AI and Environment: धरती पर जल संकट बढ़ा रहा है आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स
AI and Environment: जब हम पानी की खपत को नापने वाले वाटर फुटप्रिंट या वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कार्बन उत्सर्जन की बात करते हैं तो कृषि, फैशन, एनर्जी, ऑटोमोबाइल, मीट, फूड एंड बेवरेज, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग जैसे कई उद्योग हमें खलनायक की भूमिका निभाते नजर आते हैं। लेकिन, अब इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी जोड़ लीजिए।
एआई की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए, आए दिन नए-नए एआई प्रोग्राम लॉन्च हो रहे हैं। इस समय चैटजीपीटी, बार्ड, लामडा, जुरासिक-1 जम्बो, इन्स्ट्रक्टजीपीटी, ब्लूम जैसे एक दर्जन से अधिक बड़े लैंग्वेज लर्निंग मॉडल (एलएलएम), जेनेरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क (जीएएन) और डीप लर्निंग मॉडल एआई समेत करीब पॉंच हजार जेनेरेटिव एआई एप्लिकेशन और फीचर उपलब्ध हैं। करोड़ों की संख्या में यूजर इनकी क्षमताओं का भरपूर लाभ भी उठा रहे हैं। लेकिन, इनमें बहुत कम ऐसे होंगे, जिन्हें उस कीमत का अंदाजा होगा, जो एआई के इस असीमित इस्तेमाल के लिए पृथ्वी और पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है।

पर्यावरण पर पड़ रहे जेनेरेटिव एआई के प्रभाव पर शोध कर रहे, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड में असिस्टेंट प्रोफेसर, शाओली रेन और उनकी टीम ने हाल ही में प्रकाशित अपने पेपर में अनुमान लगाया है कि जब आप चैट जीपीटी से कुछ जानने के लिए 5 से 50 प्रॉम्प्ट (यह संख्या आपकी लोकेशन और मौसम के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है) देते हैं तो उसे इनका जवाब देने में आधा लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। आपको यह मात्रा बहुत कम लग रही होगी। लेकिन, अब इसे चैट जीपीटी के दस करोड़ एक्टिव यूजरों को ध्यान में रखकर देखिए। आपको पता लग जाएगा कि हम कितने बड़े खतरे की ओर बढ़ रहे हैं।
चैट-जीपीटी को विकसित करने वाली ओपेन-एआई में भारी राशि निवेश करने वाली माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी नई पर्यावरण रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि 2021-2022 के दौरान उसकी वैश्विक जल खपत 34% बढ़ गई है। यह करीब 1.7 अरब गैलन है। जो पिछले वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा है। इसकी वजह एआई के विकास से जुड़े शोधकार्य हैं। सोचिए, यह सिर्फ अकेले चैट-जीपीटी की स्थिति है। इसमें उसके दूसरे समकक्षों को भी शामिल करके सोचें तो स्थिति कल्पना ने कहीं अधिक भयावह है।
सवाल यह है कि एआई तो एक मॉडल है आखिर उसे पानी की क्या जरूरत है? दरअसल, एआई मॉडलों को डेटा सेंटरों से पॉवर मिलती है। क्योंकि उन्हें अधिक से अधिक सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षण की जरूरत होती है और उनके प्रशिक्षण के लिए डेटा के विशाल भंडार की। डेटा आधारित प्रशिक्षण की यह प्रक्रिया काफी गर्मी पैदा करती है। इन डेटा सेंटरों के सर्वरों को ज्यादा गर्म होने से बचाने के लिए वाटर बेस्ड कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पानी की काफी खपत होती है।
एआई की यह बढ़ती प्यास, गंभीर चिंता का विषय है। एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि जीपीटी-3 जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल के प्रशिक्षण में सात लाख लीटर तक पानी की खपत हो सकती है। यह मात्रा 370 बीएमडब्ल्यू कारों के उत्पादन में खपने वाले पानी के बराबर है। एआई के क्षेत्र में पानी की ज्यादा खपत का एक अप्रत्यक्ष कारण वह विद्युत आपूर्ति भी है, जो डेटा सेंटरों को चलाती है। यह विद्युत कोयला, गैस, परमाणु ऊर्जा जैसे स्रोतों से प्राप्त होती है और इसके उत्पादन के लिए भी पानी की आवश्यकता पड़ती है।
अक्सर हम ऐसी खबरें पढ़ते हैं, जिनमें एआई की मदद से जल संकट के समाधान तलाशने के उद्धरण प्रस्तुत किए जाते हैं। जैसे कि पानी की मांग का अनुमान लगाने और वितरण प्रणालियों में सुधार लाने के लिए, पानी के ट्रीटमेंट की नई प्रौद्योगिकियां विकसित करने और पानी के पाइपों में लीक का पता लगाने व उसकी मरम्मत जैसे कामों में एआई का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ स्थानों पर एआई का उपयोग अधिक कुशल सिंचाई प्रणाली विकसित करने के लिए किया जा रहा है जो फसलों के लिए अधिक सुचारू रूप से पानी सुनिश्चित कर, पानी की खपत को कम कर सकती है।
