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दिल्ली चुनाव: जनता का स्पष्ट संदेश अपने 'मन की बात' नहीं 'जनता के दर्द' को समझना होगा

By दीपक कुमार त्यागी, स्वतंत्र पत्रकार
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भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को मानने वाला देश है और लोकतंत्र में देश की जनता सर्वोपरि होती है। जनता अपने वोटों की ताकत से अच्छे से अच्छे ताकतवर के सिंहासन को चुनावों में उसके विरोध में वोट डालकर हिला डालती है। उसका नमूना हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली विधानसभा के चुनावों में देखने को मिला है, जहां भाजपा की तरफ से दिल्ली के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए चुनाव प्रचार में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पार्टी के अन्य दिग्गज नेताओं, सांसदों, विधायकों, कार्यकर्ताओं, केंद्रीय मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की बहुत बड़ी आधुनिक चुनावी अस्त्रशस्त्रों से लैस बेहद ताकतवर फौज के साथ-साथ स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व देश की राजनीति के कुशल चाणक्य माने जाने वाले गृहमंत्री अमित शाह ने मोर्चा सम्हाल रखा था, लेकिन उसके बाद भी भाजपा को चुनावों में मात्र आठ सीटों पर विजयी हुई और वह मात्र पांच सीटें पहले से अधिक जीत पायी।

दिल्ली चुनाव: स्पष्ट संदेश, जनता के दर्द को समझना होगा

यह चुनाव परिणाम भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की उम्मीद के एकदम विपरीत हैं। वहीं इसबार राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं की बेहद कटु बयानबाजी के चलते दिल्ली विधानसभा के चुनाव देश ही नहीं विदेशों में भी बहुत चर्चित रहे हैं, भारत की मीडिया के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार पर टकटकी लगाये हुए दिल्ली विधानसभा के चुनावों के हर पहलू का विश्लेषण करने में व्यस्त है। वैसे तो दिल्ली विधानसभा के चुनावों में दिल्ली की सम्मानित जनता ने 8 फरवरी को वोट डालकर तय कर दिया था कि देश के दिल दिल्ली पर किस दल का राज होगा। जिस तरह 11 फरवरी को मतगणना के बाद 70 सीटों में से 62 पर प्रचंड जीत प्राप्त करके 'आम आदमी पार्टी' के पक्ष में एकतरफा चुनाव परिणाम आये है, वह देश विदेश के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के लिए बेहद आश्चर्यजनक हैं।

दिल्ली चुनाव: स्पष्ट संदेश, जनता के दर्द को समझना होगा

दिल्ली विधानसभा के परिणाम यह दर्शाता है कि राजनीतिक दलों की जहरीले बयानों की 'काठ की हांडी' अब देश की समझदार जनता के बीच बिल्कुल नहीं चलने वाली है, उनके बीच अब विकास व जनहित के मुदें चलेंगे। क्योंकि हमारे देश में हर स्तर के चुनाव में जिस तरह नेताओं के द्वारा जनता के दुखदर्द का समाधान करने की जगह ज्वंलत मुद्दों को आगे करके उस पर आमजनमानस को उलझा कर उनके बीच जहर घोलकर बड़ी चतुराई से राजनेताओं के द्वारा अपना हित साधने की रणनीति रहती है, उसको दिल्ली की सम्मानित जनता ने पहचान कर भारी बहुमत से नकार कर राजनीतिक दलों को जनता की ताकत का सफलतापूर्वक आईना दिखा दिया है। अधिकांश लोगों व राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली के चुनाव में हर समय हिन्दू-मुसलमान, शाहीन बाग का राग अलापना, जामिया, जेएनयू व टुकड़े-टुकड़े गैंग आदि पर बोले गये तरह-तरह के जुमले, स्वयं केंद्र की भाजपा सरकार के किये गये कार्यों पर बहुत भारी पड़ गये है। भाजपा के कुछ नेताओं की तरफ से वोटरों को चिढाते आग उगलते बयानों व नफरत भरी राजनीति पर अरविंद केजरीवाल का दिल्ली की जनता को फ्री सुविधा वितरण कार्यक्रम ने झकझोर कर रख दिया। भाजपा ने पूरे चुनाव प्रचार में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के द्वारा पेश किये गये दिल्ली के विकास के फार्मूला की कोई ठोस कारगर तोड़ जनता के सामने पेश नहीं कर पायी, भाजपा को अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री के चेहरे के सामने, मुख्यमंत्री का चेहरा पेश नहीं करना मंहगा पड़ा।

