Delhi Air Quality: इतनी खराब हवा में दिल्लीवाले जिएं तो जिएं कैसे?
सर्दी आने के पहले ही राजधानी दिल्ली का एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 300 के पार पहुंच गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली की 64 प्रतिशत आबादी जहां रहती है वहां की हवा रहने लायक नहीं है। पड़ोसी राज्यों से आने वाला पराली का धुआं नीम चढ़े करेले का काम कर रहा है। इसी दमघोंटू माहौल में दिल्ली के द्वारका उपनगर के यशोभूमि में जी20 देशों की संसद के पीठासीन अधिकारियों का 'लाइफ: पर्यावरण के लिए जीवन शैली' थीम पर आधारित शिखर सम्मेलन का आयोजन भी हुआ है।

दिनों दिन खराब होते पर्यावरण को लेकर उच्चतम न्यायालय ने अद्यतन स्थिति रिपोर्ट के साथ प्रदूषण नियंत्रित करने वाले आयोग को तलब किया है। इस बीच प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीके मिश्रा ने दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण पर हाई लेवल टास्क फोर्स की मीटिंग की तथा वायु प्रदूषण को रोकने के लिए सभी संबंधित पक्षों को ग्रेप (ग्रेड रिस्पांस एक्शन प्लान) में बताए गए कदमों को कड़ाई से लागू करने की हिदायत दी है।
आंकड़े बता रहे हैं कि दुनिया भर में होने वाले वायु प्रदूषण में भारत का हिस्सा 44% से अधिक है। भारत में प्रदूषण पर नियंत्रण करने के लिए जो एजेंसियां काम कर रही हैं उनका अनुमान है कि वर्ष 2030 तक हम डेढ़ से ढाई प्रतिशत तक वायु प्रदूषण कम कर लेंगे, लेकिन जिस तरह से प्रदूषण बढ़ रहा है इनके अनुमानों से कोई सार्थक उम्मीद नहीं दिखती। भारत की गंगा किनारे बसी सभ्यता एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। उत्तराखंड जहां से गंगा निकलती है और उत्तर प्रदेश बिहार बंगाल होते हुए जाती है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वहां वायु प्रदूषण बाकी जगहों से 23 गुना ज्यादा है।
बीते दिनों लैसेंट मेडिकल जर्नल में यह बात निकल कर आई थी कि भारत में हर साल 16 लाख लोगों की जान सिर्फ वायु प्रदूषण की वजह से जाती है। वायु प्रदूषण के चलते आज कैंसर की बीमारी उच्च स्तर पर है। दिल की बीमारियां और समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों की मौत के मामले बढे हैं। अक्टूबर से जनवरी के बीच दमा बढ़ता है तो पुराने मरीजों की हालत और खराब हो जाती है। साल दर साल इन महीनों में वेंटिलेटर पर आने वाले मरीज बढ़ रहे हैं। कोरोना महामारी के दौरान हम सब ने देखा कि हमारे पास ऑक्सीजन की क्या स्थिति है। ऐसे में यह आशंका बढ़ने लगी है कि वायु प्रदूषण के चलते भविष्य में कहीं ऐसा ना हो कि इतने मरीज आने लगें कि हमारे पास ऑक्सीजन और बेड ही कम पड़ जाए।
भारत में वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में औद्योगीकरण, आर्थिक विकास और वर्ष 2000 के बाद सड़कों पर उतरे कई गुना अधिक वाहन हैं। अब समय आ गया है कि इन पर एक ठोस नीति बने। जंगल की आग की तरह फैल रहे अनियमित शहरीकरण की जगह शहरों के विकेन्द्रीकरण पर काम हो। इन विकेन्द्रित शहरों पर पर्यावरण के कठोर मानक लागू किये जाएं। जैसे कि नोएडा या नोएडा एक्सटेंशन या गुडगांव या दूसरे बड़े शहरों के उपनगर जो डेवलप हो रहे हैं वहां एक निश्चित क्षेत्र में कितनी इमारतें बनेगी? वहां से जो कार्बन फुटप्रिंट बनेगा उसे न्यूट्रलाइज करने की क्या व्यवस्था होगी? कितना हरित क्षेत्र चाहिए होगा? यहां रहने वाले लोग काम करने कितनी दूर जाएंगे? इन सबका मानक तय हो।
