Anand Mohan Singh: आनंद मोहन की रिहाई, भाजपा कैसे करेगी नुकसान की भरपाई?
आनंद मोहन सिंह की रिहाई से जहां नीतीश क्षत्रिय मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं भाजपा के अगड़े वोटरों में भी सेंध लगा रहे हैं। देखना यह होगा कि इस नुकसान की भरपाई भाजपा कैसे करती है?

आनंद मोहन बिहार में किसी पहचान के मोहताज नहीं है। एक दौर में वह क्षत्रियों के नेता बनने के बाद सवर्णों के नेता बनकर बिहार के मुख्यमंत्री बनने की कगार पर जा पहुंचे थे, लेकिन लालू यादव के जाल में उलझकर बाहुबली नेता से हत्या के अपराधी बन बैठे। ऐसे में नीतीश कुमार ने आनंद मोहन की रिहाई कराकर राजद और भाजपा दोनों पर बढ़त ले ली है। क्षत्रिय वोटरों का बड़ा वर्ग जो भाजपा समर्थक रहा है, वह अब नीतीश कुमार की वाहवाही कर रहा है।
दरअसल, आनंद मोहन की रिहाई से भाजपा के सामने दुविधा की स्थिति है। वह खुलकर ना तो आनंद मोहन की रिहाई का विरोध कर पा रही है, और ना ही समर्थन। भाजपा के लोगों द्वारा नीतीश के पैंतरे की काट के तौर पर आनंद मोहन को माफिया साबित करके उनकी छवि खराब करने की कोशिश जरूर की जा रही है, ताकि सवर्णों का एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ हो जाए, और वोटों का कम से कम बंटवारा हो।
जबकि जी कृष्णैया की हत्या में उकसावे के अलावा आनंद मोहन पर हत्या, अपहरण, लूट, फिरौती जैसा एक भी गंभीर मुकदमा दर्ज नहीं है। आनंद मोहन पर वर्तमान में केवल तीन मुकदमे हैं, जो राजनीतिक एवं पप्पू यादव गिरोह से गोलीबारी के हैं। आनंद मोहन कभी टेंडर माफिया नहीं रहे। जमीनों पर कब्जे जैसे अपराध उनके हिस्से नहीं हैं। फिर भी आनंद मोहन को माफिया घोषित कराने में भाजपा पूरी ऊर्जा खर्च कर रही है।
जमींदार परिवार से आने वाले आनंद मोहन के दादा राम बहादुर सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे तथा उन्हें उत्तर बिहार का गांधी कहा जाता था। आनंद मोहन को भी सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ प्रतिरोध की शिक्षा अपने दादा से मिली। सन 1974 में आनंद मोहन जेपी आंदोलन में उतरे और इमरजेंसी के दौरान दो साल जेल की सजा काटी। 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के एक भाषण के दौरान आनंद मोहन ने उन्हें काले झंडे दिखाये और चर्चा में आ गये। आनंद मोहन इस घटना के बाद राष्ट्रीय मीडिया में छा गये। स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी नेता परमेश्वर कुंवर के सानिध्य में आनंद मोहन ने राजनीति का ककहरा सीखा। आनंद मोहन को यह समझते देर नहीं लगी कि बिहार में राजनीतिक सफलता जातीय समीकरण और बाहुबल से ही मिल सकता है।
1980 के दशक में कोसी-तिरहुत रीजन दबंग यादव माफियाओं से परेशान था। इलाके में गुलाब यादव और पप्पू यादव का आतंक था। आनंद मोहन यादवों के खिलाफ मोर्चा खोलकर लाइम लाइट में आ गये। वह स्वजातीय लोगों की सुरक्षा के लिये पप्पू यादव गिरोह के लोगों से मोर्चा लेने लगे। इन दोनों समूहों के बीच कई बार हिंसक झड़प हुई। लेकिन अपने बाहुबल के दम पर आनंद मोहन उत्तर बिहार के कई जिलों में सवर्णों का सबसे बड़े चेहरा बन गये, क्योंकि उनके अलावा कुछ जातियों की तानाशाही का मुंहतोड़ जवाब कोई और नेता नहीं दे रहा था। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता पूरे बिहार में हो गई।
इसी बीच, 1989 में वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। 1990 में उनके खास लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन गये। आनंद मोहन भी 1990 में पिछड़ी जाति बाहुल्य वाली महिषि सीट से जनता दल से विधायक बन गये। वीपी सिंह ने मंडल कमीशन लागू किया, जिसके बाद पूरे देश में अगड़े और पिछड़ों का संघर्ष शुरू हो गया। इस संघर्ष में सबसे आगे बिहार निकल गया। लालू यादव का जंगलराज, मंडल कमीशन और उस पर पुराने जातीय तनाव ने बिहार को अराजकता की आग में झोंक दिया। लालू के स्वजातीय अपराधियों को शासन और सत्ता का सह मिलने के बाद सवर्ण जातियों से खूनी संघर्ष की घटनाएं और बढ़ गईं।
