Sita Soren: भ्रष्टाचार एवं परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई और सीता सोरेन

शिबू सोरेन की बड़ी पुत्रवधू सीता सोरेन के भाजपा में शामिल होने की खबर के साथ ही पार्टी के महासचिव विनोद तावड़े की ओर से उनका स्वागत किए जाने की फोटो ने चौंकाया।

शिबू सोरेन के बड़े बेटे दुर्गा सोरेन की मौत के बाद उनकी पत्नी सीता सोरेन परिवार की राजनीतिक विरासत संभालना चाहती थी, लेकिन शिबू सोरेन ने अपने छोटे बेटे हेमंत सोरेन को आगे कर कर दिया। तब से सीता सोरेन की राजनीतिक विरासत की लड़ाई अपने देवर हेमंत सोरेन से है।

Fight against corruption and nepotism and Sita Soren

जमीन घोटाले में गिरफ्तार होने से पहले हेमंत सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनवाना चाहते थे, जिसका सीता सोरेन विरोध कर रही थी। आखिर पार्टी के वरिष्ठ नेता चंपई सोरेन के नाम पर सहमति हो गई और वह मुख्यमंत्री बन गए, उन्होंने बहुमत भी साबित कर दिया। लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस अभी भी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनवाना चाहते हैं।

अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने कल्पना सोरेन से मुलाक़ात की थी। चंपई सोरेन 18 मार्च को मुम्बई में इंडी गठबंधन की रैली में अपने साथ कल्पना सोरेन को भी लेकर गए, जहां झारखंड मुक्ति मोर्चे के प्रतिनिधि के तौर पर मंच से उनका भाषण भी हुआ।

Fight against corruption and nepotism and Sita Soren

सीता सोरेन को आशंका है कि चंपई सोरेन की जगह कभी भी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, क्योंकि उन्हें पार्टी की नेता के तौर पर उभारने की कोशिश की जा रही है। सीता सोरेन ने कल्पना के इंडी एलायंस मंच से भाषण पर सवाल उठाया और झामुमो छोड़ कर भाजपा ज्वाईन कर ली।

सवाल यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार गिराने के लिए भारतीय जनता पार्टी उस परिवार की बहू को अपनी पार्टी में क्यों ले रहा है, जो खुद भी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है, और जिसका परिवार भी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है। क्या इससे नरेंद्र मोदी की परिवारवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर नहीं होगी? ठीक इसी तरह सवा महीना पहले आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले के आरोपी अशोक चव्हाण की भाजपा में एंट्री के साथ ही उन्हें राज्यसभा टिकट दिए जाने की घटना ने भी मोदी समर्थकों को चौंका दिया था।

इन दोनों खबरों के बीच सिर्फ 15 दिन पहले 4 मार्च को सुप्रीमकोर्ट का एक एतिहासिक फैसला आया है, जिसे आज फिर याद किया जाना जरूरी है। 4 मार्च को सुप्रीमकोर्ट की सात जजों की बेंच ने 1998 के पांच जजों के फैसले को पलट दिया था। 1998 और 2024 के दोनों फैसलों से शिबू सोरेन और उनकी पुत्रवधू दोनों का ताल्लुक है, इसलिए इन दोनों फैसलों को आज याद किया जाना जरूरी है।

भाजपा को सीता सोरेन की पार्टी में एंट्री करवाने से पहले 4 मार्च 2024 के सुप्रीमकोर्ट के सात जजों की बेंच के फैसले को जरूर ध्यान में रखना चाहिए था। पहले 1998 के फैसले की बात कर लेते हैं, जिसका सीधा ताल्लुक शिबू सोरेन से है।

इसकी शुरुआत जुलाई 1993 में हुई थी, जब भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा गया था। अविश्वास प्रस्ताव में राव सरकार का गिरना तय था। अपनी अल्पमत सरकार बचाने के लिए राव ने अपने रणनीतिकारों से सांसदों का जुगाड़ करने को कहा था। उनके रणनीतिकारों गृह मंत्री बूटा सिंह, पेट्रोलियम मंत्री सतीश शर्मा और हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल ने ऐसे सांसदों से संपर्क किया, जिन्हें लालच देकर खरीदा जा सकता था।