वैश्विक विकास के इस दौर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के कारण भारतीयों की जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। लेकिन हाल में हुए एक अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण के चलते लोगों की औसत आयु लगातार कम होती जा रही है। दिल्ली में लोगों की औसत आयु 9.02 साल कम हुई है तो उत्तर प्रदेश में 7.5 साल, बिहार में 7 साल। दुनिया भर का औसत देखें तो इसमें 2.2 साल की कमी आई है। भारत के स्तर पर यह आंकड़ा 5 साल है। इन आंकड़ों से सहज समझा जा सकता है कि वायु प्रदूषण ने हमें कहां लाकर खड़ा कर दिया है। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक धूम्रपान से जीवन प्रत्याशा में 1.9 साल तथा अल्कोहल से 8 महीने की कमी हुई है। यानी कि वायु प्रदूषण अब धूम्रपान और शराबखोरी से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है।
मालूम हो कि पहले पीएम 2.5 में जो मानक 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उसे अब 5 माइक्रोग्राम कर दिया है। 10 माइक्रोग्राम में भी काफी बीमारियां हो रही थी। जबकि वायु प्रदूषण में पीएम2.5 का हमारा मानक अभी 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है। अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े तक पहुंच जाएं तो हिंदुस्तानियों की औसत आयु 10 साल बढ़ सकती है। मगर यह करें कैसे?
बीते कल पी-20 को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी दोहराया है कि हमें मजबूत इरादे के साथ सस्ता और टारगेटेड प्लान के साथ आगे बढ़ना होगा। लेकिन दिल्ली की स्थिति यह है कि यहां की सरकार महंगे प्लान बनती है जो जमीन पर उतरता ही नहीं है। विडंबना तो यह देखिए कि जब प्रदूषण बढ़ने लगता है तो दिल्ली सरकार सड़कों पर धुआं उगलते ट्रक और टैंकर से पानी का छिड़काव करने लगती है।
इसके अलावा देश के भीतर पर्यावरण के नाम पर भी बिचौलियों का एक विशाल अर्थ तंत्र खड़ा हो गया है जो हर समय कानून के उल्लंघन से होने वाली समस्याओं को निपटने की गुपचुप कवायद करता रहता है। एक तरफ पर्यावरण संरक्षण के नियमों तथा कानून को लागू करवाने न करवाने उसमें बदलाव लाने आदि की कवायद करने के लिए एक ताकतवर लॉबी सक्रिय रहती है जो पर्यावरण संरक्षण के कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं होने देता। यह तंत्र पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ जो धुंध बन रहा है, उसको सूरज का प्रकाश नहीं, शासन और प्रशासन तंत्र की पारदर्शिता से ही कम किया जा सकता है।
पर्यावरण क्षरण के दुष्परिणाम अब रोजमर्रा की जिंदगी में दिखने लगे हैं। इस पर गंभीर विमर्श तो वक्त की जरूरत है ही, लेकिन यही काफी नहीं है। हमें एक ऐसा जवाबदेह, पारदर्शी ढांचा खड़ा करना होगा जो विकास जैसे राष्ट्रीय लक्ष्य के आगे बौना न साबित हो सके। इसके अलावा विकास की हमारी कल्पना को समग्र और सर्वांगीण बनाने की जरूरत है, ताकि पर्यावरण जैसे सवाल उस संकल्पना से बाहर न रह पाए। गैर टिकाऊ और टिकाऊ विकास के फर्क को स्वीकार करना इस दौर की सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन इससे भी जरूरी है कि निदान के साथ-साथ हम रोकथाम के लिए एकजुट होकर आगे बढ़े।












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