Abu Dhabi Mandir: अरब जगत की असाधारण घटना है यूएई में मंदिर निर्माण
Abu Dhabi Mandir: यह कोई सामान्य घटना नहीं है कि अरब भूमि के एक हिस्से आबू धाबी में इतने विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण हो जाए जिसमें मूर्तिपूजा होती हो। यह असाधारण घटना है दुनिया के लिए भी और अरब जगत के लिए भी।
अरब की भूमि से मूर्तिपूजा सदियों पहले समाप्त हो गयी थी जब वहां इस्लाम का उदय हुआ। इतिहास में तो ठीक ठीक इसका उल्लेख नहीं मिलता कि छठी शताब्दी में वास्तविक रूप से मक्का में क्या हुआ था लेकिन इस्लामिक किताबें इस बारे में खुलकर बताती हैं।

इस्लामिक किताबों में इस्लाम की बुनियाद ही यही बतायी गयी कि उनके पैगंबर ने मक्का में 360 बुतों (मूर्तियों) को तोड़कर इस्लाम की नींव डाली थी। इस्लामिक किताबों के अनुसार पैगंबर ने एक अल्लाह की उपासना का संदेश दिया था जिसे मुसलमान बिना किसी शक शुबहा के मानता है।
अगर हम इस्लामिक किताबों के हवाले को ही इतिहास मान लें तो 1450 साल बाद इतने भव्य तरीके से अरब की धरती पर मूर्तियों या बुतों की फिर से वापसी हुई है। 14 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में श्रीस्वामीनारायण मंदिर, आबूधाबी का लोकार्पण एक ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसे भारतीय उपहाद्वीप के मुसलमान ही शायद स्वीकार नहीं कर पायेंगे। इस्लाम को लेकर उनकी बुनियादी समझ यही है कि इस्लाम में मूर्तिपूजा नहीं होती। अरब की धरती से यही संदेश पूरी दुनिया में फैलाया गया लेकिन अब उसी अरब के एक हिस्से यूएई के आबूधाबी में मूर्तियों से भरा मंदिर बनकर तैयार हो गया है।
1450 साल पहले अरब के लोग भी मूर्तिपूजक ही थे। हर कबीले का अपना देवी या देवता होता था और देवी देवताओं को जहां रखा जाता था उसे काबा कहते थे। काबा एक प्रकार से मंदिर का ही रूप हुआ करता था। वहीं पर लोग अपनी अपनी आस्था का पत्थर रखकर पूजा पाठ या बलि आदि देते थे। एक दूसरे की आस्था को लेकर कोई टकराव नहीं था। लेकिन इस्लाम के उदय के बाद हर प्रकार के बुत तोड़ दिये गये और एक अल्लाह की इबादत को ही सही बताया गया। मक्का स्थित काबा में सिर्फ हजर ए असवद नामक पत्थर को छोड़कर बाकी सारे पत्थर हटा दिये गए। यह इस्लामिक इतिहास है।
उसके बाद अरब में फिर कभी किसी और देवता का जन्म नहीं हुआ। प्राचीन अरब के हुब्बल, अल उज्जा, लात और मनात नामक देवी देवता सिर्फ अतीत का ही हिस्सा बनकर रह गये। सिर्फ मुसलमानों के लिए ही मूर्तिपूजा खत्म नहीं हुई, अरब की धरती पर ही मूर्तिपूजा नहीं होगी, ये एक सामान्य मिथक स्थापित हो गया था। लेकिन इस मिथक को तोड़ने का काम शुरू हुआ जब 1971 में शारजाह, दुबई और आबूधाबी सहित 7 रियासतों ने मिलकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) बनाने का फैसला किया। ब्रिटिश स्वतंत्रता के साथ ही उन्होंने जो संयुक्त अमीरात बनायी उसमें तय किया कि उनके इस अमीरात का कोई स्टेट रिलीजन नहीं होगा।
उस समय यह फैसला बहुत बड़ा फैसला था। अरब की रियासतें एक संयुक्त राज्य की स्थापना करें और इस्लाम को स्टेट रिलीजन न घोषित करें तो यह भी कोई सामान्य घटना नहीं थी। लेकिन यूएई में शामिल रियासतों को पता था कि दुनिया बदल रही है और अब पुरानी मान्यताओं के साथ भविष्य में नहीं जाया जा सकता। इसलिए उन्होंने धर्म और आस्था के मामले में स्टेट के दखल को ही खत्म कर दिया। वहां जो रहते हैं वो जिस धर्म को मानना चाहें माने। हां, उनकी अपनी अरब संस्कृति को इससे नुकसान न पहुंचे इसका उन्होंने पूरा इंतजाम किया।
