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जब पीएम रहते राजीव गांधी ने की थी अटल जी की गुप्त मदद

By अशोक कुमार शर्मा
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नई दिल्ली, 10 मई। मौजूदा दौर की राजनीति में बहुत गिरावट आयी है। विरोधी दल के नेता आज ऐसे लड़ते हैं जैसे कि जानी दुश्मन हों। एक दूसरे के खिलाफ अपशब्दों से भी गुरेज नहीं करते। लेकिन भारत की राजनीति पहले ऐसी नहीं थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियंत्रण और संतुलन के लिए 'विरोध' का होना जरूरी है। विरोध पहले भी था। लेकिन आज की तरह जहरबुझा नहीं था। विरोध नीतियों तक सीमित था।

when Former Prime Minister Rajiv Gandhi helped to Atal Bihari Vajpayee secretly

व्यक्ति के स्तर पर विरोधी दलों के नेता एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। एक दूसरे की तकलीफों के लिए फिक्रमंद भी होते थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बाजपेयी ने 1991 में कहा था, "अगर आज में जिंदा हूं तो राजीव गांधी की वजह से।" इस बात से समझा जा सकता है कि उस समय का राजनीतिक परिदृश्य कैसा था। पहले राजनीतिक विरोध होने के बाबजूद नेता एक दूसरे की मदद करते थे और उसका ढिंढोरा भी नहीं पिटते थे। मदद इस तरह की कि सामने वाले का आत्मसम्मान भी बना रहे। राजीव गांधी ने जिस शालिनता के साथ अटल बिहारी वाजपेयी की मदद की थी उसकी मिसाल मुश्किल है।

हार-जीत से क्या रिश्ते बिगड़ जाएंगे ?

हार-जीत से क्या रिश्ते बिगड़ जाएंगे ?

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐसी आंधी चली थी कि विरोधी दल के बड़े बड़े बरगद उखड़ गये थे। दो साल पहले ही भाजपा नयी नयी-पार्टी बनी थी। जनसंघ के दिग्गज नेता रहे अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के सबसे लोकप्रिय नेताओं में एक थे 1984 के चुनाव में वे ग्वालियर से किस्मत आजमाना चाहते ते। 1977 और 1980 का चुनाव उन्होंने नई दिल्ली से जीती था। चुनाव से कुछ दिन पहले संसद के गलियारे में अटल जी की मुलाकात माधवराव सिंधिया से हुई। दोनों में पुराना परिचय था। अटल जी हास-परिहास वाले नेता थे। उन्होंने माधव राव सिंधिया से मुसकुराते हुए पूछ लिया, आप इस बार ग्वालियर से तो चुनाव वहीं लड़ रहे ? माधव राव ने भी मंद मुस्कान के साथ इंकार में सिर हिला दिया। वे मध्य प्रदेश के गुना से सांसद चुने जाते थे। अटल जी ने इत्मिनान हो कर ग्वालियर से पर्चा दाखिल कर दिया। नामजदगी के आखिरी लम्हों में कांग्रेस ने रणनीति के तहत अचानक माधवराव सिंधिया को ग्वालियर से मैदान में उतार दिया। स्थिति ऐसी हो गयी कि अटल जी किसी और चुनाव क्षेत्र से नामांकन नहीं कर सकते थे। चुनाव हुआ। इंदिरा गांधी की सहानुभूति लहर में चुनाव एकतरफा हो गया। माधवराव ने अटल जी को करीब एक लाख 75 हजार वोटों से हरा दिया। अटल जी चुनाव हार गये। इस चुनाव में भाजपा के सिर्फ दो सांसद ही जीते थे। एक गुजरात से और दूसरे आंध्र प्रदेश से।

राजीव गांधी ने इस तरह की अटल जी की मदद

राजीव गांधी ने इस तरह की अटल जी की मदद

कांग्रेस की रणनीति के कारण अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गये। लेकिन इस हार का अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निजी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा। लोकसभा चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी किड़नी संबंधी बीमारी से परेशान रहने लगे। उनकी जो बीमारी थी उस भारत में उसका सटीक इलाज संभव न था। डॉक्टरों ने अमेरिका जा कर इलाज कराने की सलाह दी थी। उस समय अटल जी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अमेरिका जा कर अपना इलाज करवा सकें। किसी तरह प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ये बात मालूम हो गयी। उन्होंने एक दिन अटल बिहारी वाजपेयी को औपचारिक मुलाकात के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय आने के निमंत्रण दिया। वाजपेयी जी गये। वाजपेयी जी से राजीव गांधी ने कहा, सरकार ने तय किया है कि आपके नेतृत्व में भारत का एक प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र भेजा जाय। आपके अनुभवों का फायदा उठना चाहती है सरकार। इस सरकारी दौरे में आप अमेरिका में अपनी बीमारी का इलाज भी करा सकते हैं। इस तरह वाजपेयी जी अमेरिका गये। वहां उन्होंने अपनी बीमारी का इलाज कराया जिससे उनकी जान बच सकी। राजीव गांधी ने कभी किसी दूसरे से इस मदद की चर्चा नहीं की। सब लोगों ने यही समझा कि अटल जी जैसे बड़े नेता और प्रखर वक्ता को उनकी योग्यता के आधार पर संयुक्त राष्ट्र भेजा गया है। अटल जी भारत के वे पहले नेता थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दे कर देश का गौरव बढ़ाया था।

राजीव गांधी कभी इस बात का जिक्र नहीं किया

राजीव गांधी कभी इस बात का जिक्र नहीं किया

राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी विपक्षी दल के नेता थे। भाजपा और कांग्रेस के बीच विरोध के कई मुद्दे थे। राजीव गांधी चाहते तो भाजपा को नीचा दिखाने के लिए वाजपेयी जी को मदद करने की बात सार्वजनिक कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी की जब तबीयत ठीक हो गयी तो उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिख कर राजीव गांधी को इस शिष्टता के लिए आभार जताया था। ये राज शायद राज ही रह जाता। लेकिन 1991 में राजीव गांधी की अचानक हत्या ने अटल बिहारी वाजपेयी को विचलित कर दिया। वे इतने भावविह्वल हो गये कि उन्होंने राजीव गांधी की उदारता और विशिष्टता को बताने के लिए ये किस्सा बयां कर दिया। राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी परस्पर विरोधी थे। लेकिन दोनों एक दूसरे के प्रति उदार थे। दोनों के मन में एक दूसरे के लिए सम्मान की भावना थी। जीत-हार अपनी जगह है। रिश्ते अपनी जगह हैं।

English summary
when Former Prime Minister Rajiv Gandhi helped to Atal Bihari Vajpayee secretly
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