BJP CMs: चुनाव में जीत से ज्यादा मुख्यमंत्रियों के चयन की चर्चा

छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा द्वारा जिन तीन मुख्यमंत्रियों के नामों की घोषणा की गयी है अगर उसका विश्लेषण करना हो तो बड़े से बड़ा राजनीतिक पंडित इस बात का विश्लेषण नहीं कर सकता कि इनको चुनने का आधार क्या है? मसलन, क्या तीनों राज्यों में सिर्फ जातीय समीकरण साधा गया है? नहीं। क्या तीनों राज्यों में बड़े जनाधार वाले नेताओं को महत्व दिया गया है? नहीं। क्या संघ से संबंध इन्हे चुनने का आधार है? नहीं।

चुनावी विश्लेषक अपनी अपनी समझ के अनुसार कोई न कोई आधार खोज ही लेंगे लेकिन असल में सीएम चुनने का आधार क्या है इस गुत्थी को समझ पाना असंभव है। आप जितना अनुमान लगाने की कोशिश करेंगे उतना उलझते जाएंगे कि आखिर इन तीनों राज्यों में किस फार्मूले के तहत सीएम नियुक्त किये गये हैं।

BJP CMs: There is more discussion about selection of Chief Ministers than victory in elections.

ऐसा लगता है कि सारे आधार दरकिनार करके सिर्फ एक आधार देखा गया। वह यह कि जो भी स्थापित नेता हैं उन्हें छोड़कर किसी ऐसे को बना देना है जिसका नाम सुनकर लोग भौचक्के रह जाएं। गूगल पर सर्च करने पर भी लोगों को पता न चले कि ये आखिर हैं कौन? हर एक के मन में बस एक सवाल आये कि अरे इनको सीएम बनाया तो क्यों बनाया?

अब प्रधानमंत्री मोदी के हर काम को मास्टरस्ट्रोक कहनेवाले समर्थक सक्रिय होंगे और वो भांति भांति के तर्कों से समझाएंगे कि ऐसा करना क्यों जरूरी था। जहां तक शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी और शाह का सवाल है तो वह तो कभी बतानेवाले नहीं कि उन्होंने ये किया तो क्यों किया? हां, इतना जरूर हुआ है कि तीनों राज्यों में जीत से भाजपा कार्यकर्ता जितने उत्साहित थे, जैसे जैसे मुख्यमंत्रियों के नाम की घोषणा होती गयी उनका उत्साह ठंडा पड़ता गया। भाजपा का कोई सामान्य कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर दिखावटी खुशी भी नहीं मना पा रहा है। मानों दिसंबर के सर्द मौसम में सबके मन पर घड़ों पानी पड़ गया हो।

फिर भी मोदी ने संसद भवन में खड़े होकर कभी कहा था कि मुझे और कुछ आये न आये राजनीति करना आता है। 2001 से 2023 तक की उनकी राजनीतिक सफलता देखकर इस पर भरोसा भी होता है कि गुजरात के सीएम रहते हुए उन्होंने कैसे देश के पीएम बनने का सफर पूरा किया। सीएम थे तो देश के सबसे पॉपुलर लीडर बने और पीएम बने तो दुनिया के सबसे पॉपुलर लीडर बन गये। उनकी सफलता बताती है कि उन्होंने राजनीति की जो स्क्रिप्ट लिखी उस पर बनी फिल्म सुपर डुपर हिट हुई। फिर कोई उनके निर्णयों पर शंका करे भी तो कैसे?

