सरहद के उस पार लोकतांत्रिक बयार नहीं बहती
बांग्लादेश के घटनाक्रम से भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद विसंगतियां खुल कर सामने आ रहीं हैं. सन् 1947 में हुए भारत-विभाजन से फायदा दरअसल किसे हुआ है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है।
इस ऐतिहासिक सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि मोहम्मद अली जिन्ना की जिद के कारण भारतीय मुसलमान न केवल तीन टुकड़ों में बंटे बल्कि वैचारिक दिशाहीनता के शिकार भी हो गए. पाकिस्तान के निर्माण के लिए पंजाब और बंगाल का बंटवारा हुआ था।

सिंध व उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत पूर्ण रूप से पाकिस्तान के हिस्से में गया, बाद में जिन्ना की चालों से बलूचिस्तान भी पाकिस्तान का एक सूबा बन गया। हालांकि सच्चाई यही है कि बलूचियों ने कभी भी पाकिस्तान को अपना मुल्क नहीं माना और अपनी आजादी के लिए आज भी संघर्षरत हैं।
आज भी मोहाजिर ही कहा जाता है...
अपने इलाके में चीन की उपस्थिति इन्हें स्वीकार नहीं है. उर्दू भाषी मुसलमानों के लिए पाकिस्तान में जाकर बस जाने की ख्वाहिशों का अंजाम यही हुआ कि उन्हें आज भी मोहाजिर ही कहा जाता है।
रवींद्रनाथ टैगोर एवं काजी नजरुल इस्लाम स्वीकार्य आदर्श पुरुष
एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान को कामयाब नहीं माना जा सकता. तुलनात्मक रूप से बड़ी आबादी वाला पूर्वी पाकिस्तान मध्य एशियाई जीवन पद्धति को अंगीकृत करने वाले पश्चिमी पाकिस्तान के निवासियों के साथ कभी सहज नहीं रहा. पूर्वी पाकिस्तान के मध्य वर्ग में स्वीकार्य आदर्श पुरुष रवींद्रनाथ टैगोर एवं काजी नजरुल इस्लाम थे. इसलिए उर्दू भाषा के प्रति अपनत्व की भावना का संचार इस प्रांत में नहीं हो सका।
"सिंधु देश" का ख्वाब संजोए हुए हैं...
अल्लामा इकबाल की विशिष्ट पहचान से संबंधित बातें बंगाली मुसलमानों को उत्तेजित तो करतीं थीं, लेकिन उनमें बांग्ला जीवन शैली की निरंतरता के लिए आश्वासन नहीं था.मोहम्मद बिन कासिम ने आठवीं शताब्दी में जिस सिंध को रौंद डाला था, उसके निवासी अपने लिए "सिंधु देश" का ख्वाब संजोए हुए हैं।
पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश में नृशंस अत्याचार किए थे
पाकिस्तान के लिए परमाणु बम बनाने के लिए बेचैन जुल्फिकार अली भुट्टो एक सिंधी ही थे, उनका दुखद हश्र पूरी दुनिया ने देखा. वह नेता भुट्टो ही थे जिन्होंने शेख मुजीब को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद पर आसीन नहीं होने दिया था और पूरे पश्चिमी पाकिस्तान में हड़ताल कराये जाने की धमकी दी थी. लेकिन बंगबंधु शेख मुजीब की किस्मत में तो एक मुल्क का निर्माता बनना लिखा हुआ था. तब वे धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक थे और उनके व्यक्तित्व का यह आयाम सैन्य हुक्मरानों को रास नहीं आ रहा था. पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश में नृशंस अत्याचार किए थे. लेकिन आज के आंदोलनकारी उन घटनाओं को भूल गए हैं।
ढाका में अपनी पार्टी की एक विशाल रैली को संबोधित भी किया
शेख हसीना लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री निर्वाचित हुईं थीं. उनकी पार्टी अवामी लीग प्रगतिशील सोच की हिमायती है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी शेख मुजीब को अपना आदर्श नहीं मानती. जमाते इस्लामी की प्रतिबद्धता कभी लोकतंत्र के प्रति नहीं रही है. तख्तापलट के बाद पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को जेल से रिहा कर दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश ओबैदुल हसन को भी इस्तीफा देना पड़ गया
रिहाई के बाद उन्होंने ढाका में अपनी पार्टी की एक विशाल रैली को संबोधित भी किया. इस दौरान खालिदा जिया ने देश के पुनर्निर्माण के लिए शांति की अपील की. शेख हसीना को जिन परिस्थितियों में अपना मुल्क छोड़ना पड़ा और भारत आने के लिए विवश होना पड़ा, उससेे बांग्लादेशी समाज की नैतिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं. शेख मुजीब की प्रतिमा को खंडित करके उपद्रवी तत्व पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को खुश कर रहे हैं. बांग्लादेश में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ओबैदुल हसन को भी इस्तीफा देना पड़ गया।
मो यूनुस ने अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली
बांग्लादेश के राष्ट्रपति मो शहाबुद्दीन ने संसद को भंग करने की घोषणा कर दी है. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मो यूनुस ने अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सही समय पर चुनाव हो जाए. लेकिन यह उत्सुकता कायम रहेगी कि मौजूदा आंदोलन के दौरान नायक बन कर उभरे हुए छात्र नेता नाहिद इस्लाम, आसिफ महमूद एवं अबू बकर मजूमदार की भूमिका आने वाले वक्त में क्या होगी?
"राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान एक्सप्रेस वे"
अंतरिम सरकार बन जाने के बावजूद ढाका में स्थितियां ठीक नहीं हुईं हैं. देश में शेख मुजीबुर रहमान से जुड़ी पहचान पर भी हमले हो रहे हैं. खबर है कि मुंशीगंज में मदरसे के सैकड़ों छात्रों ने धलेश्वरी टोल प्लाजा पर लगी एक पटि्टका हटा दी, जिस पर "राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान एक्सप्रेस वे" लिखा हुआ था. पाकिस्तान में क्रिकेटर इमरान खान ने जब निजाम बदलने की कोशिश की तो प्रधानमंत्री पद भी छिन गया और वे जेल में भी डाल दिये गये।
सेना अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए नेताओं का इस्तेमाल करना बखूबी जानती है. पाकिस्तान की फौज में पंजाबी समुदाय का दबदबा है जबकि अन्य इलाके के युवा खुद को हाशिए पर देखते हैं. खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत भी उबल रहा है. पश्तो भाषी मुसलमान पाकिस्तान की तुलना में अफ़ग़ानिस्तान को वरीयता देते हैं. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अब्दुल गफ्फार खान मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना के बनाये हुए मुल्क में कभी चैन से नहीं रह सके।
अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद में ही दफनाया गया
उनकी ख्वाहिश के मुताबिक उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद में ही दफनाया गया. औपनिवेशिक शासन द्वारा खींची गयी "डूरंड रेखा" को सरहदी इलाके के लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया. अब अफ़ग़ानिस्तान में गठित होने वाली सरकारों को जनसहयोग नहीं मिलता है. तालिबानीराज की वापसी के बाद वहां से जिस तरह से लोग भागने लगे, उसने भय का माहौल बना दिया है।
अपने निर्माण काल की शुरुआत से ही पाकिस्तान अपनी पहचान को लेकर शंकित रहा है. द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को अमलीजामा पहनाने के लिए "मुस्लिम बहुल देशी रियासत" जम्मू-कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तान आज भी बेचैन है. जम्मू-कश्मीर के पाक अधिकृत हिस्से में लोकतांत्रिक बयार नहीं बहती है. यहां के युवाओं को दहशतगर्दी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. मुजफ्फराबाद, हुंजा, गिलगिट व स्कार्दू में नई पीढी आधुनिक जीवन मूल्यों से दूर है।
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने बांग्लादेश में हुए बगावत की अतार्किक व्याख्या की है. उन्होंने वहां के घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति भारत में होने की आशंका व्यक्त की है. खुर्शीद का वक्तव्य दुर्भावना से प्रेरित है. आजाद भारत में केंद्रीय सत्ता में लगभग सभी प्रमुख दलों को शामिल होने का अवसर मिल चुका है. इस देश में सात सौ पचास से अधिक राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा निबंधित हैं. संविद सरकारों के गठन में क्षेत्रीय राजनीतिक दल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. यहां राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल अपनी मर्जी से बड़े फैसले नहीं कर पाते हैं।
खुर्शीद का बयान गांधी व नेहरू के रोशन ख्याल नेतृत्व का अपमान है
ऐसे में सलमान खुर्शीद का बयान गांधी व नेहरू के रोशन ख्याल नेतृत्व का अपमान है. बांग्लादेश में हिंदु समुदाय के सदस्य खुद पर हो रहे हमलों से आहत है. उन्हें 52 जिलों में कम से कम 205 हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ा है. "बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद" और "बांग्लादेश पूजा उद्जापन परिषद" ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मो यूनुस को एक खुला पत्र लिख कर यह जानकारी दी. दोनों संगठनों ने सरकार से देश में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने की मांग की है।
लगातार दो बार पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली भाजपा तीसरी बार सरकार चलाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर है. भारत में सेना राजनीतिक कार्यपालिका के अधीन है. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान गतिशील है. यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का एक उपकरण है. इसमें समयानुकूल बदलाव होते रहे हैं. समाज के वंचित तबके के लोगों की सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन हो रहा है. अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्यों को संवैधानिक पदों पर आसीन होने का मौका मिलता है।
बांग्लादेश अब शेख मुजीब का मुल्क नहीं रहा
पाकिस्तान व बांग्लादेश में मजहबी उन्माद चरम पर दिखता है, जबकि भारतवासी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा से संचालित होना पसंद करते हैं. बांग्लादेश अब शेख मुजीब का मुल्क नहीं रहा. हिंदुओं पर हो रहे हमले यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सड़कों पर उत्पात मचाने वाले लोग आंदोलनकारी नहीं हैं, बल्कि उपद्रवी तत्व हैं. मकसद अगर प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाना था तो हिंदुओं पर हमलों का तार्किक आधार क्या है, यह स्पष्ट नहीं हुआ है।
(लेखक प्रशान्त कुमार मिश्र स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)












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