कोसी और तिरहुत बेल्ट के दबंग यादव और मुसलमानों के खिलाफ क्षत्रियों के रक्षक आनंद मोहन बने तो भूमिहारों में भुटकन शुक्ला, छोटन शुक्ला और मुन्ना शुक्ला जैसे लोग दबंगई का जवाब देने उतरे। सवर्णों के उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं ने अलग-अलग जातियों में बंटे सवर्णों को एकजुट किया। ब्राह्मणों के साथ मधेपुरा में हुई उत्पीड़न की घटना के बाद कांग्रेस नेता रमेश झा के कहने के बाद आनंद मोहन इस वर्ग के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया। धीरे-धीरे क्षत्रियों से बढ़कर वह सवर्णों एवं यादवों के उत्पीड़न से शिकार वर्ग के नेता हो गये।
1995 के विधानसभा चुनाव में तो आनंद मोहन को बिहार के मुख्यमंत्री का चेहरा माना जाने लगा था। 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव में लालू यादव द्वारा पूरी मशीनरी झोंके जाने के बावजूद लवली आनंद ने जनता दल के उम्मीदवार किशोरी सिन्हा को हराकर तहलका मचा दिया था। कुर्मी एवं पिछड़े बाहुल्य सीट से लवली आनंद की जीत बड़ी कहानी कह रही थी। इस हार से लालू यादव बौखला उठे। छोटन शुक्ला की हत्या के बवाल और जी कृष्णैया की हत्या के बाद आनंद को निपटाने का मौका मिल गया।
लेकिन, अब बड़ा सवाल यह है कि डेढ़ दशक से ज्यादा समय जेल में बिता चुके आनंद मोहन की लोकप्रियता कितनी बची है? वह नीतीश को कितना फायदा करा सकते हैं। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में 12 ऐसी सीटें हैं, जहां क्षत्रिय मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करता है। राज्य की 243 विधानसभा सीटों में 57 पर क्षत्रिय मतदाता हार-जीत का फैसला करता है। इस लिहाज से देखें तो यह संख्या किसी भी दल का समीकरण बदल सकती है।
आनंद मोहन के जेल जाने के बाद से क्षत्रियों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक रहा है। जबकि आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद राजद के टिकट पर विधायक हैं। ऐसे में आनंद मोहन अगर लोकसभा चुनाव से पहले जदयू-राजद गठबंधन के पक्ष में खड़े होते हैं तो निश्चित ही भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। नीतीश के पल्ला झाड़ लेने के बाद भाजपा पहले ही बिहार में बैकफुट पर है। बिहार में उसके पास कोई प्रभावी चेहरा नहीं है। ऐसे में पूरे बिहार में भले ही इसका असर ना दिखे, उत्तर बिहार में प्रभाव जरूर दिखेगा।
अपने इलाके के ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं में भी आनंद मोहन की प्रभावी पकड़ रही है। अब यह पकड़ कितनी बची है, आनंद मोहन के फैसले और चुनावी नतीजों से पता चलेंगे, लेकिन भाजपा के लिये आनंद मोहन की रिहाई और उनको मिल रही सहानुभूति नुकसानदेह साबित हो सकती है। देखना यह होगा कि भाजपा आनंद मोहन को माफिया साबित करके ही इस संभावित नुकसान की भरपाई करेगी या इसके आगे भी जाएगी।
आनंद मोहन की रिहाई के बाद अगर नीतीश कुमार सरकार में प्रभुनाथ सिंह और अनंत सिंह की रिहाई हो जाती है निश्चित रूप से भाजपा की चुनौती और बढ़ जाने वाली है। बिहार की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुके 4 प्रतिशत क्षत्रिय मतदाता एक बार फिर चर्चा के केन्द्र में आ जाएंगे जिसके लिए क्षत्रिय नीतीश के साथ चले जाएं तो इसमें क्या आश्चर्य?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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