लेकिन उनकी राजनीतिक सफलता की इस दो दशक की यात्रा में उनके काम करने की शैली हमेशा से चौंकानेवाली ही रही है। वो अपने काम काज और निर्णयों से हमेशा चौंकाते हैं। मोदी के जिन कामों को देखकर जनता चौंकती है, असल में उसे पूरी तैयारी के साथ किया जाता है। उनके निर्णय रातों रात नहीं होते, लेकिन जब सामने आते हैं तो सबको चौंका देते हैं। लेकिन तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के नाम सामने आने के बाद इस संभावना को भी बहुत बल नहीं मिलता कि चुनाव से पहले ही उन्होंने अपने मन में मुख्यमंत्रियों के नाम फाइनल कर लिये होंगे।

मसलन छत्तीसगढ नया राज्य बना तो दिलीप सिंहजूदेव का नाम तय था मुख्यमंत्री बनने के लिए। लेकिन रमन सिंह मुख्यमंत्री बने तो 15 सालों में अपने आपको स्थापित कर लिया। छत्तीसगढ के आदिवासी समाज में जहां न अखबार, टीवी पहुंचता है और न इंटरनेट, वहां भी वो 'चाउरवाले बाबा' के नाम से पहचाने जाते हैं। हालांकि वो खुद एक्सीडेन्टल सीएम थे क्योंकि 2003 में ऐन मौके पर दिलीप सिंहजूदेव भ्रष्टाचार के एक मामले में फंस गये थे और उनकी जगह अटल सरकार में राज्यमंत्री रमन सिंह को सीएम बनाने का निर्णय हुआ। पंद्रह साल सीएम रहते हुए उन्होंने न सिर्फ बीजेपी को जीत दिलाई बल्कि अपनी पहचान भी बनायी। इसके बावजूद उन्हें इस बार सीएम नहीं बनाया गया।

राजनीतिक विश्लेषक समझा रहे हैं कि छत्तीसगढ में आदिवासी मुख्यमंत्री देकर बीजेपी ने आदिवासी बहुल सीटों पर लोकसभा में अपना दावा मजबूत किया है। लेकिन सवाल यह है कि फिर अब तक आदिवासी किस आधार पर भाजपा को वोट देते आये थे? इस बार भी अगर आदिवासी बहुल सीटों पर जीत मिली तो क्या इसलिए कि उन्हें पता था कि चुनाव के बाद उनका अपना सीएम बननेवाला है? यहां एक बात जो कोई विश्लेषक नहीं बतायेगें वह यह कि बहुसंख्यक आदिवासी जाति देखकर वोट नहीं करते। सामाजिक संबंधों में अपने समाज तक बंधे रहनेवाले आदिवासी राजनीति में जातिवाद से लगभग मुक्त समाज है। उनकी ऐसी छवि बनाना उनका अपमान करने जैसा है।

इसी तरह मध्य प्रदेश में मामा शिवराज को सब सीएम मानकर ही चल रहे थे। जिन्हें आशंका भी थी तो नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रह्लाद पटेल या फिर कैलाश विजयवर्गीय के नामों का अनुमान लगा रहे थे। लेकिन छत्तीसगढ के बाद अब चौंकने की बारी मध्य प्रदेश में थी। वहां एक सीएम और दो डिप्टी सीएम का फार्मूला अपनाया गया। जिन मोहन यादव के नाम की घोषणा हुई शायद खुद उन्हें भनक नहीं थी कि वो सीएम बनने जा रहे हैं, इसलिए विधायक दल की बैठक में वो पिछली कुर्सी पर बैठे थे। लेकिन चौंकानेवाले निर्णय तो सबको चौंकाते ही हैं। मोहन यादव को भी चौंकाया। साथ में दो डिप्टी सीएम भी बना दिये गये जिसमें एक दलित और एक ब्राह्मण है।

