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इंडिया गेट से: महाराष्ट्र- एक तीर से कई निशाने

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एकनाथ शिंदे ने खुद को शिवसेना का नहीं बल्कि महाराष्ट्र का भी बड़ा नेता साबित कर दिया। इसी का इनाम देते हुए भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया है। शिवसेना के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की बगावत हुई हो। पहली बार बाला साहेब ठाकरे के समय ही 1991 में छगन भुजबल ने शिवसेना में बगावत की थी। भुजबल की अगुआई में 18 शिवसेना विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे। छगन भुजबल की बगावत के बाद विधानसभा में शिवसेना विधायकों की संख्या 52 से घटकर 34 रह गई थी।

eknath shinde

दूसरी बार यह स्थिति तब पैदा हुई जब शिवसेना-भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रहे नारायण राणे ने बगावत की, लेकिन वह भी इतनी ताकत नहीं दिखा सके थे कि ठाकरे परिवार का नेतृत्व चरमरा जाता। राणे भी उद्धव ठाकरे से टकराव के कारण 2005 में शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में चले गए थे। उद्धव ठाकरे और राणे में टकराव इतना बढ़ गया था कि जब राणे ने शिवसेना से इस्तीफा दिया तो उद्धव ठाकरे ने उन्हें पार्टी से निकालने का ऐलान करते हुए उन्हें गेंगस्टर तक कहा था।

तीसरी बार पार्टी में बड़ी बगावत तब हुई थी जब बाला साहेब ठाकरे ने अपने राजनीतिक वारिस माने जाने वाले अपने भतीजे राज ठाकरे की बजाए, अपने बेटे उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। महाराष्‍ट्र की राजनीति में राज ठाकरे कभी चमकता सितारा माने जाते थे। उनके आक्रामक तेवरों और बाल ठाकरे से मिलती-जुलती छवि ने राज्‍य में उन्‍हें लोगों का चहेता बना दिया था। राज ठाकरे को शिवसेना के भावी नेता के तौर पर देखा जाने लगा। उद्धव को अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज होकर राज ठाकरे ने शिवसेना से बगावत कर दी और मार्च 2006 में अपनी पार्टी बना ली, लेकिन वह भी शिवसेना के संगठन और विधायकों में कोई बड़ी बगावत नहीं करवा सके थे। इन तीन बगावतों की पृष्ठभूमि में देखें, तो एकनाथ शिंदे की बगावत विस्फोटक रही, जिसने बाला साहेब ठाकरे के वारिस को मात दे दी।

मोटे तौर पर इसकी तीन वजहें हैं। पहली, बाला साहेब ठाकरे का बेटा होने का घमंड होना। दूसरी, अपने राजनीतिक विरोधी के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करना। तीसरी, हिंदुत्व की विचारधारा छोड़कर बाला साहेब की विचारधारा के दुश्मनों के साथ मिलकर सरकार बनाना। चौथी, शिवसेना विधायकों को भेड बकरियां समझना।

उद्धव ठाकरे को यह घमंड हमेशा रहा है कि वह बाला साहेब ठाकरे के बेटे हैं, इसलिए महाराष्ट्र में उनका अलग स्टेट्स है। शिवसेना और भाजपा का गठबंधन टूटने का एक कारण नारायण राणे भी थे, जो उद्धव ठाकरे के विरोध के बावजूद भाजपा में शामिल कर लिए गए थे। 2017 में राणे कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होना चाहते थे, उस समय महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन की सरकार थी, देवेन्द्र फडनवीस मुख्यमंत्री थे और राणे को अपने मंत्रिमंडल में शामिल भी करना चाहते थे। लेकिन उद्धव ठाकरे ने भाजपा को धमकी दे दी थी कि अगर राणे को मंत्री बनाया गया, तो शिवसेना गठबंधन तोड़ देगी और सरकार गिरा देगी। यह अपने राजनीतिक विरोधी के साथ दुश्मनों जैसे व्यवहार का सब से बड़ा उदाहरण था। भाजपा ने उस समय राणे से दूरी बना ली थी, लेकिन वह उद्धव के इशारे पर महाराष्ट्र में काम नहीं करना चाहती थी, इसलिए भाजपा 2018 में राणे को राज्यसभा में ले आई और अब वह मोदी सरकार में मंत्री हैं।

उद्धव ठाकरे की राणे से दुश्मनी का दूसरा सबूत तब मिला जब उन्होंने केंद्र का मंत्री होने के बावजूद अपने खिलाफ एक बयान देने पर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था। अब हम आते हैं तीसरे मुद्दे पर, बाला साहेब की विचारधारा को तिलांजली देकर हिंदुत्व विरोधी ताकतों के साथ मिल कर सरकार बनाना। 2019 के चुनाव नतीजों में भाजपा शिवसेना गठबंधन को जनादेश मिला था। गठबंधन ने देवेन्द्र फडनवीस को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव लडा था। लेकिन उद्धव ठाकरे ने जिद्द पकड़ ली थी कि शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाया जाए।

उद्धव का दावा था कि चुनाव से पहले भाजपा ने ढाई ढाई साल मुख्यमंत्री का वादा किया था। हालांकि यह बात पूरी गलत थी, अगर ऐसा कोई समझौता हुआ होता, तो देवेन्द्र फडनवीस मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं होते। लेकिन उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने के लिए शरद पवार और सोनिया गांधी तक से बात कर ली। शिवसेना सांसद संजय राउत ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई। यह शरद पवार और संजय राउत की रणनीति थी कि भाजपा शिवसेना का गठबंधन तोड़ कर महाराष्ट्र में भाजपा के बढ़ते कदमों को रोका जाए।

