Corona Cases: कोरोना के बढ़ने से ज्यादा चिंताजनक है जनता का लापरवाह होना
Coronavirus In India: कोरोना ने फिर से फन फैलाने शुरू कर दिए हैं। लेकिन कोरोना का फिर से फैलाव जितना चिंताजनक है उससे अधिक चिंताजनक है कोरोना को लेकर जनता की लापरवाही।

Covid-19 Cases in India: भारत में पिछले 24 घंटे के दौरान कोरोना वायरस संक्रमण के 3,824 नए मामले सामने आए, जो बीते छह महीने में एक दिन में दर्ज सर्वाधिक हैं। वहीं देश में उपचाराधीन मरीजों की संख्या बढ़कर 18,389 पर पहुंच गई है। दिल्ली में भी कोरोना के मामलों में वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय राजधानी में शनिवार को 416 नए मामले दर्ज किए गए जो पिछले 7 महीने में सबसे ज्यादा रोजाना का आंकड़ा है। स्वास्थ्य विभाग के डाटा के मुताबिक शहर में संक्रमण की दर बढ़कर 14.37 प्रतिशत हो गयी है। इसी साल 17 जनवरी को महामारी की शुरुआत के बाद से भारत में एक दिन में कोविड-19 संक्रमणों की सबसे कम संख्या दर्ज की गई थी। लेकिन अचानक अब कोरोना मामले में बढ़ोत्तरी चौंकानेवाली है।
बहुत से लोग इस महामारी के तीन लंबे और चुनौतीपूर्ण वर्षों के बाद इसके अंत का संकेत मान रहे थे। लेकिन कोविड के सक्रिय मामलों ने चार महीनों में पहली बार 10,000 का आंकड़ा पार किया है और 23 मार्च को समाप्त सप्ताह में औसत दैनिक मामले 966 दर्ज किए गए, जो 3 मार्च को समाप्त सप्ताह में 313 के दैनिक औसत से तीन गुना अधिक है। 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10 प्रतिशत या उससे अधिक की साप्ताहिक जांच सकारात्मकता दर या टेस्ट पॉजिटिव रेश्यो (टीपीआर) वाले जिलों की संख्या-विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 5 प्रतिशत की निर्धारित सीमा से बढ़कर 32 हो गई है। देश में एक बार फिर कोविड के नए मरीज बढ़ने का ट्रेड सामने आया है।
सरकार ने कोरोना की देश से विदाई मानकर कोरोना प्रोटोकाल में राहत देना शुरू कर दिया था। सरकार ने थोड़ी राहत दी, जनता ने पूरी ले ली। जनता ने समारोहपूर्वक मास्क और सेनेटाइजर का परित्याग कर दिया। पूरा देश मानने लगा कि कोरोना अब चला गया है लेकिन कोरोना ने इसकी अधिकृत सूचना नहीं दी थी कि मैं अब जा रहा हूं। अब आप मज़े करो।
पूरी दुनिया में कोरोना लुका छुपी का खेल खेल रहा है। जाता है, फिर लौट कर आ जाता है। मनुष्य जाति ने पिछली सदी में युद्ध, बंटवारे, अकाल के रूप में हर प्रकार के कई बेरहम दौर देखे। मगर इतनी बेबसी और लाचारगी के साथ इतनी बेरहम क्रूरता को अपनी आंखों के सामने देखने का बुरा अनुभव कोविड 19 महामारी से पहले कभी नहीं हुआ। कोरोना से पहले ऐसा कोई वक्त नहीं था जब पूरी दुनिया को दरवाजों पर ताले डालकर हाथ पर हाथ धरे बैठना पड़ा हो। चेहरे मास्क के पीछे छिप गए। यह डर का वह नकाब था जो रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा था। धन दौलत, वर्ग, धर्म और प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद में बंटी दुनिया को कोविड ने एक प्लेटफार्म पर लाकर खड़ा कर दिया था।