विश्लेषक समझा रहे हैं कि इस तरह जातीय समीकरण के अनुसार देखें तो मोदी शाह ने मध्य प्रदेश में ओबीसी, दलित और ब्राह्मण तीनों को साध लिया है। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि इसकी जरूरत थी क्या? इस तरह के जातीय विभाजन पर अगर चुनाव हुआ होता तो भला बीजेपी को 48.5 प्रतिशत वोट किस आधार पर मिल गया? चुनाव से पहले इस तरह का जातीय वर्गीकरण तो भाजपा ने किया नहीं था। जिसने भी वोट दिया उसने किसी और कारण से वोट दिया। फिर वह कारण मोदी का नाम हो, शिवराज का काम हो या फिर कमल निशान हो। फिर भी अगर ओबीसी, दलित, ब्राह्मण का फार्मूला ही लागू करना था तो शिवराज के साथ भी दो उपमुख्यमंत्री बनाकर लागू किया जा सकता था। आखिरकार वो भी तो ओबीसी समुदाय से ही आते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ ये समझना बहुत आसान भी है और बहुत कठिन भी।

दो राज्यों में चौंकते चौंकते अब चौंकने की बारी राजस्थान में थी। मध्य प्रदेश की तरह ही राजस्थान में जितने नामों का अनुमान लगाया गया उसमें से कोई सीएम नहीं बना। सीएम बने भजनलाल शर्मा जिनका अपना खुद का कोई पुख्ता पोलिटिकल प्रोफाइल नहीं है। उनके बारे में सबसे ज्यादा गूगल पर सर्च किया गया लेकिन गूगल भी उनके बारे में कुछ खास नहीं बता पा रहा है।

वसुंधरा राजे से मोदी शाह की अनबन पुरानी है। इसलिए इस बात की आशंका तो कई लोगों को थी कि हो सकता है मोदी शाह वसुंधरा को सीएम न बनने दें। परंतु उनके अलावा जिन नामों का अनुमान लगाया जा रहा था, उसमें से किसी को सीएम नहीं चुना गया। अगर मध्य प्रदेश के जातीय तर्क के आधार पर राजस्थान को भी देखें तो राजस्थान में ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष पहले से था। राज्यपाल भी संयोग से ब्राह्मण है। अब ब्राह्मण सीएम भी बन गया। तब सवाल उठता है कि अगर छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में इतना जातीय गणित साधा गया तो राजस्थान में ऐसा क्यों नहीं किया गया? अगर ब्राह्मण मुख्यमंत्री देकर ही राजनीतिक समीकरण साधना था तो उसके लिए राजस्थान से बेहतर जगह मध्य प्रदेश थी।

खैर, विश्लेषक एक बार फिर समझा रहे हैं कि मध्य प्रदेेश में यादव और राजस्थान में ब्राह्मण सीएम देकर पड़ोसी राज्यों को संदेश दिया गया है। ये राजनीतिक विश्लेषकों की अपनी समझ तो हो सकती है लेकिन एक राज्य के चुनाव से किसी दूसरे राज्य को संदेश दिया नहीं जाता। दिया भी जाए तो वह जाता नहीं। हर राज्य की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति अलग होती है और राज्यों के चुनाव उसी राज्य को साधने के लिए ही होते हैं, किसी और राज्य के लिए नहीं। इसलिए ऐसे विश्लेषण भी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने में मदद नहीं कर सकते।

महाराष्ट्र के बाद अब इन तीन राज्यों में भाजपा द्वारा जिन नामों को सीएम के लिए नामित किया गया उन्हें खुद इस बात का भरोसा शायद न रहा हो कि वो सीएम बनने लायक हो गये हैं। लेकिन निर्णय जब चौंकाने के लिए लिये जाते हैं तब सिवाय चौंक जाने के उसका कोई निहितार्थ होता भी नहीं है। तीनों राज्यों में सीएम के नाम सुनकर लोग चौंक गये, यही चौंक जाना ही इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के चयन का सबके पुख्ता आधार जान पड़ता है। हां, ऐसी परिस्थितियों में मोदी समर्थकों के पास पहले से एक जवाब हमेशा तैयार रहता है जो आज भी दिया ही जाएगा। मोदी जी ने किया है तो कुछ सोचकर ही किया होगा, क्या हम राजनीति को मोदीजी से ज्यादा समझते हैं?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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