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01 दिसंबर पुण्यतिथि विशेष: जुझारू स्वतंत्रता सेनानी एवं बेहद कुशल राजनीतिज्ञ थी 'सुचेता कृपलानी'

By दीपक कुमार त्यागी
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत की आजादी के आंदोलन में अपना बचपन से ही अनमोल योगदान देने वाली स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थीं। उनको आजाद भारत में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के साथ भारत की किसी भी राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ था। 1 दिसंबर को पुण्यतिथि पर उनके संघर्षशील जीवन के बारे में कुछ जानने का प्रयास करते हैं। सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुचेता कृपलानी के पिता एस.एन. मजुमदार ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर होने के बावजूद बेहद पक्के देशप्रेमी देशभक्त व्यक्ति थे। बचपन से ही अंग्रेज शासकों की भारतीय जनता के प्रति क्रूरता पूर्ण रवैये के खिलाफ सुचेता मजुमदार के मन में जबरदस्त गुस्सा रहता था, उनके मन में देश सेवा का भाव और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनूनी जज्बा हर वक्त रहता था। सुचेता की शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। वह दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और बाद में पंजाब विश्वविद्यालय से पढ़ीं। जिसके बाद वह बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में इतिहास की प्राध्यापक बनीं थी।

    Sucheta Kriplani Death Anniversary: जानिए देश की पहली महिला मुख्यमंत्री को | वनइंडिया हिंदी
    जुझारू सेनानी एवं कुशल राजनीतिज्ञ थी सुचेता कृपलानी

    अपनी आत्मकथा 'ऐन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी' में उन्होंने बचपन के एक ऐसे ही किस्से का जिक्र किया है। सुचेता और उनकी बड़ी बहन सुलेखा एक ही स्कूल में पढ़ते थे। बहन सुलेखा उनसे करीब एक डेढ़ साल बड़ी थी। एक दिन उनको स्कूल की कुछ लड़कियों के साथ कुदसिया गार्डन ले जाया गया। उन दिनों प्रिंस वेल्स (महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के सबसे बड़े बेटे) दिल्ली आने वाले थे, तो उनके स्वागत के लिए कुछ लड़कियों की जरूरत थी। यह सबकुछ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कुछ दिनों बाद हो रहा था। जिसकी वजह से देश में हर तरफ भयंकर गुस्से और अंग्रेजों के अत्याचार के चलते बेहद आक्रोश व लाचारी का माहौल था। ऐसे समय में सुचेता और उनकी बहन सुलेखा को जब कुदसिया गार्डन के पास प्रिंस के स्वागत में खड़ी लड़कियों की पंक्ति में खड़े हो जाने का निर्देश मिला, तो वो स्वाभिमान व गुस्से से लाल हो गईं लेकिन उनमें उस समय खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। लाचारी और गुस्से में दोनों बहन प्रिंस का स्वागत करने की जगह लाइन में पीछे छिपकर चुपचाप खड़ी हो गयी। उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज ना उठा पाने के अफसोस में सुचेता मजुमदार सालों बाद भी इस घटना को याद कर के शर्मिंदगी महसूस करती रहीं। वर्ष 1936 में उनका विवाह महात्मा गांधी जी के सहयोगी स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे. बी. कृपलानी से हुआ और वह सुचेता मजुमदार से कृपलानी बन गयी। उस समय की परिस्थितियों में सुचेता की शादी आसान नहीं थी, उनके खुद के घर वालों के साथ ही महात्मा गांधी भी सुचेता की शादी के विरोध में थे, जिसका कारण जे.बी. कृपलानी यानी जीवतराम भगवानदास कृपलानी का उनसे उम्र में 20 साल बड़े होना था। वहीं जे.बी. कृपलानी जहां एक सिंधी परिवार से ताल्लुक रखते थे, वहीं सुचेता मजुमदार एक बंगाली परिवार से ताल्लुक रखती थीं। हालांकि दोनों की उम्र और जन्म-स्थान में भले ही बहुत अंतर था लेकिन असल में दोनों एक जैसे ही बेहद जुझारू व जुनूनी थे और देश सेवा के लिए मर मिटने के लिए पूर्ण रूप से समर्पित थे। इसी वजह से दोनों ने विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय लिया था।

