Ex-Muslims: दरक क्यों रही है ईमान की मजबूत दीवार?
Ex-Muslims: समकालीन संसार में साइंटिफिक सोसायटी एक ऐसा ही टर्म बन गया है जिसमें रहनेवाले लोग अपने आप को लगभग नास्तिक ही मानते हैं। जिन प्रतीकों को ईश्वरीय सत्ता या फिर पूज्यनीय माना जाता था, साइंस ने उसको नये तरह से परिभाषित करके धार्मिक विश्वास को चुनौती दी है।
ये साइंटिफिक सोसाइटी जरूर नयी है लेकिन धर्म विरोधियों का एक वर्ग सदैव ही रहा है। यूरोप में चर्च के पतन के बाद वहां साइंस ने व्यापक स्तर पर नास्तिक पैदा किये। बाइबिल या चर्च समूह जिन बातों पर लोगों को विश्वास दिलाते थे, साइंस ने सब तार तार कर दिया। आज लगभग आधा यूरोप नाम का ईसाई है। वो ईश्वर या गॉड में विश्वास नहीं करते। चर्च तो खैर जाते ही नहीं।

लेकिन इन सबसे वो इस्लाम अब तक अछूता रहा है जो संसार में सबसे तेजी से बढ़नेवाला रिलीजन है। इस्लामिक ईमान को चुनौती नहीं दी जा सकती। उसका ईमान है अल्लाह और उसके रसूल। ईमान किसी मुसलमान के लिए कसौटी की तरह होते हैं। उसमें रत्तीभर भी शंका पैदा होते ही वह अपने मुसलमान होने से चूक जाता है। इसलिए उसके लिए जरूरी है कि वह अपने मुसलमान होने पर पूरा भरोसा करे और इस्लाम द्वारा वर्णित हर एक बात को अक्षरस: सत्य मानकर उस पर बिना कोई सवाल उठाये यकीन करे।
अपनी इसी परिपाटी के कारण मुसलमानों में इस्लाम के नाम पर बताये गये सिद्धांतों पर सवाल उठाने की परंपरा नहीं रही है। लेकिन नयी तकनीकी के उभार ने इस्लाम की इस सबसे मजबूत दीवार पर करारा वार किया है। आज सोशल मीडिया के जरिए एक्स मुस्लिम या मुस्लिम समाज में नास्तिकता इस्लाम के लिए नया शब्द बनकर उभरा है।
सोशल मीडिया पर अपने आप को एक्स मुस्लिम कहने की शुरुआत 2012 के बाद शुरु हुई। इराक में आईसिस के उभार के बाद पहली बार अमेरिका में एक्स मुस्लिम कहने का चलन शुरु हुआ। वो मुसलमान जो भीतर से इस्लामिक सिद्धांतों से सहमत नहीं थे, उन्होंने अमेरिका के खुले वातावरण में बैठकर पहली बार कहा कि वो अब मुसलमान नहीं है। अयान हिर्षी अली, अली सीना जैसे पूर्व मुसलमानों ने इस दिशा में साहित्यिक काम किया और इस्लाम में सबसे पवित्र व्यक्तित्व उनके पैगंबर की भी नये सिरे से समीक्षा की।
अयान हिर्षी अली और अली सीना ये नाम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पूर्व में मुस्लिम रह चुके हैं। इसके अलावा पश्चिम के अनेक विद्वानों ने इस्लाम में आतंकवाद की जड़े खोजने और उन्हें बताने का भी काम शुरु किया। सोशल मीडिया के जरिए ये सूचनाएं जंगल में आग की तरह फैली।
देखते ही देखते पांच सात साल के भीतर एक्स मुस्लिम सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड बन गया। लोग बदले हुए नामों के साथ, अपना चेहरा छिपाकर न केवल स्वयं के एक्स मुस्लिम होने का ऐलान करने लगे बल्कि और लोगों से संवाद स्थापित करके उनके मन में भी इस्लाम को लेकर शंका पैदा करनी शुरु कर दी।
