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बालाघाट से बारामती तक चुनावी चक्कर में बिखर रहे परिवार

Balaghat Lok Sabha Seat: देश की राजनीति ऐसी होती जा रही है कि समाज में ही बंटवारा नहीं हो रहा बल्कि घरों में भी फूट पड़ रही है और पति पत्नी के रिश्ते तक बिखर रहे हैं। मध्य प्रदेश की बालाघाट लोकसभा सीट पर इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है जहां पति पत्नी के दिलों में राजनीति ने दरार पैदा कर दी है।

1989 में बालाघाट से निर्दलीय सांसद कंकर मुंजारे परसवाड़ा विधानसभा सीट से 1985 में जनता पार्टी की टिकट पर, 1993 में समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी से और 1998 में पुनः जनता पार्टी की टिकट पर विधायक चुने गए थे जबकि इनकी पत्नी अनुभा मुंजारे सात बार विधानसभा चुनाव और तीन बार सांसदी का चुनाव लड़ने के पश्चात आखिरकार 2023 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में बालाघाट विधानसभा सीट से पहली महिला विधायक बनने में सफल हुईं।

इस हिसाब से कंकर मुंजारे का राजनीतिक अनुभव अपनी पत्नी के मुकाबले अधिक है जिसे अनुभा भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करती हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि वे अपने पति के चलते ही राजनीति में आई अन्यथा वे स्कूल में अध्यापिका होतीं। विपरीत वैचारिक मत के बाद भी दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं किंतु लोकसभा चुनाव में अब एक-दूसरे पर जमकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

दरअसल, कंकर मुंजारे इस बार बहुजन समाज पार्टी की टिकट पर बालाघाट संसदीय सीट से लोकसभा प्रत्याशी हैं जबकि उनकी पत्नी कांग्रेस विधायक अनुभा मुंजारे कांग्रेस प्रत्याशी सम्राट सिंह सरस्वार के लिए वोट मांग रही हैं। हालांकि ऐसा पहले भी हुआ है कि एक ही परिवार के सदस्य भिन्न प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करें किंतु इन पति-पत्नी का मामला अनोखा होता जा रहा है। कंकर मुंजारे ने वैचारिक मतभेद के चलते अपना घर छोड़कर बालाघाट से 20 किलोमीटर दूर खेत में झोपड़ी बना ली है और वे वहीं रह रहे हैं जबकि उनकी पत्नी अपने बेटे के साथ घर में रहती हैं।

कंकर मुंजारे कांग्रेस प्रत्याशी सम्राट सिंह पर राजनीतिक हमले करने के बजाए अपनी विधायक पत्नी पर क्षेत्र की अनदेखी करने और ओलावृष्टि के समय मथुरा-वृन्दावन घूमने का आरोप लगा रहे हैं जिस पर उनकी पत्नी 'सब आपसे ही सीखा है' कहकर कंकर मुंजारे को असहज कर रही हैं। कंकर तो यहां तक भी बोल गए कि यदि अनुभा उनकी पत्नी न होतीं तो वे विधायक बनने के लायक ही नहीं थीं।

दोनों के बीच वैचारिक मतभेद उनके घर पर भी दिख रहा है जहां कांग्रेस का झंडा लगा है और बसपा का झंडा कंकर मुंजारे ने उतारकर अपनी झोपड़ी पर लगा दिया है। 19 अप्रैल को प्रथम चरण के मतदान में बालाघाट सीट पर जब मतदान पूर्ण होगा, उसके बाद कंकर मुंजारे ने अपने घर वापस जाने की बात कही है किंतु जो राजनीतिक अलगाव दोनों में हो गया है, उससे क्या इनका आपसी सामंजस्य और वैवाहिक जीवन पटरी पर आ पाएगा, यह मध्य प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है।

यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि कंकर मुंजारे कांग्रेस से लोकसभा का टिकट मांग रहे थे जो उन्हें नहीं मिला और अनुभा मुंजारे जिन सम्राट सिंह का चुनाव प्रचार कर रही हैं, उनके पिता अशोक सिंह सरस्वार से वे स्वयं दो बार विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं।