उद्धव ठाकरे को भी लगता था कि उनके पास मुख्यमंत्री बनने का यही मौक़ा है, अगर भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाती है, तो वे उस के साथ जाएंगे, जो उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगा। जबकि यह बाला साहेब की विचारधारा को तिलांजली थी। बाला साहेब ठाकरे ने दो टूक कहा था कि वह उस दिन शिवसेना को भंग कर देंगे, जिस दिन कांग्रेस के साथ गठबंधन की नौबत आएगी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन किया जो बाला साहेब ठाकरे की आलोचक रही।

कांग्रेस और शिवसेना में मुख्य विरोध वीर सावरकर को लेकर था, सोनिया गांधी की कांग्रेस वीर सावरकर को स्वतन्त्रता सेनानी तक नहीं मानती , उन पर तरह तरह के लांछन लगाती रही है, यहाँ तक कि भारत के विभाजन का ठीकरा भी उन्हीं के सर फोडती रही है। जबकि शिवसेना और भाजपा के लिए वीर सावरकर प्रेरणा पुरुष रहे हैं। उद्धव ठाकरे ने विचारधारा को किनारे कर के सत्ता के लिए कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन किया। सच्चाई यह है कि शिवसेना के विधायकों ने उद्धव ठाकरे के फैसले का उस समय भी विरोध किया था, और बाद में भी अनेक बार उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे कि शिवसेना का आधार हिंदुत्व की विचारधारा है, लेकिन उद्धव ठाकरे नहीं माने। वह शिवसेना के विधायकों को भेड बकरियां समझते रहे, इसलिए विधायकों ने उन्हें बता दिया कि उनके बिना वह कुछ भी नहीं हैं।

अब अपन 2019 पर वापस लौटते हैं, जब उद्धव ठाकरे की जिद्द थी कि भाजपा शिवसेना का मुख्यमंत्री ढाई ढाई साल का होना चाहिए, भाजपा ने सत्ता हाथ से जाने दी थी, लेकिन शिवसेना को मुख्यमंत्री पद नहीं दिया था। अब ढाई साल तक शिवसेना का मुख्यमंत्री रहने के बाद जब सरकार टूटी है, तो भाजपा ने टूटी हुई शिवसेना को मुख्यमंत्री पद प्लेट पर रख कर दे दिया है। कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था कि भाजपा शिंदे को मुख्यमंत्री बनाएगी, सभी मान कर चल एहे थे कि भाजपा के देवेन्द्र फडनवीस मुख्यमंत्री होंगे और एकनाथ शिंदे उप मुख्यमंत्री होंगे। तो सवाल पैदा होता है कि भाजपा ने क्या हासिल किया।

इसके लिए जरा पृष्ठभूमि में जाना पड़ेगा। अपनी 80 दिन की सरकार गिरने के बाद भाजपा ने शिवसेना को तोड़ कर उद्धव ठाकरे को अलग थलग करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया था। देवेन्द्र फडनवीस पिछले दो साल से शिव सेना के विधायकों से संपर्क साध रहे थे, उन्होंने खुद एक एक विधायक से बात की कि उद्धव ठाकरे शिवसेना की मौलिक विचारधारा को नुक्सान पहुंचा रहे हैं। शिवसेना हिंदुत्व पर आधारित पार्टी थी, अगले विधानसभा चुनाव में किस विचारधारा के आधार पर मैदान में जाएगी, उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा। चालीस विधायकों को प्रभावित करके उन्हें एक साथ लाने में एकनाथ शिंदे से ज्यादा देवेन्द्र फडनवीस की भूमिका है। एकनाथ शिंदे के साथ शिवसेना के 40 विधायक ही हैं, जबकि 2019 में शिवसेना के 55 विधायक थे।

भाजपा ने ऐसा क्यों किया कि शिंदे को मुख्यमंत्री और अपने पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को उप मुख्यमंत्री बना दिया, इस के कई बड़े कारण हैं, पहला- उद्धव ठाकरे का घमंड चकनाचूर करके एकनाथ शिंदे को शिवसेना का सर्वमान्य नेता बनाना। दूसरा- शिवसेना को मुख्यमंत्री पद दे कर मुम्बई महानगर पालिका का नियन्त्रण अपने हाथ में लेना। राज्य सरकार से भी ज्यादा बजट वाली मुम्बई महानगर पालिका दशकों से शिवसेना के कब्जे में रही है, भाजपा इसे हासिल करके शिवसेना पर बढत बनाना चाहती है, उद्धव इसके लिए तैयार नहीं थे, जबकि शिंदे तैयार हैं। तीसरा- बिहार के बाद महाराष्ट्र में छोटी पार्टी को मुख्यमंत्री पद सौंप कर भाजपा यह संदेश देने में कामयाब हुई है कि वह गठबंधन को कितना महत्व देती है। चौथा और सब से महत्वपूर्ण कारण - भाजपा के पास कोई खाटी मराठा लीडर नहीं है। एकनाथ सम्भाजी शिंदे शिवाजी महाराज के गढ़ सतारा जिले के मराठा है और महाराष्ट्र में मराठों की आबादी 31 प्रतिशत है। जिसे भाजपा को आने वाले समय में बड़ा राजनैतिक लाभ मिलेगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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English summary
BJP Hits Many Targets With One Arrow In Maharashtra
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