इस समय के दो प्रकरण थे, एक प्रकरण तो जनता दल के बिहार के सांसद राम लखन सिंह यादव का था। वह जनता दल छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे, उन्हें कैश के साथ साथ नरसिंह राव ने अपनी सरकार में उर्वरक मंत्री भी बना दिया था। बाद में राम लखन सिंह के बेटे प्रकाश यादव ने नरसिम्हा राव के बेटे प्रभाकर राव और भतीजे संजीव राव के साथ मिल कर 133 करोड़ का यूरिया घोटाला किया। इसमें 133 करोड़ की राशि एडवांस दे दी गई थी, जबकि यूरिया आया ही नहीं।

सीबीआई ने दो साल पहले क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश की थी, लेकिन कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने के बजाए सीबीआई को फटकार दिया था। इस बीच एक बार नरसिंह राव के छोटे बेटे प्रभाकर राव की गिरफ्तारी भी हुई थी।

दूसरा केस सीता सोरेन के ससुर और जमीन घोटाले में गिरफ्तार हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन से जुडा है। शिबू सोरेन उस समय भी झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष थे। वह सांसद भी थे और उनके साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा के तीन और सांसद थे, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल और साइमन मरांडी। इन चारों सांसदों ने नरसिंह राव सरकार बचाने के लिए 55-55 लाख रूपए रिश्वत ली थी। कैश का इंतजाम हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल और पेट्रोलियम मंत्री सतीश शर्मा ने किया था।

रिश्वत का धन क्योंकि चारों सांसदों ने बैंक खातों में जमा किया था, इसलिए कोई मुकर भी नहीं सकता था। मामला सुप्रीमकोर्ट में गया, उन चारों ही सांसदों ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वीकार किया था कि 1993 में उन्हें विश्वासमत के पक्ष में वोटिंग के लिए कांग्रेस पार्टी ने धन दिया था।

इसके बावजूद सुप्रीमकोर्ट की पांच जजों की बेंच ने बहुमत के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 105(2) में सांसदों को मिले विशेषाधिकार का हवाला देकर मुकद्दमे को ही रद्द कर दिया था। सारा देश सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से दंग रह गया था। इसी तरह का एक प्रावधान अनुच्छेद 194 (2) में भी है, जो विधायकों को भी इसी तरह का विशेषाधिकार देता है। सुप्रीमकोर्ट के इस एक गलत फैसले के बाद सांसदों और विधायकों को रिश्वत लेने की छूट मिल गई थी।

26 साल बाद भी सुप्रीमकोर्ट के इस गलत फैसले की समीक्षा नहीं होती, अगर शिबू सोरेन की पुत्रवधू सीता सोरेन पर 2012 में राज्यसभा चुनाव के दौरान वोट के बदले रिश्वत लेने का आरोप न लगता। सीता सोरेन ने अपने बचाव में संविधान के अनुच्छेद 194 (2) में मिली छूट और सुप्रीमकोर्ट के 1998 के फैसले को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। तब जाकर 1998 के फैसले की समीक्षा की जरूरत महसूस हुई और चीफ जस्टिस ने सात सदस्यीय बेंच गठित की।

सुनवाई के दौरान मोदी सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने सुप्रीमकोर्ट में कहा था कि राज्यसभा चुनाव के लिए वोटिंग का सदन की कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है, इसलिए राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के लिए रिश्वत लेने के खिलाफ सीता सोरेन का मामला कानूनी दायरे में आता है। इसी चार मार्च को सुप्रीमकोर्ट की सात सदस्यीय बेंच ने 1998 का अपना फैसला पलटते हुए कहा है कि अनुच्छेद 105 (2) या अनुच्छेद 194 (2) में मिला विशेषाधिकार सदन के साझा कामकाज से जुड़े विषय के लिए है, वोट के लिए रिश्वत लेना विधायी काम का हिस्सा नहीं है।

सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से शिबू सोरेन भी दोषी करार होते हैं, और उनकी पुत्रवधू सीता सोरेन भी। सीता सोरेन को रिश्वत लेने का दोषी करार दिए जाने के सिर्फ 15 दिन बाद ही जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने उनका पार्टी में स्वागत किया है, वह भाजपा की परिवारवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर सवाल खड़ा करता है। मोदी सरकार ही ने खुद सितंबर 2023 में सुप्रीमकोर्ट से 1998 के उसके फैसले को फिर से खोलने का आग्रह किया था।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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