पवार परिवार में बंटवारा
शरद पवार के गढ़ बारामती लोकसभा में भी स्थिति ऐसी बन गई है जो आम जनता के साथ ही पवार परिवार को असहज कर रही है। अजीत पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार के सामने एनसीपी संस्थापक शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले खड़ी हैं जिससे पहले से छिन्न-भिन्न पवार परिवार में और कलह बढ़ गई है। ननद-भाभी के बीच की लड़ाई ने चाचा-भतीजा के आपसी मतभेद को मनभेद में बदल दिया है।

शरद पवार किसी भी कीमत पर सुप्रिया सुले को जिताना चाहते हैं जबकि अजीत पवार अपनी पत्नी के सहारे अपने चाचा को राजनीतिक रूप से समाप्त करना चाहते हैं। यह तभी संभव है, जब वे चाचा से बारामती छीन लें क्योंकि चाचा की राजनीतिक गर्भनाल बारामती है। एक बार बारामती से चाचा को दूर किया तो पूरी राजनीतिक विरासत पर अजीत पवार का कब्जा हो जाएगा। तब सुप्रिया सुले को भी उनकी सरपरस्ती में आना होगा और यही शरद पवार नहीं चाहते।

इसलिए शरद पवार सुप्रिया की जीत में कोई कसर नहीं छोड़ रहे किंतु क्षेत्र में अजीत पवार का भी खासा समर्थक वर्ग है जो शरद पवार को चिंतित कर रहा है। राजनीतिक विरासत के चलते टूट चुके पवार परिवार की वैचारिक लड़ाई अब परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी दुविधा का कारण बन रही है।

राजनीति ने तोड़ा पति-पत्नी का रिश्ता

2019 में लोकसभा चुनाव से पूर्व तृणमूल कांग्रेस के नेता सौमित्र खान ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था और विष्णुपुर लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद भी बन गए। उनके चुनाव प्रचार में उनकी पत्नी सुजाता मंडल ने दिन-रात एक कर दिए किंतु 2022 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान सुजाता मंडल ने भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ले ली जिससे उखड़कर सौमित्र खान ने सुजाता मंडल से तलाक ले लिया।

दोनों राजनीति की अलग-अलग पटरियों पर सरपट दौड़ रहे थे किंतु लोकसभा चुनाव ने दोनों को पुनः एक-दूसरे के सामने ला खड़ा किया। सौमित्र खान विष्णुपुर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं जबकि सुजाता मंडल को तृणमूल कांग्रेस ने इसी लोकसभा सीट से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है। अब दोनों पति पत्नी एक-दूसरे पर जमकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं जबकि दोनों ने 2016 में प्रेम विवाह किया था। कई बार यह भड़ास एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक भी पहुंच रही है जिसे क्षेत्र की जनता चटखारे लेकर सुन रही है।

ये चंद उदाहरण पर्याप्त हैं राजनीति में आई गिरावट को पुष्ट करने के लिए। एक समय प्रतिद्वंद्वी आपसी सम्मान तथा वैचारिक मतभिन्नता को राजनीतिक लाभ-हानि के आड़े नहीं आने देते थे किंतु अब राजनीतिक मतभिन्नता पारिवारिक रिश्तों पर भारी पड़ने लगी है। चूंकि वर्तमान में राजनीति सत्तासुख का पर्याय बन गई है अतः रिश्तों को भी अधिक फर्क नहीं पड़ रहा। सभी मात्र सत्तासुख के भूखे हैं और येन-केन-प्रकारेण स्वयं सत्ता सुख भोगना चाहते हैं, फिर भले ही पारिवारिक मूल्यों तथा रिश्तों की बलि ही क्यों न चढ़ जाए।

कभी नेहरु गांधी परिवार में निजी रिश्तों में खटास की वजह से संजय गांधी और राजीव गांधी के परिवार ने अपना रास्ता अलग कर लिया था। आज अलग होकर भी अपनी जीत सुनिश्चित करने का यह नशा नीचे तक पहुंच चुका है। राजनीतिक जागरुकता अपनी जगह लेकिन चुनावी टकराव की वजह से नेता से लेकर वोटर तक के परिवार में जिस तरह का बिखराव हो रहा है, वह कहीं से स्वागतयोग्य नहीं कहा जाएगा।

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