Congress: कमजोर हो चुकी कांग्रेस ने अब लोकतंत्र पर निकाली भड़ास
Congress: कांग्रेस अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है| कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं| उसके अपने सांसद और बड़े बड़े नेता चुनाव लड़ने से कन्नी काट रहे हैं| राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस के पास इतने पैसे भी नहीं बचे कि वह अपने कार्यकर्ताओं को ट्रेन का टिकट बुक करवा कर प्रचार के लिए कहीं भेज सके|
कांग्रेस जनता से भी उम्मीद छोड़ चुकी है, इसलिए वह अदालतों और चुनाव आयोग के माध्यम से सत्ता में बैकडोर एंट्री करना चाहती है| लेकिन अदालतें और चुनाव आयोग उसकी मदद करने को तैयार नहीं| कांग्रेस ने साठ साल तक इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं को अपनी मुठ्ठी में रखा था इसलिए उसकी हताशा स्वाभाविक है|

नरसिंह राव के जमाने तक सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्टों के जजों की नियुक्ति सरकार ही किया करती थी| चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक सरकार ही किया करती थी| दो बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को हर संस्था में खोट नजर आने लगा है|
कांग्रेस को सुप्रीमकोर्ट, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, एनआईए, वोटिंग मशीन किसी पर भरोसा नहीं रहा| उसे हर स्तर पर वैसी ही मशीनरी चाहिए, जो पहले उसे चुनाव जीता दिया करती थी| उसे वोटिंग की पुरानी मतपत्र प्रणाली चाहिए, जिसमें प्रशासन के सहयोग से बैलट बॉक्स लूट कर लगातार कई चुनाव कांग्रेस ने जीते थे।

अदालतें कांग्रेस के राजनीतिक मंसूबे पूरे नहीं होने दे रही| भारत का लोकतंत्र पाकिस्तान की तरह कमजोर नहीं है कि न्यायपालिका किसी राजनीतिक दल को चुनाव जीतने में मदद करे| न्यायपालिका न्यायसंगत फैसला करती है, इसलिए कांग्रेस को न्यायपालिका से भी उसी तरह झटके लग रहे हैं, जैसे चुनावों में लग रहे हैं|
लगातार दो चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को लगा कि वोटिंग मशीनें और चुनाव आयुक्त भाजपा की मदद कर रहे होंगे| इसलिए कांग्रेस ने पिछले साल इन दोनों मुद्दों पर याचिका दाखिल की, लेकिन सुप्रीमकोर्ट कांग्रेस की मदद को तैयार नहीं हुई| ताजा घटना चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की है|
कांग्रेस ने पिछले साल अपनी नेता जया ठाकुर से चुनाव आयोगों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका दाखिल करवाई थी| सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद से क़ानून पास करवा कर एक प्रणाली बनानी चाहिए| जब तक क़ानून न बने तब तक अदालत ने खुद एक कमेटी बना दी थी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता के अलावा सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस को रखा गया था| सरकार ने संसद के शीत सत्र में नियुक्ति के लिए बिल पास करवाया, तो उसमें चीफ जस्टिस की जगह एक मंत्री को रखा गया|
कांग्रेस ने इसे भी चुनौती दी कि सरकार ने कमेटी में चीफ जस्टिस को नहीं रखा| जबकि 60 साल तक अपनी सरकारों के समय कांग्रेस के प्रधानमंत्री खुद चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करते थे| जबकि कांग्रेस ने संसद से बने क़ानून को भी कोर्ट में चुनौती दे दी| कांग्रेस चाहती थी कि सरकार चुनावों से पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति न कर सके, लेकिन सरकार ने 14 मार्च को कमेटी की बैठक बुला कर दो चुनाव आयुक्तों का चयन कर लिया, उन्होंने चार्ज भी ले लिया|
कांग्रेस ने अपनी याचिका के माध्यम से सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस को उत्तेजित करने की कोशिश की भी कि संसद ने उन्हें कमेटी से बाहर कर दिया| सुप्रीमकोर्ट ने पहले कमेटी की बैठक में हस्तक्षेप से मना कर दिया था और अब संसद से पारित क़ानून पर स्टे देने से इनकार कर दिया है| यह भी पहली बार हो रहा है कि प्रमुख विपक्षी दल संसद से पारित हर कानून को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती देकर संसद की गरिमा घटाने की कोशिश कर रहा है| उसने 370 को चुनौती के बाद नागरिकता संशोधन क़ानून को भी चुनौती दी हुई है|
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से कांग्रेस का गांधी परिवार इतना निराश है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी को मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रेस कांफ्रेंस में आकर लोकतंत्र की दुहाई देनी पड़ी| राहुल गांधी ने कहा कि यह कहना पूरी तरह से झूठ है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है, यहाँ कोई डेमोक्रेसी नहीं है|
हताशा में कांग्रेस ने भारत के लोकतंत्र पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया है| राहुल गांधी ने जो दूसरी बात कही वह यह कि जब कांग्रेस के खाते फ्रीज किए गए तो किसी अदालत या चुनाव आयोग ने आवाज नहीं उठाई| असल में कांग्रेस की यह प्रेस कांफ्रेंस उसके खाते सील कर देने के मुद्दे पर थी, जिसमें कांग्रेस ने सरकार के साथ साथ सुप्रीमकोर्ट और चुनाव आयोग को भी कटघरे में खड़ा करने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की, जबकि इस मुद्दे पर कांग्रेस पहले भी दो बार प्रेस कांफ्रेंस कर चुकी थी, उसे ही दोहराया गया|
सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अब अवैध ठहरा दिए गए इलेक्टोरल बॉन्ड के मुद्दे को भी तीसरी या चौथी बार उठाया| सोनिया गांधी ने कहा कि भाजपा ने इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से करोड़ों रूपए इकठ्ठे किए, लेकिन विपक्ष के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि उसे भी तो इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा मिला| कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस और डीएमके को भी तो इलेक्टोरल बॉन्ड से सैकड़ों करोड़ रुपए मिले|
सोनिया गांधी ने कहा है कि भाजपा को सबसे ज्यादा पैसा मिला, लेकिन अगर इलेक्टोरल बॉन्ड प्रणाली न होती, तो भी क्या भाजपा को ज्यादा चंदा नहीं मिलता| कांग्रेस जब सत्ता में थी, क्या तब भाजपा या अन्य विपक्षी दलों को उतना चंदा मिलता था, जितना कांग्रेस को मिलता था| यह स्वाभाविक है कि सत्ताधारी दल को ज्यादा चंदा मिलता ही है|
वैसे भी अगर तुलनात्मक अध्ययन करें तो सत्रहवीं लोकसभा में कांग्रेस के 55 सांसद चुने गए थे, जबकि भाजपा के 303 सांसद चुने गए थे| अगर उस हिसाब से देखें तो भाजपा को कांग्रेस से छह गुणा के करीब चंदा मिलना चाहिए था, जबकि भाजपा को कांग्रेस का पांच गुणा चंदा भी नहीं मिला| अगर हम भाजपा को मिले चंदे की सारे दलों को मिले चंदे से तुलना करें तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 47 प्रतिशत चंदा मिला है, और विपक्ष को 53 प्रतिशत चंदा मिला है| पिछले चुनावों में सत्ता पक्ष और विरोधी पक्ष को लगभग इसी अनुपात में वोट भी मिले थे|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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