एआई के पैरोकार, उसके बचाव के लिए ऐसे उदाहरण पेश कर सकते हैं। लेकिन, क्या इनके माध्यम से बचाए जा रहे पानी और एआई इंडस्ट्री द्वारा गटके जा रहे पानी की मात्रा के बीच कोई तुलनात्मक अध्ययन किया गया है, जो यह बताने में सक्षम हो कि कहीं हम एक रुपये की सुरक्षा के लिए दस रुपए तो नहीं खर्च कर रहे। आंकड़ों की बाजीगरी से यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि एआई के लिए निवेश किए गए पानी का रिटर्न उससे कई गुना ज्यादा है। लेकिन, इसके दूसरे पर्यावरणीय नुकसान भी कुछ कम नहीं हैं।
आंकड़े बताते हैं कि सर्वाधिक लोकप्रिय लैंग्वेज मॉडलों में से एक जीपीटी-3 के प्रशिक्षण में 552 मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन हुआ, जितना एक यात्री वाहन को बीस लाख किलोमीटर से अधिक चलाने के बाद उत्पन्न होता है। एआई प्रशिक्षण और उपयोग, दोनों के लिए ही बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि 2025 तक दुनिया की बीस फीसदी बिजली की खपत आईटी इंडस्ट्री में होगी, जिसकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 5.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी होगी।
चैटबॉट्स की अत्यधिक क्षमताओं और फास्ट इनपुट प्रोसेसिंग के लिए तो भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है, असंख्य उपयोगकर्ता भी इसके लिए काफी जिम्मेदार हैं, जो न तो अपने एआई उपभोग की कीमत जानते हैं और न ही सही प्रॉम्प्ट। इस वजह से किसी भी जिज्ञासा के लिए वे गैरजरूरी निर्देश व संदेश डालते जाते हैं। इससे उनका एआई इस्तेमाल करने का समय बढ़ता है और दोनों स्तर पर बिजली की खपत भी। सेमीकंडक्टर रिसर्च एंड कंसल्टेंसी कंपनी सेमीएनेलेसिस ने चैटजीपीटी का एक लागत मॉडल बनाया। कंपनी का दावा है कि चैटजीपीटी को रोजाना मिलने वाले लाखों संकेतों का जवाब देने के लिए ओपनएआई 3,617 एचजीएक्स ए100 सर्वर चलाता है। प्रत्येक सर्वर को चलाने में 3,000 वाट प्रति घंटे बिजली खर्च होती है। इस प्रकार, इन 3,617 यूनिटों को चौबीसों घंटे चलाने के लिए, उन्हें हर साल 95,054,760,000 वाट-घंटे या 95,054.76 मेगावाट-घंटे की आवश्यकता होती है।
बिजली की यह खपत, उस वैयक्तिक खपत से अलग है, जो अंतिम उपभोक्ता एआई का उपयोग करते हुए अपनी कम्प्यूटर डिवाइसों या मोबाइल को चलाने में करता है। बिजली की ज्यादा जरूरत होगी तो उत्पादन भी ज्यादा करना पड़ेगा, जिससे पानी की खपत और कार्बन का उत्सर्जन दोनों ही बढ़ेंगे। साथ ही घंटों तक चलने वाली ये डिवाइसें गर्मी उत्पन्न कर ग्लोबल वार्मिंग में भी इजाफा करेंगी।
पर्यावरण के लिए एक और बड़ा खतरा, एआई-संचालित कृषि है, क्योंकि इसमें ईकोलॉजी की सेहत से ज्यादा अधिक उपज को प्राथमिकता दी जाती है। एग्रो-एआई, जाने-अनजाने में अपारंपरिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के चक्कर में मिट्टी की उत्पादकता और भूजल स्तर को घटाने वाली कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित कर सकता है। यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि वर्ष 2032 तक इसके 10.02 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया है।
कोई भी टेक्नोलॉजी जब अपना प्रभाव बढ़ा रही होती है तो उसकी गति को थामना लगभग नामुमकिन होता है और उसके साथ आने वाले खतरों से बच पाना भी। उसका प्रसार तभी रुकता है, जब उससे ज्यादा शक्तिशाली कोई और प्रौद्योगिकी सामने आ जाए। लेकिन, नई टेक्नोलॉजी अपने साथ नए खतरे भी लेकर आती है। इसलिए, अपनी और अपनी धरती की सुरक्षा हमें खुद ही करनी होगी।
डेवलपरों, नियामक निकायों और अंतिम उपयोगकर्ता, सभी की यह साझा जिम्मेदारी है कि एआई को अपनाते और बढ़ाते समय उन जोखिमों के बारे में भी सोचें, जो इसके अमर्यादित उपयोग से जुड़े हैं। वर्ना, जिस एआई को आज हमारे लिए एक वरदान के तौर पर पेश किया जा रहा है, उसे अभिशाप में बदलने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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