Andheri Bypoll: उद्धव के सामने भाजपा की रणनीतिक हार

Ajay Setia

कुछ लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि शिंदे गुट की शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी ने पलटी क्यों मार ली। उद्धव ठाकरे से शिवसेना का नाम और निशान छीनने की मेहनत के बाद आखिर अंधेरी ईस्ट से भाजपा ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला क्यों किया।

Uddhav Thackeray

नाम वापसी के आख़िरी दिन भाजपा ने अपने उम्मीदवार मुरजी पटेल को मैदान से क्यों हटा लिया। पहले तो यह समझ लें कि भारतीय जनता पार्टी और शिंदे गुट ने यह आश्चर्यचकित कर देने वाला फैसला अचानक नहीं किया है। यह सोची समझी पहले से बनाई गई रणनीति के तहत ही हुआ है।

भारतीय जनता पार्टी की पहली रणनीति यह थी कि उद्धव ठाकरे से शिवसेना का नाम और चुनाव निशान धनुष बाण छीना जाए। इस में वे कामयाब रहे।

दूसरी रणनीति यह थी कि शिवसेना के दिवंगत विधायक रमेश लटके की पत्नी रुतुजा लटके वहां से उपचुनाव न लड़ सके, क्योंकि वह चुनाव लड़ेगी तो दो कारणों से उसकी जीत तय थी। एक तो यह सीट मराठी बाहुल्य की है, दूसरे सहानुभूति के चलते उसकी जीत सुनिश्चित थी।

इसलिए भाजपा और शिंदे शिवसेना की कोशिश थी कि ऋतुजा लटके का महानगर पालिका से इस्तीफा मंजूर नहीं हो, तब उद्धव ठाकरे को अपना उम्मीदवार बदलना पड़ेगा। लेकिन ऋतुजा लटके हाईकोर्ट चली गई, जहां उस का इस्तीफा मंजूर करने का निर्देश जारी हो गया।

भाजपा-शिंदे शिवसेना की यह दूसरी रणनीति हाईकोर्ट ने नाकाम कर दी। तब पीछे हटने की तीसरी रणनीति अपनाई गई।

यहाँ यह समझना भी महत्वपूर्ण है अंधेरी ईस्ट सीट पर गुजरातियों की संख्या बहुत कम है। यह इलाका मराठियों और उत्तर भारतीयों का गढ़ है।

ऐसे में अंधेरी सीट पर गुजराती बनाम मराठी के बीच जंग होती तो भाजपा-शिंदे सेना के लिए मुकाबला भारी पड़ जाता। शिवसेना के रमेश लटके यहां से विधायक चुने जाते रहे हैं। इसकी एक वजह यह थी कि वह तीन बार स्थानीय नगरसेवक रहे थे और उनका अपने इलाके में अच्छा जनसंपर्क था।

इसके अलावा दूसरी बड़ी वजह मराठी वोटरों का एकजुट होकर उनके पक्ष में वोटिंग करना रहा था। इसी कारण उद्धव ठाकरे ने रमेश लटके की पत्नी ऋतुजा लटके को उपचुनाव में उतारकर सहानुभूति हासिल करने का दांव चला।

2014 में जब भाजपा शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ी थी तो भाजपा ने मराठी वोटों के सियासी समीकरण को तोड़ने की बड़ी कोशिश की थी। रणनीतिक रूप से उसने इस सीट पर अपने उत्तर भारतीय उम्मीदवार सुनील यादव को चुनाव मैदान में उतारा था, ताकि उत्तर भारतीय और मराठियों को अलग अलग किया जा सके, लेकिन 2014 की मोदी लहर के बावजूद शिवसेना उम्मीदवार रमेश लटके जीते थे। सुनील यादव पांच हजार वोट से हार गए थे।

जब उतर भारतीय नहीं जीत पाया, तो गुजराती मुरजी पटेल के जीतने का तो सवाल ही नहीं था। 2019 में भाजपा-शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ी थी, तब मुरजी पटेल भाजपा में थे और उन्होंने भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था। लेकिन वह साढ़े छह हजार वोटों से हारे थे।

हालांकि निर्दलीय चुनाव लड कर इतने कम अंतर से हार बड़ी हार नहीं है। लेकिन अब रमेश लटके की पत्नी की जीत सुनिश्चित थी, खासकर तब जब कांग्रेस और एनसीपी भी उनके समर्थन में थी। कांग्रेस का भी इस सीट पर 30-35 हजार वोट है। जो पिछले दोनों चुनावों में बरकरार था।