ऐसा नहीं है कि इस्लाम पर ये सवाल पहली बार उठ रहे हैं। इस्लाम पर पश्चिम से भी पहले सवाल भारतीय मुसलमानों ने उठाया था। इसमें सबसे बड़ा नाम सलमान रुश्दी का है। हालांकि सलमान रुश्दी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी और वो लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे हैं।
सलमान रुश्दी के अलावा जिस भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान ने न सिर्फ इस्लाम को अरब की गुलामी बताया बल्कि इस्लाम का त्याग भी कर दिया वो थे कश्मीर मूल के अनवर शेख। सत्तर के दशक में अनवर शेख ने इस्लाम का त्याग कर दिया था और पुन: वैदिक धर्म में लौट आये। अनवर शेख का जन्म पाकिस्तान के पंजाब में जरूर हुआ था लेकिन मौलवियों की धमकी और फतवा के कारण वो ब्रिटेन में निर्वासित जीवन व्यतीत करते थे।
अनवर शेख ने इस्लाम की सच्चाई बताते हुए कई किताबें लिखीं। इनमें प्रमुख हैं, इस्लाम: द अरब इम्पिरियलिज्म, इस्लाम: द अरब नेशनल मूवमेन्ट, इस्लाम: सेक्स एण्ड वायलेन्स, फेथ एण्ड डिसेप्शन, इस्लाम एण्ड टेररिज्म तथा सेस्कुअल डिफेक्शन प्रमुख हैं। अनवर शेख की इन किताबों के कारण उनके खिलाफ पाकिस्तान में मौत का फतवा जारी हुआ लेकिन वो फतवों के कारण नहीं बल्कि 2006 में अपनी स्वाभाविक मौत मरे। मरने से पहले वो इस्लाम को अरब की मानसिक गुलामी बताते हुए जीवन भर प्रचार करते रहे।
अनवर शेख की तरह ही तस्लीमा नसरीन ने भी इस्लाम पर सवाल उठाया लेकिन आज भी अपने सवालों के कारण वो बांग्लादेश से निर्वासित जीवन जी रही हैं। लेकिन ये तो वो कुछ चंद नाम हैं जिन्होंने इंटरनेट युग से पहले इस्लाम पर सवाल उठाया और अलग थलग पड़ गये। वर्तमान समय में इंटरनेट के जरिए जो लोग इस्लाम पर सवाल उठा रहे हैं या फिर स्वयं इस्लाम छोड़कर दूसरे मुसलमानों को इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं वो अलग थलग नहीं हैं। नयी तकनीकी ने उन्हें नया मौका दिया है कि वो अपने जैसे लोगों के साथ जुड़ सकें, संवाद कर सकें और अपने भीतर के सवालों को दूसरों तक पहुंचा सकें।
इस कड़ी में इंटरनेट युग में भारतीय उपमहाद्वीप के पहले घोषित एक्स मुस्लिम हैं हारिस सुल्तान। हारिस सुल्तान मूलत: पाकिस्तानी पंजाब के रहनेवाले हैं और इस समय आस्ट्रेलिया में रहते हैं। आस्ट्रेलिया में ही उन्होंने 2018 में एक किताब लिखी, "द कर्स आफ गॉड: व्हाई आई लेफ्ट इस्लाम।" लेकिन उन्होंने सिर्फ किताब ही नहीं लिखी। उसके बाद उन्होंने एक यू ट्यूब चैनल बनाया और आज वो भारत पाकिस्तान के मुसलमानों और पूर्व मुसलमानों से नियमित संवाद करते हैं। हारिस सुल्तान का कहना है कि जिस हिंसक तरीके से पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर लोगों को मार दिया जाता है उसने उन्हें मजबूर किया कि वो इस्लाम की सच्चाई को जाने और लोगों को भी बतायें।
