Caste Politics: मोदी को मिली नीतीश, लालू, अखिलेश की ओबीसी राजनीति की काट

Caste Politics: नीतीश कुमार ने एनडीए में रहते हुए नरेंद्र मोदी के खिलाफ गड्ढा खोदना शुरू कर दिया था| नीतीश कुमार ने 2019 में ही लालू यादव के साथ सांठगांठ करके बिहार विधानसभा से जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास करवा लिया था| अगले साल 2020 में एक बार फिर विधानसभा में प्रस्ताव पास करवाया गया| 2021 में वह बिहार का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले और उनसे आग्रह किया कि देश भर में जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए|

सरकार में शामिल प्रदेश भाजपा को भी मजबूरी में नीतीश कुमार और लालू यादव की मांग का समर्थन करना पड़ा था| लेकिन मोदी सरकार ने जाति आधारित जनगणना का प्रस्ताव ठुकरा दिया, तो नीतीश ने एलान किया कि बिहार में राज्य सरकार जाति आधारित जनगणना करवाएगी| 2022 में एनडीए से बाहर आकर लालू यादव के समर्थन से फिर मुख्यमंत्री बन गए, और पहला काम यह किया कि उन्होंने बिहार में जातीय सर्वे करवा भी लिया है|

Caste Politics bjp vs Nitish kumar Lalu yadav akhilesh yadav over OBC politics

एक एप में सारी जानकारियाँ एकत्र कर ली गई हैं, जिसे नीतीश सरकार कभी भी जारी कर सकती है| जाति आधारित जनगणना का मूल उद्देश्य यह है कि ओबीसी वर्ग को उसकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का लाभ दिया जाए| जो आंकड़े तैयार किए गए हैं, उनमें बताया जाएगा कि किस जाति की कैसी शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति है| जाति आधारित जनगणना करवा कर नीतीश कुमार और लालू यादव ने पूरे देश में हिन्दुओं को 1989 की तरह जातीय आधार पर बांटने की गहरी साजिश रची थी|

1989 में लालू यादव, शरद यादव और मुलायम सिंह के दबाव में ही वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करके ओबीसी आरक्षण लागू किया था, जिसके खिलाफ देश भर में दंगे भड़क उठे थे| स्वर्ण जातियों के अनेक छात्रों ने आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह किया था| पूरे देश में जातीय वैमनस्यता पैदा हो गई थी और पूरा देश जातीय हिंसा की चपेट में आ गया था|

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उसके जवाब में मंडल आयोग की सिफारिशों से बिखरे हिन्दुओं को फिर से एकजुट करने के लिए भाजपा ने श्रीरामजन्मभूमि आन्दोलन को तेज किया और लालकृष्ण आडवानी ने श्रीराम रथयात्रा शुरू की| आडवानी का रथ जब बिहार पहुंचा तो बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने उन्हें गिरफ्तार करवा लिया था| जवाब में भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह सरकार गिर गई|

इसी से कमंडल राजनीति का उदय हुआ, जिसके अंतर्गत रामजन्मभूमि आन्दोलन ने फिर से हिन्दुओं को एकजुट किया| 1992 में बाबरी ढांचा टूट गया, 1996 से भाजपा का ग्राफ बढ़ता गया और मंडल राजनीति का ग्राफ गिरता गया| धीरे धीरे यूपी में मुलायम सिंह की राजनीति खत्म हो गई, और बिहार में लालू के बाद नीतीश की राजनीति भी खत्म हो रही थी| इसीलिए दोनों ने एक बार फिर जाति आधारित राजनीति का दांव खेला है| इसे वे चुनावी जीत का मंत्र मानते हैं|

इसीलिए नीतीश कुमार, लालू यादव और अखिलेश यादव ने इंडी एलायंस की मुम्बई बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव में जाति आधारित जनगणना की मांग जुड़वाने की कोशिश की थी, जिसका ममता बनर्जी, केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने विरोध किया| जब प्रस्ताव में जाति आधारित जनगणना पर गहरे मतभेद हो गए तो प्रस्ताव ही पास नहीं हो सका| लेकिन बिहार की हो चुकी जातीय जनगणना चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है, यहाँ तक कि उसका असर उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है|