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वहीं दूसरी तरफ 'आम आदमी पार्टी' के द्वारा देश में व्याप्त मंदी की मार के चलते रोजीरोटी रोजगार के लिए त्रस्त दिल्ली की जनता की दुखती रग पर हाथ रखकर उसका चुनावी लाभ लेना, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को बहुत भारी पड़ गया। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल ने विवादित मसलों व जहरीले बयानों से स्वयं को और पार्टी को दूर रखकर जहरीले बयानों से तंग आ चुकी दिल्ली की जनता के दिलों में जगह बना ली। नफरत भरी राजनीति पर प्यार के जबरदस्त वार के फार्मूले ने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बनाकर भाजपा की बेहद ताकतवर फौज को बुरी तरह हरा दिया। वहीं दिल्ली के चुनावों ने कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सत्ता हासिल करने के प्रति उदासीन रवैये को पूरी दुनिया के सामने लाकर जगजाहिर कर दिया है, दिल्ली में कांग्रेस की स्तंभ रही पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय श्रीमती शीला दीक्षित के जनहित के कार्यों पर जनता के बीच जाकर बात करने से बचने की कांग्रेस के दिग्गजों की नीति ने चुनावों में कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ करके, जनता के सामने अरविंद केजरीवाल को विकल्प के रूप में पेश कर दिया।

दिल्ली चुनाव: स्पष्ट संदेश, जनता के दर्द को समझना होगा

कांग्रेस की गुटबाजी उसको पूरी तरह से ले डूबी है, जनहित के मसलों की जगह बेवजह के मुद्दों में हर समय उलझे रहने के रवैये के चलते अब दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है, सेल्फ गोल मारने की विशेषज्ञ बन गयी कांग्रेस पार्टी कुछ राज्यों की जीत की खुमारी में अभी तक व्यस्त है, कांग्रेस को यह सोचना होगा कि राज्यों में अन्य दलों की पीठ पर सवार होकर जीतना 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' से ज्यादा कुछ नहीं है, उनकी इस हरकत से पार्टी दिनप्रतिदिन बेहद कमजोर होती जा रही है।

दिल्ली चुनाव: स्पष्ट संदेश, जनता के दर्द को समझना होगा

दिल्ली विधानसभा चुनावों में वहां की जनता ने आम आदमी पार्टी को 53.57 प्रतिशत, भाजपा को 38.51 प्रतिशत व कांग्रेस को मात्र 4.26 प्रतिशत मत देकर, यह साबित कर दिया है कि देश के नेताओं को अब जनता के दुखदर्द को समझना होगा। उनको सोचना होगा कि अगर तुम को वोटरों के दिल को जीतना है तो अपने 'मन की बात' उन पर थोपने की जगह 'जन के मन की बात' व उनके दुखदर्द को समझना होगा। दिल्ली चुनावों के द्वारा जनता का यह स्पष्ट संदेश है कि चुनावी जंग जीतने के बाद सरकारों को जनभावनाओं के अनुसार कार्य करना होगा, तब ही भविष्य में जनता के प्यार के बलबूते चुनावी राजनीति में भाग लेने वाले राजनेताओं का राज सिंहासन सुरक्षित रह सकता है। जिस तरह से पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के कुछ नेताओं ने बेहद तल्ख गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी करके वोटों के ध्रुवीकरण का असफल प्रयास किया था उसको दिल्ली की जनता ने नकार दिया, उल्टे इन बयानवीर नेताओं ने भाजपा की छवि को बट्टा लगाकर वोटर को उससे दूरी बनाने के लिए मजबूर कर दिया। दिल्ली के समझदार वोटर ने इसबार के चुनाव प्रचार में नेताओं के हिन्दू-मुसलमान के जाप के झांसे को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया हैं। जनता की अदालत में इसबार नेताओं की जुमलेबाजी को आधार बनाने की जगह जनहित के काम व विकास को आधार मानकर निर्णय किया गया है, जो कि भविष्य में भारत की चुनावी व्यवस्था में सुधार लाने के लिए जनता के द्वारा की गयी एक सकारात्मक अच्छी पहल है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

English summary
Delhi Election: A clear message of the people understand their pain instead of Mann ki Baat
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