AI in Elections: मृतक नेताओं को स्टार प्रचारक बना देगी एआई तकनीकी
AI in Elections: अभी एक खबर आई है, जिसमें खुलासा किया गया है कि देश की दो प्रमुख पार्टियॉं आसन्न लोकसभा चुनावों के मद्देनजर एआई तकनीकी का फायदा उठाने जा रही हैं। इसकी मदद से वे अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए पार्टी के कुछ ऐसे मृत नेताओं को जिन्दा करेंगी, जो अपने जीवनकाल में मतदाताओं में काफी लोकप्रिय रहे थे।
इनमें भाजपा भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और कल्याण सिंह आदि के एआई अवतारों के जरिए अपनी उपलब्धियॉं गिनाएगी। वहीं, कांग्रेस महात्मा गॉंधी, नेहरू और सरदार पटेल के अवतारों की मदद से भाजपा के कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ प्रचार अभियान का मुकाबला करेगी।

एआई की मदद से जिन दिवंगत नेताओं को जिन्दा किया जाएगा उनकी आवाज भी वास्तविक नेताओं जैसी ही होगी। यही नहीं, ये यूजर को उसके नाम से संबोधित करने में भी सक्षम होंगे। यह कल्पना सचमुच बहुत रोमांचकारी लगती है कि अब पटेल, गॉंधी या नेहरू निजी तौर पर आपसे बात करेंगे।
लेकिन, इस रोमांच के पीछे जोखिम भी कुछ कम नहीं है। अभी तक, इस तरह के जेनरेटिव एआई रचित किरदारों को फ्लर्टिंग, रोमांस या दोस्ताना गपशप के लिए ही इस्तेमाल किए जाने का ट्रेंड रहा है। जैसे कि रेप्लिका का इस्तेमाल कर काल्पनिक पार्टनर से रोमांस करना, कैरेक्टर एआई जैसे टूल्स पर प्रसिद्ध हस्तियों (आभासी अवतार) से बातचीत का आनंद लेना, एलेक्सा या सीरी सरीखे एआई असिस्टेंट्स के साथ परासामाजिक रिश्ते विकसित कर लेना। जब तक बात यहॉं तक सीमित थी, यह इतना असामान्य या आशंकित करने वाला नहीं लगता था।
लेकिन, एक मृतक के साथ बातचीत कई पहलुओं पर विचार के लिए विवश करती है। अगर हम इस चलन के नैतिक पक्ष की ही बात करें, तो सबसे पहला प्रश्न यही सामने आता है कि मृत व्यक्ति ने जीवित रहते हुए, एआई के माध्यम से अपने व्यक्तित्व के पुनर्सृजन के लिए अनुमति या सहमति नहीं दी थी। ऐसे में उसका एआई चित्रण, आभासी होने के साथ-साथ भ्रामक और असत्य भी हो सकता है और उसकी मूल छवि को प्रभावित करने वाला भी।
मृत राजनीतिज्ञों के अवतारों का राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल तो और भी चिंताजनक है। हो सकता है कि मतदाताओं को लुभाने के लिए एक दिवंगत नेता के जरिए जो बात कही जा रही हो, वह अपने जीवनकाल में उससे इत्तेफाक न रखता हो। ऐसे में यह कौन तय करेगा कि उसके मन में क्या चल रहा था? एक सवाल यह भी उठता है कि किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान और व्यक्तित्व का, जो अब जीवित नहीं है और अपने डिजिटल पुनर्जन्म के लिए सहमति देने में असमर्थ है, राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करना क्या एक मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व से छेड़छाड़ नहीं होगा?
