Caste Politics: विपक्ष खुद भाजपा को हिंदुत्व पर ले आया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 15 दिनों से चुनावी राज्यों का दौरा कर रहे हैं। इस दौरान वह जिस भी राज्य में जा रहे थे, अपनी सरकार की पिछले 9 साल की उपलब्धियों का हिसाब किताब जनता के सामने रख रहे थे। पूरी हो चुकी परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे थे और नई परियोजनाओं का शिलान्यास कर रहे थे। कहीं कोई साम्प्रदायिक बात नहीं हो रही थी, कहीं कोई हिन्दू मुस्लिम नहीं हो रहा था, जैसा कि भाजपा पर आरोप लगता है।
मोदी पिछले कुछ सालों से पसमांदा मुसलमानों का जिक्र भी कर रहे थे। पसमांदा यानि मुसलमानों की पिछड़ी जातियां। उनके विकास को मुद्दा बना रहे थे। आरएसएस ने भी मुसलमानों के साथ संपर्क साधना शुरू किया था, ताकि रामजन्मभूमि आन्दोलन के कारण जो वैमनस्य पैदा हुआ था, उसे खत्म किया जा सके। लेकिन जैसे जैसे पांच विधानसभाओं के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भाजपा अपनी विचारधारा को लेकर आक्रामक हो रही है।

दरअसल, खुद विपक्ष ने सनातन और जातीय जनगणना जैसे मुद्दे अपने एजेंडे पर लेकर भाजपा को हिंदुत्व के एजेंडे पर लौटने को मजबूर किया है। विपक्षी गठबंधन एक लाईन पर चल रहा है। स्टालिन ने सनातन विरोधी लाईन दी थी। कांग्रेस ने अभिव्यक्ति की आज़ादी कह कर रफा दफा करने की कोशिश की। जबकि द्रमुक के नेताओं ने साफ़ तौर पर कहा कि विपक्ष का इंडी गठबंधन सनातन विरोध के आधार पर बना है। कमसे कम उनके इस बयान का खंडन आना चाहिए था, लेकिन शरद पवार की अध्यक्षता में दिल्ली में हुई को-आर्डिनेशन कमेटी की मीटिंग में भी उसका विरोध नहीं हुआ।
सनातन के मुद्दे की जड़ में हिन्दुओं का जातिवाद है, जिसे भारतीय संविधान और 21वीं सदी में स्वर्ण हिन्दू भी मौटे तौर पर नकार चुके हैं। सदियों से भेदभाव का शिकार हुए दलितों और आदिवासियों को बराबरी पर लाने के लिए सिर्फ आरक्षण नहीं दिया गया, बल्कि छूआछूत और जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करने पर सजा का प्रावाधान भी रखा गया है।

1990 से अन्य पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण दिया गया है। अन्य पिछड़ी जातियों की सरकारी नौकरियों में ही नहीं राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र खुद पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू आदिवासी हैं। इससे पहले के राष्ट्रपति दलित समुदाय से थे। कई राज्यों के मुख्यमंत्री ओबीसी या आदिवासी हैं।
पिछले दिनों अमित शाह ने लोकसभा में आंकड़े देकर बताया था कि मोदी सरकार में प्रधानमंत्री समेत 27 ओबीसी मंत्री हैं। भाजपा के 303 में से 85 सांसद ओबीसी हैं, भाजपा के 1358 विधायकों में से 365 विधायक ओबीसी हैं। इसी तरह 163 विधान परिषद सदस्यों में से 65 ओबीसी हैं।
इसलिए कोई कारण नहीं बनता कि दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को भड़काने के लिए सनातन विरोध का झंडा बुलंद किया जाए या भाजपा को दलित, आदिवासी या ओबीसी विरोधी बताया जाए। लेकिन जवाहर लाल नेहरु के समय से द्रमुक की द्रविड़ राजनीति का विरोध करने वाली कांग्रेस ने रहस्यमई चुप्पी साध कर सनातन विरोध की मौन स्वीकृति दे दी।
इसी तरह कांग्रेस हमेशा से जाति आधारित जनगणना की विरोधी रही। कांग्रेस यह मानती रही कि जाति आधारित जनगणना हिन्दुओं में वैमनस्य फैलाने का काम करेगी। अंग्रेजों ने 1931 में हिन्दुओं को आपस में लड़ाने के इरादे से ही जातीय जनगणना करवाई थी। 2011 में मनमोहन सरकार ने राजनीतिक मजबूरी के चलते जातीय जनगणना करवाई थी, अगर वह ऐसा नहीं करते तो मुलायम और लालू यादव उनकी सरकार गिरा देते।