इस बीच भारतीय जनता पार्टी के हाथ में नीतीश, लालू, अखिलेश की जातीय राजनीति का माकूल जवाब मिल गया है| यूपीए शासनकाल के दौरान फरवरी 2014 में पिछड़ा वर्ग आयोग ने आरक्षण की वास्तविक स्थिति का आकलन करवाने की सिफारिश की थी, जिसे मनमोहन सरकार ने मंजूरी दे दी थी| आकलन यह किया जाना था कि ओबीसी वर्ग को आरक्षण का कितना लाभ मिला, किन जातियों को कितना लाभ मिला, और कौन सी जातियां लाभ उठाने से वंचित रह गई। इसका उद्देश्य था कि जो जातियां आरक्षण का लाभ उठाने में वंचित रह गई, उन्हें कैसे मुख्यधारा में लाकर लाभ दिया जाए|

आयोग ने यह सब काम करवाने के लिए मनमोहन सरकार से बजट माँगा था, लेकिन मनमोहन सरकार पैसा अलॉट करती, उससे पहले ही लोकसभा चुनाव आ गए और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई| खुद ओबीसी समाज से आने वाले नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, उन्हें पता था कि ओबीसी आरक्षण का लाभ कुछ जातियों तक ही सीमित रह गया था| इसलिए उन्होंने 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस रोहिणी की अध्यक्षता में एक अध्ययन कमेटी बना दी| शुरू में कमेटी को अध्ययन के लिए सिर्फ 12 हफ्ते का समय दिया गया था, लेकिन जैसा कि होता है, कोई कमेटी अगर किसी पूर्व जज की अध्यक्षता में हो तो हफ्तों का काम सालों में होता है| कार्यकाल बढ़ते बढ़ते अब यह रिपोर्ट आ गई है|

जस्टिस रोहिणी ने यह रिपोर्ट 31 जुलाई को राष्ट्रपति को सौंपी है। छह साल की मेहनत से तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ओबीसी आरक्षण का लाभ सिर्फ दबंग जातियों ने ही उठाया है, अब उन जातियों को आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए| यह रिपोर्ट अगले चुनाव में नीतीश-लालू की जातीय राजनीति की काट में मोदी के लिए तुरुप का पत्ता बन सकता है| जिसने ओबीसी राजनीतिक परिवारों की टेंशन बढ़ा दी है|

यह रिपोर्ट संसद के विशेष सत्र में रखी जाएगी, और आरक्षण का लाभ उठाने वाली नेताओं की जातियों को देश के ओबीसी समाज में बेनकाब किया जाएगा| नरेंद्र मोदी और भाजपा को बिहार और उत्तर प्रदेश में लालू, नीतीश और अखिलेश की राजनीति की न सिर्फ काट मिल गई है, बल्कि पिछड़ी जातियां ही इन दोनों राज्यों में इन तीनों नेताओं के खिलाफ खड़ी हो जाएंगी|

कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का 95 फीसदी लाभ सिर्फ 25 प्रतिशत ओबीसी जातियों ने उठाया, जबकि अति पिछड़ी 75 प्रतिशत जातियों को कोई लाभ नहीं मिला| करीब 983 जातियों को सरकारी नौकरियों और कालेजों में एडमिशन का लाभ बिलकुल नहीं मिला| रिपोर्ट में देश की 2663 पिछड़ी जातियों की पहचान की गई है|

इस रिपोर्ट में ओबीसी जातियों को तीन वर्गों में बांटने की सिफारिश की गई है, जिनमें करीब डेढ़ हजार जातियों को ए श्रेणी में रख कर उन्हें दस प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई है। ये वो जातियां हैं, जिन्हें पिछले 34 साल से ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिला| बी श्रेणी में उन एक हजार जातियों को रखा गया है, जिन्हें आरक्षण का लाभ बहुत ही कम मिला। सी श्रेणी में उन बाकी की डेढ़ सौ जातियों को रखा गया है जिन्होंने आरक्षण का 95 फीसदी लाभ उठाया है| यह रिपोर्ट ओबीसी के नाम पर 34 साल तक अपनी राजनीति चमकाने वालों को ओबीसी समाज में ही नंगा करने का काम करेगी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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