मोदी पर क्या कार्रवाई कर सकता है आयोग या कोर्ट?
Chunav Aachar Sanhita: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नफरत फैलाने का आरोप लगा है| दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें छह साल के लिए उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की गई है|
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में नरेंद्र मोदी के 9 अप्रेल को पीलीभीत में दिए भाषण का हवाला दिया है।उस भाषण में नरेंद्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के शिलान्यास का बॉयकॉट किया|

उन्होंने कांग्रेस पर मुस्लिमपरस्ती करने का आरोप भी लगाया था|पीलीभीत में सिखों की तादाद काफी संख्या में है, इसलिए नरेंद्र मोदी ने सिख वोटरों को लुभाने के लिए उनकी सरकार की ओर से करतारपुर कॉरिडोर खोलने और अफगानिस्तान से पवित्र गुरुग्रंथ साहिब को वापस लाने का जिक्र भी किया था।
आचार संहिता के अनुसार चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है| याचिकाकर्ता सुप्रीमकोर्ट के वकील आनन्द एस जोनदाले ने कहा है कि उन्होंने 10 अप्रेल को चुनाव आयोग से शिकायत की थी, जिसमें उन्होंने तर्क दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने आचार संहिता के निर्देशों के संग्रह खंड-III में उल्लिखित नियम -I (1) और (3) का उल्लंघन किया है| लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की| वैसे देखा जाए, तो यह आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बिलकुल नहीं बनता, क्योंकि मोदी ने धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगे, न ही किसी धर्म संप्रदाय के खिलाफ बोले।
किसी भी नेता को अपने पूर्व के किए गए काम गिनाने का पूरा हक है, और विरोधियों की गलतियां या उनकी नीतियां या पूर्व के काम गिनाने का भी पूरा हक है| नरेंद्र मोदी ने यही किया था| इससे ज्यादा खतरनाक तो हैदराबाद के चुनाव प्रचार में हो रहा है, जहां भाजपा की उम्मीदवार माधवी लता त्रिशूल हाथ में ले कर रोड शो करती देखी गई, और पहली बार कड़े मुकाबले का सामना कर रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष और उम्मीदवार असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों से खुलेआम मस्जिद के नाम पर वोट मांगते दिखाई दे रहे हैं।

हालांकि हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ दायर याचिका पर अभी सुनवाई नहीं की है, 29 अप्रेल को सुनवाई होने की संभावना है, लेकिन ज्यादा उम्मीद यही है कि हाईकोर्ट इसे चुनाव आयोग पर छोड़ने की बात कह कर याचिका को डिसमिस कर देगी| क्योंकि चुनावों के दौरान अदालतें अमूमन चुनाव आयोग के काम में कोई दखल नहीं देती हैं| यह याचिका सुप्रीमकोर्ट के वकील आनन्द एस जोंदाले ने दाखिल की है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग और नरेंद्र मोदी को पार्टी बनाया है| उनका आरोप है कि मोदी ने हिन्दुओं से मन्दिर निर्माण के नाम पर, सिखों के करतारपुर कॉरिडोर और गुरुग्रंथ साहिब के नाम पर वोट मांगे।
इसके बाद का एक मामला ज्यादा गंभीर है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 अप्रेल को बांसवाड़ा में कहा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो वह हिन्दुओं की सम्पत्ति छीन कर, यहां तक कि हिन्दू औरतों के मंगलसूत्र छीनकर ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों और घुसपैठियों को सौंप देगी| नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में मुसलमानों का जिक्र भी किया था| इस पर भी कांग्रेस ने मोदी के खिलाफ चुनाव आयोग को शिकायत की थी।
चुनाव आयोग ने इस शिकायत को तो गंभीर माना, लेकिन नोटिस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देने के बजाए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को दिया। इसी तरह की एक शिकायत राहुल गांधी के खिलाफ थी, उस पर भी चुनाव आयोग ने राहुल गांधी को नोटिस देने के बजाए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को नोटिस दे दिया।
इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी नेता के खिलाफ आई शिकायत पर उसकी पार्टी के अध्यक्ष को नोटिस दिया गया हो| हाल ही में जितने भी नेताओं के खिलाफ शिकायत आई थी, चुनाव आयोग ने उन्हीं को नोटिस दिया था, जिनके खिलाफ शिकायत आई थी| इसलिए जब मोदी के बजाए जेपी नड्डा को और राहुल गांधी के बजाए खड़गे को नोटिस दिया गया तो कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री से डरता है, चुनाव आयोग प्रधानमंत्री की जेबी संस्था बन गई है, इसलिए उसने मोदी को नोटिस नहीं दिया और अपनी झेंप मिटाने के लिए राहुल गांधी को भी नोटिस नहीं दिया।
सवाल यह है कि चुनाव आयोग क्या कर सकता है| चुनाव आयोग किसी भी शिकायत पर संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी करके पूछताछ कर सकता है, और आरोप सही पाए जाने पर कार्रवाई कर सकता है| जैसे हाल ही में हेमा मालिनी के खिलाफ टिप्पणी करने पर कांग्रेस के नेता सुरजेवाला के एक दिन के लिए प्रचार करने पर रोक लगा दी गई थी।
अभिनेत्री और मंडी लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार कंगना रानौत के खिलाफ अभद्र टिप्पणी पर कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत और ममता बनर्जी के खिलाफ टिप्पणी पर भाजपा नेता दिलीप घोष की कड़ी निंदा कर उन्हें चेतावनी जारी की गई| आयोग इन दोनों के जवाब से संतुष्ट नहीं था| आयोग ने सुप्रिया श्रीनेत और और दिलीप घोष की पार्टियों के अध्यक्षों को भी लिखा कि वे अपने नेताओं को कंट्रोल में रखें।
लेकिन सवाल यह है कि चुनाव आयोग या हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन भाषणों पर वैसी कार्रवाई कर सकते हैं, जैसी याचिकाकर्ता ने मांग की है, क्या उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जा सकती है| चुनाव आयोग अब उन उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक जरुर लगाता है, जिन्होंने पहले कोई चुनाव लड़ा हो, लेकिन चुनाव के खर्चे का हिसाब किताब आयोग को दाखिल न किया हो| इस बार भी चुनाव आयोग ने हर राज्य में उन उम्मीदवारों की सूची भेज कर उनके नामांकन स्वीकार नहीं करने की सिफारिश की थी।
आज तक कोई ऐसा उदाहरण मौजूद नहीं है, जब आचार संहिता का उल्लंघन किए जाने पर किसी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई हो| किसी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का प्रावाधान जन प्रतिनिधित्व क़ानून में उल्लिखित है, लेकिन इसमें आचार संहिता के उलंघन पर चुनाव लड़ने से रोक जैसा कोई प्रावाधान नहीं है| लेकिन 1987 में ऐसा हो चुका है, जब चुनाव आयोग ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को भड़काऊ भाषण देने पर छह साल के लिए उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया था| शिवसेना को उस समय तक राजनीतिक दल की मान्यता नहीं थी।
बाल ठाकरे ने जीवन भर कोई चुनाव न पहले लड़ा था, न बाद में लड़ा, लेकिन सब जानते हैं कि बाल ठाकरे के भाषण बहुत ही सांप्रदायिक और भड़काऊ होते थे| 1987 में महाराष्ट्र विधानसभा की विले पार्ले सीट पर उप चुनाव हो रहा था| कांग्रेस के उम्मीदवार प्रभाकर काशीनाथ कुंटे के मुकाबले शिवसेना ने निर्दलीय डा. रमेश यशवंत प्रभु को समर्थन दिया था| प्रभु की एक जनसभा में भाषण देते हुए बाल ठाकरे ने कहा था कि "हम हिन्दुओं की रक्षा के लिए यह चुनाव लड़ रहे हैं, हमें मुसलमानों के वोटों की चिंता नहीं है, यह देश हिन्दुओं का था और हिन्दुओं का ही रहेगा।"
निर्दलीय डा. रमेश यशवंत प्रभु चुनाव जीत गए थे| बाल ठाकरे के भाषण के आधार पर पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीमकोर्ट ने उनका चुनाव रद्द कर दिया| सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रपति से बाल ठाकरे पर कार्रवाई की सिफारिश भी की थी| राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग से सिफारिश ले कर बाल ठाकरे के मताधिकार पर छह साल के लिए रोक लगा दी थी।
बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगाने की सिफारिश करने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल को बाद में सोनिया गांधी ने राज्यसभा का सदस्य बनाया और मनमोहन सरकार में मंत्री भी| गिल के कांग्रेस सरकार में मंत्री बनने से पहले टीएन शेषन भी मुख्य चुनाव आयुक्त पद से रिटायर होने के बाद कांग्रेस के टिकट पर लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके थे।
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