मनमोहन सरकार ने खुद जातीय जनगणना के आंकड़े जाहिर नहीं किए, और अब कांग्रेस प्रस्ताव पास कर के जातीय जनगणना को अपने एजेंडे पर ले आई, क्योंकि कांग्रेस सरकारों की तुष्टिकरण की राजनीति से खफा हिन्दू जातिवाद को पीछे छोड़कर भाजपा के पीछे खड़े हो गए हैं। इससे साफ़ है कि जाति आधारित जनगणना का लक्ष्य राजनीतिक है, सामाजिक न्याय नहीं है।
बिहार में भाजपा के बढ़ते कदमों और अपनी ताकत कम होती देख कर नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना का राग अलापना शुरू किया था। उन्होंने खुद बिहार में जातीय जनगणना करवा भी ली और पांच राज्यों की विधानसभाओं में मुद्दा बनवाने के लिए बिहार की जनगणना के आंकड़े जगजाहिर भी कर दिए। जिसमें 36.01 प्रतिशत अत्यंत पिछड़ा, 27.12 प्रतिशत पिछड़ा, 19.65 प्रतिशत अगड़े, 15.52 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 1.68 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति बताए गए हैं।
राहुल गांधी ने तुरंत बयान दिया कि बिहार में जाति आधारित जनगणना से पता चलता है कि पिछड़ों की आबादी 84 प्रतिशत है। आरक्षण का कोटा बढ़वाने के लिए आन्दोलन शुरू करवाने की नई राजनीतिक साजिश का बीज बो दिया गया है। स्टालिन के बाद अब नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना के आंकड़े जगजाहिर करके इंडी एलायंस को हिन्दुओं को विभाजित करने की लाइन दे दी है।
विपक्ष के इन दोनों एजेंडों ने भाजपा को भी खुल कर खेलने का मौक़ा दे दिया है। इसलिए चेहरे पीछे छूट गए, सनातन और हिंदुत्व आगे आ गया है। विपक्ष ने खुद भाजपा को ध्रुवीकरण का हथियार थमा दिया है। 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन पर जब इंडी एलायंस जातीय राजनीति का कार्ड चल रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान के चितौड़ में चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने भी हिन्दुओं को भाजपा के पक्ष में एकजुट बनाए रखने के लिए उदयपुर के कन्हैया का जिक्र किया, जिसका सर तन से जुदा कर दिया गया था। हिंदुत्व की लाईन पर लौटने का सिर्फ यह एक संकेत नहीं है|
पिछले दिनों भाजपा के सांसद रमेश विधूड़ी ने बसपा के सांसद दानिश अली पर बिना लाग लपेट कुछ टिप्पणियाँ की थी। बताया तो यह जा रहा था कि मोदी विधूड़ी से बहुत नाराज हैं। लोग समझते थे कि भाजपा उन्हें नूपुर शर्मा की तरह किनारे कर देगी। लेकिन उन्हें राजस्थान में सचिन पायलट के इलाके में चुनाव इंचार्ज बना दिया गया है।
वैसे यह फैसला लोकसभा में हुई नौक झोंक से पहले का था। विधूड़ी को पांच दिन पहले सूचना दी जा चुकी थी, लेकिन लोकसभा में उनकी टिप्पणियों पर नोटिस जारी करने के बावजूद उन्हें चुनावी जिम्मेदारी से हटाया नहीं गया। विधूड़ी जाति से गुर्जर हैं, और उन्हें राजस्थान के गुर्जर बहुल इलाके का ही इंचार्ज बनाया गया है।
राजस्थान में गुर्जर हिन्दू भी हैं, और मुसलमान भी हैं। मुस्लिम गुर्जर तो कांग्रेस को वोट देता ही है, हिन्दू गुर्जर भी सचिन पायलट के पीछे लग कर कांग्रेस को वोट देता है। विधूड़ी ने गुर्जर और मुस्लिम की लाईन खिंच दी है। अब वह सचिन पायलट के इलाके में हिन्दू गुर्जर वोटरों में कितनी सेंधमारी करते हैं, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन विधूड़ी सिर्फ गुर्जर इलाके की पहचान नहीं बनेंगे। वह कपिल मिश्रा की तरह अग्रेसिव हिंदुत्व की आवाज बनेंगे।
राजस्थान में मुस्लिम आबादी भले ही सिर्फ 9 प्रतिशत है, लेकिन 15 सीटें तो मुस्लिम वर्चस्व वाली हैं। 2008 में कांग्रेस के 11 मुस्लिम एमएलए थे, जबकि 2013 में चली हिंदुत्व की लहर में कांग्रेस का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता था। जबकि भाजपा के दो मुस्लिम उम्मीदवार जीत गए थे। सनातन विरोधी एजेंडे पर कांग्रेस ने अपना स्टेंड क्लीयर नहीं किया है, जिसका असर राजस्थान में ज्यादा होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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