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मुख्यमंत्री से मंत्री बनने वाले पहले नेता नहीं हैं फडणवीस

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इन दिनों महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके देवेन्द्र फडणवीस चर्चा में है। भाजपा के विरोधी नेता भी उनके साथ सहानुभूति दिखा रहे हैं। यह सहानुभूति वाली चर्चा इसलिए की जा रही है कि भाजपा का इतना कद्दावर नेता, दो बार का मुख्यमंत्री जिसने भाजपा की महाराष्ट्र में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई हो वह मुख्यमंत्री बनने की बजाय उपमुख्यमंत्री बनकर काम करने को "मजबूर" है। लेकिन यह पहला मौका नहीं है, जब महाराष्ट्र का कोई मुख्यमंत्री बाद की सरकार में बतौर मंत्री शामिल हुआ हो।

devendra fadnavis is not the first leader to become a minister from chief minister

राजनेता इसे पदावनति नहीं मानते। अगर ऐसा होता तो आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल रहे सी राजगोपालाचारी, बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री न बनते। जिसने पूरे देश का नेतृत्व किया, वह एक राज्य का मुख्यमंत्री बने, अटपटा तो लगता है। लेकिन राजनीति नयी चुनौतियों और नयी परिभाषाओं का खेल है। देर-सवेर देवेंद्र फणनवीस को लेकर जारी चर्चाएं भी थम जाएंगीं।

वैसे देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जो पहले मुख्यमंत्री रहे और बाद में उन्हें किसी अन्य मुख्यमंत्री के अधीन काम करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में उनसे पहले राज्य के चार और नेता पहले मुख्यमंत्री रहे और बाद की सरकारों में वे बतौर मंत्री शामिल हुए। इस सूची में पहला नाम शंकर राव चव्हाण का है। शंकर राव चव्हाण ने 21 फरवरी 1975 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस पद पर वे 18 जुलाई 1978 तक रहे। लेकिन बाद में वे शरद पवार के मंत्रिमंडल में शामिल हुए।

मुख्यमंत्री के बाद मंत्री बनने वाले महाराष्ट्र के दूसरे राजनेता रहे शिवाजी राव पाटिल निलंगेकर। निलंगेकर तीन जून 1985 से 6 मार्च 1986 तक मुख्यमंत्री रहे। इस बीच उन पर अपनी बेटी को गलत तरीके से एमडी में दाखिला दिलाने का आरोप लगा और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। बाद की सरकार में वे मंत्री बने।

इस सूची में महाराष्ट्र से तीसरा नाम शिवसेना के दिग्गज रहे नारायण राणे का नाम है। भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार में राणे 1 फरवरी 1999 से 17 अक्टूबर 1999 तक मुख्यमंत्री रहे। साल 2005 में उन्होंने शिवसेना से बगावत करके 12 विधायकों के साथ कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद वे विलास राव देशमुख सरकार में राजस्व मंत्री रहे।

इस सूची में महाराष्ट्र से चौथा नाम शंकर राव चव्हाण के बेटे अशोक चव्हाण आता है। अपने पिता की तरह वे भी मुख्यमंत्री रहे। वे 8 दिसंबर 2008 से 15 अक्टूबर 2009 और फिर सात नवंबर 2009 से 9 नवंबर 2010 तक मुख्यमंत्री रहे। आदर्श घोटाले में उनका नाम आने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। हाल ही में सत्ता से बाहर हुई उद्धव ठाकरे सरकार में वे मंत्री रहे।

देवेंद्र फडणवीस भी राज्य के दो बार मुख्यमंत्री रहे। पहली बार 31 अक्टूबर 2014 से 27 नवंबर 2019 तक पूरे पांच साल वे मुख्यमंत्री रहे। दूसरी बार उन्होंने अजित पवार के साथ आनन-फानन में 23 नवंबर 2021 को शपथ ली थी, लेकिन उन्हें जरूरी समर्थन नहीं मिला तो सिर्फ तीन दिन बाद यानी 26 नवंबर को ही पद छोड़ना पड़ा। अब वो एकनाथ शिंदे की सरकार में बतौर उपमुख्यमंत्री शामिल हैं।

महाराष्ट्र के पड़ोसी मध्य प्रदेश में भी दो नेता पहले मुख्यमंत्री रहे और बाद में उन्हें मंत्री बनना पड़ा। मध्य प्रदेश में पहले मुख्यमंत्री और बाद में मंत्री बनने वाली सूची में पहला नाम राज्य के जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता कैलाश जोशी का है। जनता पार्टी की सरकार के मुखिया के रूप में उन्होंने 26 जून 1977 को शपथ ली, लेकिन खराब सेहत के चलते 17 जनवरी 1978 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में वे वीरेंद्र कुमार सखलेचा और सुंदर लाल पटवा मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री शामिल रहे।

बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश के दूसरे नेता रहे, जो मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्री बने। 23 अगस्त 2004 को इस्तीफा देने के बाद बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने 23 अगस्त 2004 को शपथ ली। लेकिन उनके नेतृत्व पर सवाल उठने लगे तो भारतीय जनता पार्टी आलाकमान ने 29 नवंबर 2005 को उनसे इस्तीफा ले लिया। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने और बाबूलाल गौर उनके मंत्रिमंडल में शामिल रहे।

मुख्यमंत्री के बाद मंत्री बनने की सूची में तमिलनाडु से ओ. पन्नीरसेल्वम का भी नाम आता है। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरने के बाद अन्नाद्रमुक प्रमुख जे. जयललिता को सितंबर 2014 में इस्तीफा देना पड़ा। तब उनके खड़ाऊं मुख्यमंत्री के तौर पर ओ. पन्नीरसेल्वम ने 28 सितंबर 2014 को राज्य की कमान संभाली। इस पद पर वे 23 मई 2015 तक रहे। फिर जब जयललिता ने कमान संभाली तो उनके मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री वे शामिल हो गए। पन्नीरसेल्वम दूसरी बार 5 दिसंबर 2016 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और 15 फरवरी 2017 तक इस पद पर रहे। बाद में पार्टी में विवाद के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा और बाद के दिनों में ई. के. पलानिस्वामी मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री शामिल होना पड़ा।

इसी तरह बिहार में दरोगा प्रसाद राय फरवरी 1970 से दिसंबर 1970 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। बाद में साल 1973 में अब्दुल गफूर ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो दरोगा प्रसाद राय उस सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए। इसी तरह केदार पांडेय मार्च 1972 में बिहार के मुख्यमंत्री बने और जनवरी 1973 तक इस पद रहे। बाद में वे भी अब्दुल गफूर मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बने।

जिस तरह देवेंद्र फडणवीस से हमदर्दी जताई जा रही है या फिर उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी की आलोचना की जा रही है, उसी तरह दरोगा राय के भी मंत्री बनने पर तब सवाल उठे थे। तब उन्होंने बहुत दिलचस्प बात कही थी। उन्होंने कहा था, 'मान लीजिए कि मुझे जनता के काम के लिए दिल्ली जाना है। उस दिन दिल्ली के लिए पटना से जहाज उपलब्ध नहीं है, तो मैं ट्रेन से ही क्यों नहीं दिल्ली चला जाऊंगा?'

दरोगा प्रसाद राय के विचार से साफ है कि नेता मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्री बनने को अपनी पदावनति नहीं मानते, बल्कि उसे भी जनसेवा का माध्यम मानते हैं। उनके लिए यह अपने अहं से पहले अस्तित्व को बचाए रखने की बात ज्यादा लगती है।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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devendra fadnavis is not the first leader to become a minister from chief minister
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