    जुझारू सेनानी एवं कुशल राजनीतिज्ञ थी सुचेता कृपलानी

    सुचेता कृपलानी अरुणा आसफ अली और ऊषा मेहता के साथ देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुई। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में अपना योगदान दिया, बंगाल के दंगाग्रस्त क्षेत्र नोआखली में महात्मा गांधी के साथ दंगा पीडित इलाकों में पीड़ित महिलाओं व अन्य लोगों की हर संभव मदद की, दंगों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की वजह से वह खुद की सुरक्षा के लिए साइनाइड का कैप्सूल हर समय अपने साथ लेकर चलती थी। वह एक ऐसी निड़र महिला थीं, जिसमें देशभक्ति व जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। जिसका उदाहरण उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, उस समय सुचेता कृपलानी ने अपनी कुशाग्र बुद्धिमत्ता व जुझारूपन का परिचय देते हुए कहा था कि 'बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।' इस दौरान उन्होंने भूमिगत होकर कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और अंग्रेजी पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक जोरशोर से आंदोलन भी चलाया। उन्होंने नौकरी छोड़कर देश को आजाद करवाने का वीणा उठा लिया था, उन्होंने इसके लिए एक 'अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स' बनाई और महिलाओं और लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करना और आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी थी। इसके साथ-साथ उन्होंने राजनैतिक कैदियों के परिवार की सहायता करने की जिम्मेदारी का बेहद कुशलतापूर्वक निर्वहन किया था। आजादी के बाद जब देश में संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की जब उपसमिति बनी तो उसमें शामिल होकर सुचेता देश की महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। संविधान बना इसमें महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुचेता बेहद मुखर रही थीं। 14 अगस्त 1947 के जवाहरलाल नेहरू के ट्रिस्ट विद डेस्टिनी स्पीच से पहले इन्होंने वंदे मातरम का गायन किया था, सुचेता एक फेमस सिंगर भी थीं।

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    वर्ष 1952 में आचार्य जे. बी. कृपलानी के जवाहरलाल नेहरू से संबंध खराब हो गये थे, तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी 'कृषक मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली थी और यह पार्टी आजाद भारत में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हो गई थी। वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव में सुचेता कृपलानी इसी पार्टी से लड़ीं और नई दिल्ली से चुनाव जीत करके आईं। वर्ष 1957 में वह कांग्रेस से सुलह होने के चलते लगातार दूसरी बार नई दिल्ली से कांग्रेस की सांसद चुनी गईं थी और जवाहरलाल नेहरू ने इनको राज्यमंत्री बनाया। इसके बाद नेहरू ने इनको उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के लिए भेज दिया और वह उत्तर प्रदेश विधानसभा की बस्ती जनपद की मेंढवाल विधानसभा से सदस्य चुनीं गयीं। सन 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। करीब 3 साल 162 दिनों तक वह वर्ष 1967 तक मुख्यमंत्री पद पर बनी रहीं। उनके कार्यकाल के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में जो मामला था, वो था कर्मचारियों की हड़ताल का। लगभग 62 दिनों तक चली इस हड़ताल का सुचेता कृपलानी ने बहुत ही बखूबी से सामना किया। सुचेता एक बेहद मंझे हुए नेता की तरह प्रशासनिक फैसले लेते समय दिल की नहीं बल्कि अपने दिमाग की सुनती थीं। उसी के बलबूते उन्होंने अंत में कर्मचारियों की मांगों को पूरा किए बिना हड़ताल को सफलतापूर्वक तुड़वा दिया था। वर्ष 1971 में सुचेता कृपलानी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। 1 दिसंबर 1974 के दिन इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने दुनिया को अलविदा कह दिया और आखिरी सांस ली।

    (इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    English summary
    01 December Death anniversary special: Sucheta Kripalani was a militant freedom fighter and highly skilled politician
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