हालांकि, यह तर्क भी दिया जा सकता है कि एक सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके सार्वजनिक व्यक्तित्व को लेकर गोपनीयता या निजता पर नियंत्रण की गुंजाइश कम ही होती है। हालाँकि यह अभी भी नैतिक रूप से बहस का विषय है कि जब एक व्यक्ति जीवित ही नहीं है तो सार्वजनिक जीवन की शर्तें उस पर कैसे लागू हो सकती हैं।
अभी हाल में ही जर्मनी के बर्लिन की सिरीन मालास ने एआई टूल का उपयोग करके छह साल पहले दिवंगत हो चुकी अपनी मॉं से बात की। उसने अपने उस मलाल को दूर किया, जो मॉं के आखिरी वक्त में उनसे बात न कर पाने की वजह से छह वर्ष से मालास के दिल में घर किए हुए था।
यह खबर जब सार्वजनिक हुई तो पता चला कि यह सुविधा उपलब्ध कराने वाला प्रोजेक्ट दिसंबर नाम का यह एआई टूल, ओपेन एआई का प्रोडक्ट है। मालास से पहले भी, करीब तीन हजार यूजर्स इस टूल के जरिये अपनों से बात कर चुके हैं।
इस अनूठी सहूलियत को हासिल करने के लिए यूजर को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता। बस दस डॉलर की फीस के साथ एक फॉर्म भरना होता है, जिसमें मृत व्यक्ति की उम्र, यूजर से रिश्ता, उसके व्यवहार व उससे संबंधित कुछ अनुभवों आदि के बारे में जानकारी देनी होती है। प्राप्त विवरण के आधार पर यह टूल मृत व्यक्ति का एक आभासी अवतार सृजित कर देता है, जो यूजर से वैसे ही बात करने में सक्षम होता है, जैसे कि वह व्यक्ति जीवित अवस्था में कर सकता था।
करीब एक हजार रुपए के खर्च में कोई अपने मृत परिजन से बात कर रहा है। देखने में साधारण सी लगने वाली इस बात से बहुत सारे नैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक प्रश्न जुड़े हैं। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवर इसे सही नहीं मानते कि कोई व्यक्ति अपनों से बिछुड़ने के दु:ख को मिटाने के लिए इस तरह के आभासी अवतारों के साथ अपने आप को धोखे में रखे। उनका कहना है कि यह संभावित रूप से शोक संतप्त व्यक्तियों को उस व्यक्ति के साथ नकली बातचीत करने की अनुमति देकर कुछ हद तक ही राहत प्रदान कर सकता है। अंतत: उसे वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा कि उसने एक अपने को हमेशा के लिए खो दिया है।
तकनीकी भाषा में इस तरह के चैट बॉट्स को डेड बॉट्स या घोस्ट बॉट्स कहते हैं। ये इतने वास्तविक लगते हैं कि यूजर का दिमाग इन्हें ही सच मानने लगता है और इनका एडिक्ट हो जाता है। ऐसे में पूरा खतरा है कि अवतारों के सहारे वास्तविकता को लंबे समय तक झुठलाते जाने की यह आदत उसे डिप्रेशन या पागलपन की स्थिति में ला खड़ा करे। इसके अलावा किसी इंसान के व्यक्तित्व, यादों और भावनात्मक बंधन की गहराई व जटिलता की नकल करने में एआई तमाम प्रगति के बावजूद, अभी भी बहुत सीमित है।
लेकिन एआई प्रौद्योगिकी जितनी उन्नत और शक्तिशाली होती जा रही है, उसमें आभासी अवतारों को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। हो सकता है कि कल यूजर के लिए आभासी अवतार इतना जीवंत हो जाए कि वह उसे वास्तविक व्यक्ति से अलग ही न कर पाए। ऐसे में बहुत से लोग एआई चरित्रों के साथ गहरे भावनात्मक संबंध विकसित करते-करते वास्तविक मानवीय संबंध बनाने की अपनी क्षमता ही खो देंगे।
इसीलिए मनोश्चिकित्सक वास्तविकता को कल्पना से अलग करने और दु:ख को दूर करने के विकल्प के रूप में एआई संस्करणों पर अत्यधिक निर्भरता से बचने की सलाह देते हैं। इन सभी पहलुओं के ध्यान में रखते हुए हमें खुद ही तय करना होगा कि हमारे लिए क्या बेहतर है, किसी अपने के खो जाने के बाद अपनी यादों में उसे जीवित रखना या फिर एक भ्रम का संसार रचकर खुद ही उसमें डूब जाना।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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