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Holi Festival: ताप से सुवास का त्यौहार है होली

फाल्गुन मास हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना है। इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण इस महीने का नाम फाल्गुन है। जो भारतीय संस्कृति में आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है।

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फाल्गुन मास हो तो रंगों की बात स्वतः ही निकल पड़ती है। कारण मात्र होली का त्योहार ही नहीं, बल्कि प्रकृति में बिखरे रंग चटक हो जाते हैं। खेतों में फसलों के सुन्दर रंग घर में आने से आम जन के हर्षित चेहरों के रंग भी चमक जाते हैं। भिन्न-भिन्न पुष्प लता आदि भी खिल उठते हैं और प्रकृति को रंग से आच्छादित कर देते हैं।

होली पूरी तरह से मानसिक तनाव, नीरसता को मिटाने वाला, मन में उमंग और उल्लास का संचार करने वाला पर्व है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि बात करें कि इस उत्सव की शुरुआत कहाँ से हुई तो इसका वर्णन विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसका बाह्य स्वरूप कभी बदलता भी रहा है किन्तु मूल उद्देश्य और स्वरूप आज तक वही बना हुआ है।

इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण वर्णन किशोरिका नामक लेखिका ने पाटलिपुत्र मगध के परिप्रेक्ष्य में अपनी रचना 'कौमुदी महोत्सव' में किया है। कौमुदी का अर्थ 'चंद्रमा' से है। इसमें वर्णन है कि रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश के नीचे सामूहिक संगीत समारोह आयोजित होता था, जिसमें स्त्री - पुरुष सभी समान रूप से भाग लेते थे। रात्रि उत्सव के अगले दिन रंगोत्सव का वर्णन है।

परंपरागत रूप से चार चरण की होली का विधान होता था। पहले चरण में भस्म की होली ब्रह्म मुहूर्त के साथ होती है। जो आगे दूसरे चरण में मृदा (मिट्टी) की होली में परिणत होती। फिर स्नान विराम के दौरान अपने इष्ट को रंग अर्पित किया जाता। उसके साथ ही तीसरे चरण में गीले रंगों की होली खेली जाती है। चौथा चरण प्रदोष काल में अबीर - गुलाल की होली खेली जाती है। यह चौथा चरण शुभकामनाओं और मंगलकामनाओं का होता है, जो देह के साथ मन और चेतना को भी सुवासित करता है। इसे ध्यान से समझें तो यह पर्व हमें ताप से सुवास तक ले कर जाता है।

रामगढ़ की पहाडियों में मिले शैल चित्रों को देखकर भी यही अनुमान लगता है कि विंध्य क्षेत्र में यह होली उत्सव का ही अभिलेख है। इसमें सामूहिक नृत्य में स्त्री - पुरुषों का चित्रण है, जहां वाद्य यंत्र हैं और मस्ती में नृत्य का चित्रण है। इनके अलावा बाघ की गुफाओं में 'हालिसका नृत्य' के शैल चित्र भी होली उत्सव के चित्र माने जाते हैं। मानवशास्त्रियों ने होली को आदिम जाति परंपरा का पर्व भी माना है।

आरम्भिक मध्य काल में पर्यटक अलबरूनी ने भी होलिकोत्सव का वर्णन किया है, जिसे भारत सम्बन्धित ऐतिहासिक संस्मरण के रूप में देखा जाता है। मुगल काल में लगभग सभी दरबार में होली प्रचलित हो गई थी। विभिन्न संग्रहालयों में तत्कालीन ऐसे चित्र संग्रहीत हैं जिनमें मुगल दरबार में बादशाह सहित अन्य लोगों को होली खेलते दिखाया गया है। होली उत्सव के मूल में जो मानसिक, शारीरिक परिष्कार और शोधन की अवधारणा थी, कालांतर में उसके स्वरूप में परिवर्तन आता गया। इस्लामी प्रभाव में यह में ईद ए गुलाबी, और आब ए पाशी होकर रंग की फुहार या बौछार तक ही रह गया।

'मदनोत्सव', 'कामोत्सव' और 'वसंतोत्सव' के आयातित अर्थ ढूंढे गए, जो जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र, नारद पुराण, भविष्य पुराण आदि में उल्लिखित इस उत्सव की अवधारणा के मूल से कहीं भटका हुआ प्रतीत होता है। इसमें मानव जीवन के चार उद्देश्यों एवं आधारों के समन्वित स्वरूप 'पुरुषार्थ चतुष्टय' में 'काम पुरुषार्थ का रूप बिगड़ गया। भारतीय संस्कृति में मानव जीवन का तीसरा पुरुषार्थ 'काम' है। काम से तात्पर्य होता है - इंद्रिय सुख, भोग, विषय वासना अर्थात् विभिन्न भौतिक कामनाएं। सांसारिक दृष्टि से जीवन के दैहिक - भौतिक सुख, उपभोग 'काम पुरुषार्थ' है। गीत-संगीत, नृत्य, राग - रंग, सुगंधि, स्वाद (पुआ- पकवान) सभी को मिलाकर, मन- मतंग के उमंग का उत्सव होली की अवधारणा और उद्देश्य लगातार संकीर्ण होते चले गए।

कहीं इसकी सात्विकता और वैज्ञानिकता को भुलाकर कहीं वासनात्मक दृष्टिकोण का पक्ष अधिक चर्चित किया गया। तो कहीं और यह होलिका की राख को घर ले जाने के टोटके का विमर्श बना कर भ्रमित हुआ। आज नई पीढ़ी के लोग यह भी नहीं जानते कि 'होलिका' के लिए केंद्र में मेधी निर्माण होता है। उसके चारों ओर चिति होती है। बाहरी स्वरूप में शंकु आकार की 'होलिका' के चतुर्दिक लोग प्रदक्षिणा करते हैं। इसका अर्थ चेतना के उद्दीपन से है।

होलिका दहन से आरंभ होकर यह उत्सव आनंदोत्सव और वसंत रागिनी में परिणत हो जाता है। मनुष्य जीवन का यही उद्देश्य है। पहले स्वयं में आत्म शुद्धि की अग्नि प्रकट होती है, और फिर अपनी चेतना, मन, बुद्धि और देह को उस शुद्धि के रंग में रंग डालना। भारतीय संस्कृति के उत्सवों के मूल में सात्विक परिष्कार की प्रवृत्ति अन्तर्भूत है।

यह पर्व, होलिका दहन करके, रंगों से खेलने, हुल्लड़बाजी और गाने नाचने का प्रतीकात्मक त्योहार न बन जाए। क्योंकि हमारे सभी त्योहार बाह्य विस्तार में उमंग, उल्लास के साथ आंतरिक परिष्कार और चेतना के सात्विक रूपांतरण के पर्व हैं। यह चिन्ता और चिंतन दोनों की बात है कि इन पर्वों का विशिष्टार्थ, आंतरिक आयाम धूमिल हो गया है और इनकी बाहरी उपस्थिति का विस्तार मात्र रह गया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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