दुबई और शारजाह पहले से प्रवासी भारतीयों के लिए खुले थे इसलिए सबसे पहला प्रभाव वहीं दिखा। दुबई में एक प्राचीन शिव मंदिर था जो आज भी मौजूद है। दुबई में ही अभी एक साल पहले एक और मंदिर बनकर तैयार हुआ है। इसके साथ ही दुबई में गुरुद्वारे और चर्च के लिए भी जगह दी गयी ताकि वो अपने अपने पूजाघर बना सके। 2016 में एक सहिष्णुता मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ टॉलरेन्स) बनाया गया ताकि यूएई के लोगों में दूसरे धर्म और मान्यताओं के प्रति सहिष्णुता विकसित की जा सके। वर्तमान में इसके मंत्री शेख नहयान बिन मुबारक हैं जो यूएई के फाउण्डर शेख जायेद के खानदान से ताल्लुक रखते हैं।
इन्हीं शेख नहयान के प्रयासों का परिणाम है कि आबूधाबी में स्वामीनारायण मंदिर को पहले 2.5 एकड़, फिर 5 एकड़ और अंत में 13.5 एकड़ जमीन दी गयी ताकि वो वहां पर मंदिर बना सकें। लेकिन यूएई की धरती पर मंदिर का निर्माण मात्र जमीन आवंटन का मसला नहीं था। उसके पहले उन्हें अपने दिलों में यह जगह देनी थी कि कोई दूसरा अगर उनके अल्लाह के अलावा किसी और भगवान की पूजा करना चाहता है, तो वह कर सकता है। यह जगह मिली तो यूएई में मस्जिद के साथ ही मंदिर, चर्च और गुरुद्वारा सबके लिए जगह आवंटित कर दी गयी।
यूएई के बाद अब बहरीन भी इसी रास्ते पर है। बहरीन ने भी स्वामीनारायण संप्रदाय को मंदिर बनाने के लिए जगह प्रदान कर दी है और जल्द ही अरब जगत में स्वामीनारायण का दूसरा मंदिर बनना शुरु होगा। दूसरी ओर सऊदी अरब ने अभी तक दूसरे धर्म के पूजास्थलों के लिए अपने दरवाजे तो नहीं खोले हैं लेकिन जिस तरह के सामाजिक सुधार वहां हो रहे हैं उसे देखकर लगता है कि निकट भविष्य में सऊदी अरब के दरवाजे भी मंदिर, चर्च और गुरुद्वारे के लिए खुलेंगे। अभी भी सऊदी अरब में अपना धर्म मानने की मनाही तो नहीं है लेकिन ऐसा सिर्फ आप अपने घर के भीतर कर सकते हैं। वहां न तो सार्वजनिक मंदिर बन सकता है और न ही चर्च।
लेकिन आज यूएई जिस बात को समझ रहा है उसी दिशा में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी आगे बढ़ना चाहते हैं। उन लोगों को लगता है कि तेल संपदा खत्म होने से पहले अपने आप को वैश्विक स्तर पर एक उदार, सहिष्णु और आधुनिक समाज के रूप में प्रस्तुत करना है ताकि लोगों की आवाजाही और पूंजी निवेश से भविष्य में भी उनकी संपन्नता बरकरार रह सके।
इसके लिए वो अपने उन शासकीय नियमों में सुधार कर रहे हैं जिन पर इस्लाम की गहरी छाप है। वो इसे सिर्फ मुस्लिमों तक सीमित रखना चाहते हैं वह भी बहुत लचीले रूप में। इसलिए सऊदी अरब ने कम उम्र के बच्चों को मस्जिद मदरसों से दूर करके उन्हें आधुनिक स्कूलों का रास्ता दिखाना शुरु किया है।
आबूधाबी में भव्य मंदिर का निर्माण जितना हिन्दू गौरव की बात है उससे अधिक इस्लामिक टॉलरेन्स की बात है जिसकी शुरुआत अरब से ही हो रही है। देर सबेर इसका असर पूरी दुनिया के मुसलमानों पर होगा और उन तक यह संदेश जाएगा कि सहअस्तित्व और बहुदेववाद से ही धरती पर सद्भाव भरा जीवन संभव है। किसी भी प्रकार का एकमतवाद धरती पर सभ्यताओं के बीच सिर्फ दुश्मनी और टकराव ही पैदा करेगा। भविष्य की वह दुनिया जहां साइंस भी एक रिलीजन के तौर पर स्थापित हो जाएगा, उसमें किस्से कहानियों पर आधारित एकमतवाद के लिए वैसे भी कोई जगह नहीं रह जाएगी।
बहुदेववादी सहअस्तित्व की जो शुरुआत आबूधाबी से हुई है वह अब रुकेगी नहीं। इसीलिए आबूधाबी में स्वामीनारायण मंदिर के सामने एक डिवाईन आई बनायी गयी है। मंदिर में प्रवेश से पहले उस डिवाइन आई से मंदिर का दर्शन करना होगा जिसकी दीवारों पर अलग अलग भाषाओं में सिर्फ एक ही वाक्य लिखा है: सद्भाव।
सब जीवों के प्रति यही सद्भाव सनातन हिन्दू धर्म का मूल संदेश है जो आबूधाबी के स्वामीनारायण मंदिर से समस्त संसार में प्रसारित होगा। इस सद्भाव का जन्म सहिष्णुता या टॉलरेन्स से ही संभव है, जिसके लिए अलग मंत्रालय बनाकर यूएई अपनी पहल कर चुका है। अब बाकी इस्लामिक देशों को देर सबेर इस दिशा में ही आगे बढ़ना है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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