जब इंटरनेट पर इस्लाम छोड़कर आनेवालों की हवा चली तो भारत से भी मुसलमान फेसबुक, यूट्यूब पर आने लगे और इस्लाम की सच्चाई बताने लगे। इसमें जो भी यूट्यूब पर या सोशल मीडिया पर आये उन्होंने अपनी पहचान छिपाते हुए कोई छद्म नाम रख लिया। वो अपना चेहरा भी सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाते हैं। इंटरनेट इन्हें यह सुविधा देता है कि वो अपनी पहचान छिपाकर बात कर सकें। वही वो कर भी कर रहे हैं।
इसमें पाकिस्तानी मूल के एडम सीकर, भारत के साहिल, सचवाला, साजिद, समीर जैसे कई नाम है जो इस्लाम छोड़कर अब उसके खिलाफ ही इंटरनेट पर तब्लीग करते हैं। इन लोगों में जो बात सामान्यतया एक जैसी है वो यह कि वो इस्लाम के बारे में सही बातें मुसलमानों को ही नहीं बताई जाती जिससे उसे पता ही नहीं होता कि उनकी किताबों में क्या लिखा हुआ है।
इनका कहना है कि दीन के बारे में पूरी तरह से अपने आलिमों पर निर्भर रहनेवाला मुसलमान इस्लाम को उतना ही जानता है जितना उसके मुल्ला मौलवी उसे बताते हैं। इन एक्स मुस्लिमों का दावा है कि वो इस्लाम की सच्चाई मुसलमानों के सामने लाना चाहते हैं। इन एक्स मुस्लिमों को भरोसा है कि इस्लाम की सच्चाई जानने के बाद बड़ी संख्या में मुसलमान अपने आप ही इससे दूर हो जाएंगे।
फिर भी इस्लाम छोड़कर इस्लाम की सच्चाई बतानेवालों की तादात अभी इतनी नहीं है कि उनकी कोई उपस्थिति दर्ज हो सके। इक्का दुक्का की संख्या में ही मुसलमान हैं जो यह कहने का साहस रखते हैं कि उन्होंने इस्लाम को छोड़ दिया है। लेकिन ऐसा करनेवालों के सामने धार्मिक संकट के साथ साथ सामाजिक संकट भी मुंह बाये खड़ा है। इस्लाम छोड़नेवाले मुसलमान को इस्लामिक सोसायटी में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। उनका परिवार भी उनसे सारे रिश्ते खत्म कर लेता है। कई दफा तो खिलाफ बोलनेवालों को जान से मारने की कोशिश भी की जाती है।
लेकिन यही इकलौता संकट नहीं है जो इस्लाम छोड़नेवाले मुसलमानों के सामने है। इससे तो वो किसी तरह बच लेते हैं लेकिन फिर उनके सामने उस सामाजिकता का संकट खड़ा होता है जो अब तक इस्लाम में उन्हें मिलता रहा है। भारत की जटिल सामाजिक संरचना में जातीय अस्तित्व के बिना अपने आपको सामाजिक रखना बहुत कठिन है। शादी विवाह सहित अन्य बहुत सारे रिश्ते नाते जातीय व्यवस्था के तहत ही संचालित होते हैं। भारत में इस्लाम छोड़नेवालों के सामने यही असली संकट है कि इस्लाम की गैर मानवीय बुराइयां देखकर उसमें रह भी नहीं सकते लेकिन छोड़कर जाएं तो कहां जाएं?
ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि एक्स मुस्लिम मूवमेन्ट आगे क्या स्वरूप लेगा। हां, इतना जरूर होगा कि इनके उभार से मुसलमानों के भीतर ही इस्लाम को लेकर एक नयी बहस शुरु हो रही है। यह बहस सच्चे इस्लाम को जानने समझने में मुसलमानों की जरूर मदद करेगी। फिलहाल यही इस मूवमेन्ट की उपलब्धि कही जाएगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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