AI and Jobs: जारी है रोजगार बनाम तकनीकी की जंग
ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स मानव सभ्यता के सामने रोजगार की नयी चुनौती पेश कर रहे हैं। तकनीकी के बढ़ते प्रयोग में सबसे बड़ा खतरा लोगों के रोजगार पर दिखाई दे रहा है।

AI and Jobs: आजकल जिस तरह से आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, चैटबोट और चैटजीपीटी की खबरों के साथ नौकरियों की छंटनी के समाचार सुनाई देते हैं, वह कभी कभी डरा देते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अपने ही रोजगार की संभावनाओं की मृत्यु की प्रस्तावना मानव खुद ही लिख रहा है। रोजगार बनाम तकनीकी की जंग जारी है। आज के मानव समाज के ज्यादातर शोध मानवीय हस्तक्षेप को कम करने और मशीन और ऑटोमेशन को बढ़ाने पर ही है और हम इसी को विकास बताकर ताली भी पीटते हैं।
उद्योग जगत में इतना तकनीकी बदलाव आने लगा है कि उम्रदराज होते लोगों के लिए नौकरी का विकल्प दुरूह होता जा रहा है। तकनीकी की रणनीति नौकरियों को बढ़ाने में कम, घटाने में ज्यादा इस्तेमाल होने लगी है। ऑटोमेशन या रोबोट ऑपरेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें एकमुश्त पूंजी निवेश जरूर है लेकिन रोबोट को हर महीने सैलेरी नहीं देनी पड़ती। कंपनियों के जो अपने अध्ययन हैं वो बताते हैं कि पांच दस साल में इस ऑटोमेशन से कंपनी की लागत ही नहीं निकलती बल्कि लाभ कई गुना बढ़ जाता है। इसके साथ ही लेबर लॉ और अन्य मानव जनित समस्या और त्रुटि से भी छुटकारा मिलता है और काम भी सफाई से होता है।
कोरोना ने भी कॉरपोरेट जगत का ध्यान लागत कुशलता की तरफ खींचा है। इस कुशलता को प्राप्त करने हेतु कंपनियां परिचालन कुशलता बढ़ाने पर काम कर रही हैं। उनका ज्यादा जोर अब ऑटोमेशन और मानकीकरण पर है। कंपनियां लागत को जितना भी संभव हो सके, उसे स्थायी खर्चों की जगह आय के अनुसार परिवर्तनशील खर्चों में बदल रहीं हैं। इस कारण स्थायी नौकरी की जगह ठेके की नौकरी का प्रचलन बढ़ रहा है। इसमें काम खत्म तो नौकरी खत्म का सिद्धांत चलता है, जो ऐसे अनिश्चित बाजार में कंपनियों के लिए फायदेमंद है।
परिचालन एवं लागत कुशलता का यह "कुशलता" वाला प्रयोग बदलती हुई परिस्थितियों की मांग है। कोरोना में सबने अपने खर्च का पुनर्गठन किया है और लोग खर्च न्यूनतम रखकर व्यवसाय चलाने का अनुभव ले चुके हैं। कोरोना ने कार्य करने की संस्कृति और तरीके दोनों बदल दिए हैं। आज के समय में बाजार का यह "कुशलता" वाला प्रयोग प्रासंगिक और सफल रहा इसी कारण इसकी बड़ी मार अब रोजगार पर पड़ रही है। कोरोना में कंपनियों को यह पता चला कि जो काम 10 लोगों द्वारा किया जा रहा था उसे तो उससे कम लोगों के द्वारा भी किया जा सकता है। डिजिटल मोड का भी प्रयोग इस दौरान खूब बढ़ा। इन दोनों प्रवृत्तियों ने कंपनियों का ध्यान ऑटोमेशन और परिचालन कुशलता के माध्यम से लागत कम करके लाभ बढ़ाने की ओर प्रेरित किया। उन्हें लगने लगा कि अगर कुछ फीसदी वर्कफोर्स में कमी की जाये तो भी व्यापार और लाभ में नुकसान की जगह फायदा ही होगा।