अब फिर लोग लापरवाह बन रहे हैं। अपनी और दूसरों की जान खतरे में डालकर सारे आयोजन कर रहे हैं। सरकार भी सारे आयोजन धूमधाम से कर रही है। कोरोना के कारण पूरे समाज ने जो भुगता है उससे अभी तक उबरे नहीं है। जीवन का तजुर्बा यह कहता है कि हमें अपनी बदक़िस्मती पर कभी भी शक नहीं करना चाहिए। मर्फ़ीज़ लॉ यही तो कहता है- हर वो चीज़ जो ग़लत हो सकती है, मान लीजिए कि होकर रहेगी।
कोरोना का पैटर्न ही ऐसा है कि यह पहले आगे बढ़ता है, फिर पीछे लौटता है, और फिर पलटवार करता है। इसने लड़ाई के अंत की घोषणा अभी नहीं की है। जब दुनिया में शत प्रतिशत वैक्सीनेशन हो जाएगा, तब हो सकता है कोरोना का असर बेहद कम दिखे। लेकिन तब भी यह क्या रूप दिखलाएगा या इसका कौन सा वेैरियंट आएगा, कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारत में कोरोना की खबरें मीडिया से गायब होते ही लगभग सबने मान लिया कि अब कोरोना से छुटकारा मिल गया। इसको ख़ुशफ़हमी कहते हैं। इसके बाद लापरवाही का दौर शुरू हुआ। सरकार से लेकर जनता तक। शादियां धूमधाम से और नगरभोज के साथ होने लगी। मेले लगने लगे, भंडारा शुरू हो गया। चुनाव की रैलियों में लाखों लोागों को एकत्रित किया जाने लगा। मॉल और बाजार में भीड़ वैसे ही दिखने लगी जैसे कोरोना के दस्तक के पहले थी। हैंड सैनिटाइज़र जो हर हाथ में दिखता था, दुर्लभ होता चला गया। मास्क लोगों के चेहरे से ऐसे गायब हो गए जैसे भारत की पवित्र भूमि पर कभी कोरोना ने कदम नहीं रखा था। भारत उत्सवप्रिय और सुखवादी है। तौबा-परहेज से जी नहीं सकता। बंधन से मुक्त रहना चाहता है। गुजरे कल से कुछ सीखता भी नहीं।
लेकिन अब जैसे जैसे कोरोना बढ़ रहा है, बीते सालों के तमाम बुरे शब्द फिर लौटकर आने लगे हैं। महामारियां वैसे भी धूप-छांव का खेल खेलती हैं, एक बार में मुकम्मल ख़त्म नहीं होतीं। देश मे कोरोना का बढ़ना और जनता का लापरवाह बने रहना वाकई चिंता का विषय है। कई बार इस देश में सामान्य बुद्धि और विवेक का सूचकांक अत्यंत दयनीय और शोचनीय दिखता है। भारत में बहुसंख्यक लोगों की मानसिकता 'अपना काम बनता, भाड़ में जाएं जनता' का है। कोई भी अपनी छोटी-सी स्वार्थपूर्ति के लिए किसी और का जीवन मज़े से दांव पर लगा सकता है, बिना किसी पछतावे के। स्वार्थ यहां की मूल-भावना बन गई है। भारत में भीड़ को अनुशासित करना लगभग असम्भव हो गया है।
जैसे पहली लहर आकर चली गई, यह भी आकर जाएगी, और बहुत मुमकिन है वैक्सीनेशन-ड्राइव और हर्ड इम्युनिटी के कारण यह पहले से कम नुक़सान पहुंचाए, लेकिन इससे जिनको निजी क्षतियां होंगी- चाहे आर्थिक हों, चिकित्सकीय हों, या मनोवैज्ञानिक हों- उसकी कोई सुनवाई नहीं होने वाली है। कोरोना-वायरस ने दूसरी तमाम चीज़ों के साथ ही भारत के राष्ट्रीय-चरित्र की भी ख़ूब परीक्षा ली है और उसमें हम फेल हो चुके हैं। अभी भी समय है कि हम सचेत और सतर्क हो जाएं।
हमें संभलना और सतर्क रहना होगा। सरकार ने सभी को दोहरी खुराक के साथ टीके लगाने का काम भले ही सफलतापूर्वक पूरा कर लिया हो, लेकिन हमारा स्वास्थ्य ढांचा बेहद कमजोर है। वक्त संभलने का और सुरक्षित रहने का है। फेस मास्क पहनें, सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें और लापरवाह ना बनें, इसी में हम सब की भलाई है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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