुलाई को रिलीज होने जा रही है। इसमें दिखाया जाएगा कि कैसे कांग्रेस और दरगाह के अधिकारियों के दवाब में कुछ गिरफ्तारियां तो हुईं, लेकिन सजा नहीं हो पाई। राजस्थान चुनाव सिर पर हैं, तो कांग्रेस को दिक्कत तो होनी ही है।

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    कुल मिलाकर तीनों ही फिल्में आज की नई पीढ़ी के लिए काफी विस्फोटक जानकारियों से भरी रहने वाली हैं। लोग भी पूछेंगे कि यह सच अब तक क्यों छुपाया गया था? सो राजनीतिक पार्टियों को भी समझ में आएगा कि अभिव्यक्ति सो राजनीतिक पार्टियों को भी समझ में आएगा कि अभिव्यक्ति को नैरेटिव के नाम पर दबाना नहीं चाहिए वरना एक समय के बाद वो ज्यादा ताकतवर तरीके से उभरते हैं और दबाने वाले का नुकसान भी अधिक करते हैं।

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