छंटनी में ज्यादातर उम्रदराज लोगों की छंटनी ज्यादा की जाती है क्यूंकि वक्त के साथ इन्क्रीमेंट लगने के कारण उनका वेतन ज्यादा हो जाता है। जबकि बाजार में उसी स्किल के सस्ते विकल्प के रूप में कम उम्र के युवा उपलब्ध रहते हैं। ऐसे में इनकी छंटनी करने पर कंपनियों पर वित्तीय दबाव काफी कम हो जाता है। नौकरियों के लगातार जाने से कई लोग अपने पूर्व से भी कम वेतन पर काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं, दूसरी तरफ पढ़े लिखे नौजवान हर साल बढ़ते रहते हैं जो कम वेतन पर काम करने को तैयार रहते हैं। ऐसे में कंपनियां छंटनी को एक टूल की तरह इस्तेमाल कर वेतन लागत कम कर अपना लाभ बढाती हैं। हालांकि यह खबर उतनी डरावनी नहीं है क्यूंकि नई तकनीक में ही नए रोजगार पैदा होते हैं। फिर भी उनके लिए तो खतरे की घंटी है ही जो उम्रदराज हैं। एक ही तरह के जॉब में सालों बीता चुके हैं और खासकर यंत्रवत जॉब कर रहे हैं। ऑटोमेशन के लिए सबसे पहले यही सेगमेंट मुफीद रहता है। इससे बचने का एक ही उपाय है बदलते वक़्त के साथ अपडेट रहें, निगाह बनाये रखें और हुनरमंद बने रहें।
हालांकि अभी इन छंटनियों की संख्या यूरोप और अमेरिका में अधिक है। इसका कारण विश्व बाजार से एकीकृत होना, वैश्विक मंदी और टेक्नोलॉजी का ज्यादा इस्तेमाल है। मंदी से बचने के लिए भी वहां कंपनियां अब अपना मासिक नगदी खर्च कम करने के लिए छंटनी का इस्तेमाल कर रही हैं। हमें भी इस छंटनी की आहट को हल्के में नहीं लेना चाहिए। भारत में भी ग्लोबल कंपनियों के इंडिया ऑफिस के लोग इसका शिकार हो रहे हैं । कोरोना महामारी के बाद यह आर्थिक महामारी की संभावित दस्तक है। कोरोना की दस्तक फिर तेज हो रही है अगर अभी से रणनीतिक योजना नहीं बनाई गई तो यह समस्या विकराल रूप ले सकती है।
पूर्व में भारत की सनातन और माइक्रो इकॉनमी के पास ऐसे झटके को सहने के शॉक ऑब्जर्वर की व्यवस्था थी लेकिन हम भी बीते सालों में वैश्विक इकॉनमी से एकीकृत हो गये हैं। ऐसे में इस मेटा इकोनॉमिक्स इफ़ेक्ट के छींटे हम पर भी ना आयें इसकी संभावना थोड़ी कठिन है। सरकार को आर्थिक महामारी के इस छंटनी रुपी दस्तक पर तुरंत ध्यान देने की जरुरत है, नहीं तो कुशलता का यह प्रयोग एक बड़ी बेचैनी को जन्म देगा जिसे संभालना मुश्किल होगा। नौकरी से निकाले जाने वाले ज्यादातर लोग अक्सर कच्ची गृहस्थी और पके उम्र वाले होते हैं। कम उम्र और अविवाहित युवा तो इस झटके को कुछ सह ले जाते हैं लेकिन जिनके परिवार हैं, बच्चे हैं पहले से किश्त और खर्चे हैं उनके लिए यह छंटनी वज्रपात समान होती है।
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इसलिए सरकार को इस आहट को तुरंत भांपना होगा इससे पहले कि यह बाजार में बेचैनी लाए। रोजगार प्रदान करने वाले सेक्टर जो माइक्रो इकॉनमी और सनातन इकॉनमी में बिखरे पड़े हैं उस पर काम करना पड़ेगा। यदि मंदी जनित छंटनी आई भी तो रिप्लेसमेंट की व्यवस्था तैयार रहेगी। लोगों को भी अभी से अपने खर्चों और ऋण किश्तों का पुनर्गठन शुरू कर देना चाहिए ताकि यदि कुछ समय रोजगार चला जाए तो भी वह उस स्थिति का सामना कर सकें।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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