मुरजी पटेल के जीतने की बात तो दूर, वह टक्कर देने की स्थिति में भी नहीं थे। वह टक्कर देने की स्थिति में भी तब आते, जब उद्धव ठाकरे का उम्मीदवार ऋतुजा लटके की बजाए कोई और होता।

इस लिए भाजपा और शिंदे शिवसेना पहले से बनाई रणनीति के तहत परंपरा का बहाना बन कर मैदान से हट गए। जैसे ही ऋतुजा लटके का नामांकन भरना तय हुआ, भाजपा-शिंदे गुट ने राज ठाकरे को सही वक्त पर इस्तेमाल किया। जिन्होंने भाजपा को चिठ्ठी लिख कर उम्मीदवार को मैदान से हटाने का आग्रह किया।

फिर शिंदे गुट के एक विधायक प्रताप सरनाईक का बयान आया और फिर उसके पीछे पीछे शरद पवार का बयान आया। शरद पवार ने भाजपा को याद दिलाया कि 2014 में भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु के बाद एनसीपी ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था, ताकि उनकी बेटी को चुना जा सके। हालांकि कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया था।

मुम्बई महानगर पालिका चुनाव से पहले भाजपा किसी भी हालत में मराठी बनाम गुजराती नहीं बनाना चाहती थी। शरद पवार ने एक तरह से यह बयान देकर भाजपा की मदद ही की।

सत्ता में बदलाव के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था और यह शिवसेना के गढ़ में होने वाला था। अगर भाजपा यह चुनाव हार जाती तो बीएमसी चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर भी इस का असर पड़ता।
बीएमसी चुनावों से पहले भाजपा यह नहीं चाहती कि किसी भी तरह यह संदेश जाए कि एकनाथ शिंदे का सत्ता में आना मुंबई ने स्वीकार नहीं किया है।

इसलिए परंपरा एक बहाना है, इस परंपरा का पिछले साढ़े तीन साल में ही पालन नहीं हुआ था। कोल्हापुर, पंढरपुर और देगलुर-बिलोली के उदाहरण हमारे सामने हैं, इन तीनों सीटों पर उपचुनाव में मृतक विधायक की पत्नी या बेटा चुनाव लड़ रहे थे और भाजपा ने तीनों सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे।

कोल्हापुर में कांग्रेस विधायक चंद्रकांत जाधव के देहांत के बाद कांग्रेस ने उनकी पत्नी को टिकट दिया था, तब भाजपा ने उनके मुकाबले सत्यजीत कदम को टिकट दिया था, जो 18,000 वोटों से हारे थे।

पंढरपुर में अपने विधायक के निधन के बाद एनसीपी ने उनके बेटे भगीरथ भालके को टिकट दिया था। भाजपा के समाधान औताड़े को टिकट दिया, जो 3700 वोटों से चुनाव जीत गए थे।

इसी तरह देगलुर-बिलोली विधानसभा सीट पर अपने विधायक रावसाहेब अंतापुरकर के निधन के बाद कांग्रेस ने उनके बेटे जितेश अंतापुरकर को टिकट दिया, तो भाजपा ने सुभाष सबने को चुनाव मैदान में उतारा था, जो 40,000 वोटों से हारे थे।

ये तीनों उदाहरण मैंने इसी विधानसभा के दिए हैं। इसलिए परंपरा वरंपरा कुछ नहीं। भाजपा व शिंदे गुट शिव सेना ने सोची समझी रणनीति के तहत पीछे हटने का कदम उठाया है, बड़ी जीत के लिए कई बार छोटी हार स्वीकार करनी पडती है।

भाजपा नेता आशीष शेलार के बयान से इसे समझा जा सकता है, उन्होंने कहा, "यह फैसला सोच समझ कर लिया गया है। भाजपा के मुंबई कार्यकर्ता अगले दो-तीन महीनों में होने वाले बीएमसी चुनाव के लिए अपनी ऊर्जा बचाकर रखे...इस ऊर्जा का इस्तेमाल तब किया जाएगा।

बीएमसी पर पिछले 25 सालों से शिवसेना का दबदबा है। 2017 के बीएमसी चुनावों में शिवसेना ने 84 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि भाजपा ने 82 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार शिवसेना में दो-फाड़ के बाद भाजपा को सत्ता अपने हाथ में आने का मौका नजर आ रहा है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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