China on Ladakh: चीन की लद्दाख पर नजर, हिन्द महासागर पर निशाना

China on Ladakh: 5 अगस्त, 2019 को भारत की संसद ने जम्मू-कश्मीर में 1949 से लागू अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया। कुछ लोगों ने मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी यह संवैधानिक मुहर लगा दी है कि धारा 370 अस्थाई व्यवस्था थी, जिसे समाप्त करने का पूरा अधिकार केंद्र सरकार को था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पाकिस्तान और चीन को कोई मतलब नहीं था, फिर भी दोनों पड़ोसियों ने अनर्गल टिप्पणियाँ की। पाकिस्तान ने खीज मिटाने के लिए मुस्लिम देशों को खरी खोटी सुनाई कि कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा एकतरफा कारवाई के बावजूद मुस्लिम देश भारत का साथ दे रहे हैं, लेकिन चीन ने फिर एक बार यह दावा किया कि लद्दाख उसका हिस्सा है और भारत के किसी न्यायालय के निर्णय से उसके दावे पर कोई असर नहीं पड़ता। चीन के इस दावे को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि चीन लद्दाख के बहाने हिन्द महासागर में अपनी स्थिति मजबूत करने और क्वाड से निपटने का मंसूबा बना चुका है।

China targets Indian Ocean on the name of Ladakh

लद्दाख के बारे में बीजिंग की सोच का नमूना मई 2020 में, चीन द्वारा लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पार एक साथ कई घुसपैठ के रूप में देखा जा सकता है। इन घटनाओं के कारण ही दोनों पक्षों के हजारों सैनिक एक दूसरे के सामने डटे हुए हैं। क्योंकि यह पता नहीं कि चीन कब कोई एक घातक झड़प कर ले और फिर से भारत को युद्ध के करीब ले आए। हालांकि फरवरी 2021 में सैनिकों को पीछे हटाने के समझौते पर घोषणा की गई थी, लेकिन हकीकत में सैनिकों को हटाने की नीति पर कार्यान्वयन हुआ ही नहीं। इससे ही स्पष्ट होता है कि चीन के साथ भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा दीर्घकालिक होनी है और यह बड़ी चुनौती भी है।

लद्दाख की सीमा पर भारत को एक नई रणनीतिक वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है, जहां चीन एक स्पष्ट और स्थायी प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा है और जिसका भाव शत्रुता और अविश्वास का है। सीमा पर चीन का भारी सैन्य जमावड़ा और खूनी हिंसा भारत देख चुका है। इस वास्तविकता को देखते हुए लद्दाख पर चीन के बयान को भारत हल्के में नहीं ले सकता। क्योंकि चीन लद्दाख में सैन्य आधुनिकीकरण और हिंद महासागर में समुद्री विस्तार में लगा हुआ है। चीनी नौसेना के निरंतर विस्तार के सामने, भारत को भी हिंद महासागर में सैन्य शक्ति बढ़ाने की जरूरत है, नहीं तो चीन के सामने अपनी स्थिति कमजोर होने का जोखिम है।

भारत के लिए चुनौती हिंद महासागर में तेजी से बढ़ती चीनी सैन्य उपस्थिति ही नहीं है, बल्कि उत्तरी सीमा पर बढ़ते चीनी सैन्य खतरे का भी आकलन करके कदम उठाने की जरूरत है। हिंद महासागर में भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया भी मजबूती से खड़ा है। अमेरिका भी चाहता है कि भारत तेजी से सक्षम और सक्रिय बने ताकि चीन के मुकाबले खड़े होकर क्वाड के हितों की रक्षा कर सके। हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति प्रक्षेपण क्षमताओं के निर्माण के लिए भारतीय सेना लगातार प्रयासरत भी है, लेकिन चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा बहुत खतरनाक है।

लद्दाख के साथ लगी चीन की सीमा भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए परीक्षा के समान है। लद्दाख में आने वाला कोई भी संकट भारत-चीन के बीच युद्ध की स्थिति पैदा कर सकता है। कोई भी नया विवाद पीएलए की वापसी को रोक सकता है, जिसके लिए चीन फिलहाल सैद्धांतिक रूप से ही सही, तैयार हुआ है।

भारत अपनी ओर से यथास्थिति की वापसी का प्रयास कर रहा है, लेकिन जब तक दोनों पक्षों की सैन्य वापसी शुरू नहीं हो जाती तब तक संकट टला हुआ नहीं माना जा सकता। वार थिएटर से सेनाओं की वापसी की आशंका चीन से क्षेत्रीय जोखिम को बढ़ा ही रही है और भारतीय रक्षा नीति की प्राथमिकता को भी प्रभवित कर रही है। निश्चित रूप से अन्य अनिवार्यताओं के लिए संसाधनों में पुनर्संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी।

चीन की सेना की लद्दाख में कोई भी नयी घुसपैठ से दशकों से भारत द्वारा राजनीतिक समझौतों के प्रयासों को भी धक्का लग सकता है। नई दिल्ली ने विश्वास-निर्माण के लिए हर संभव कोशिश की है। इतिहास साक्षी है कि 1962 के युद्ध के बाद, दोनों देशों के बीच संबंधों को फिर से सामान्य होने में कई दशक लग गए और आज भी अनसुलझी सीमा तमाम राजनयिक समझौतों को बेअसर बना रही है। फिर 15 जून 2020 को गलवान घाटी में घातक झड़प ने तमाम राजनयिक प्रयासों को नष्ट कर दिया।

विदेश मंत्री एस जयशंकर खुद यह कह चुके हैं कि लद्दाख संकट ने संबंधों को गंभीर रूप से बिगाड़ दिया और असाधारण तनाव में बदल दिया। चीन की हाल की प्रतिक्रिया भी राजनयिक संबंध को प्रतिकूल, परस्पर विरोधी बनाने में ही भूमिका निभाएगी। इस तरह की शब्दावली संबंधों में पड़ी दरार की मरम्मत नहीं करेगी।

चीन से हमारे रिश्ते का भविष्य सीमा पर शांति और शांति से ही संभव है, व्यापार और बाकी संबंधों के आधार अवास्तविक है। भारत ने चीन पर व्यापार के भरोसे को कम कर दिया है। अब चीन को अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना होगा। नई दिल्ली अब सत्यापित होने तक चीन के दावे पर विश्वास नहीं कर सकता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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