पाकिस्तान में बाढ़: किसानों ने कहा, 50 साल पीछे चले गए

बाढ़ के पानी में डूबे खेत

नई दिल्ली, 5 सितंबर। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के किसान अशरफ अली भांबरू कहते हैं, "हम 50 साल पीछे चले गए हैं. सिंध में 2,500 एकड़ कपास और गन्ने की फसल तैयार थी, लेकिन बाढ़ आ गई और वह तबाह हो गई."

जून के मध्य से अब तक 1,250 से अधिक लोग मारे गए हैं और साढ़े तीन करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं. रिकॉर्ड मानसून बारिश के कारण आई बाढ़ में सिंध सबसे अधिक प्रभावित प्रांतों में से एक है.

सिंधु नदी प्रांत को दो भागों में विभाजित करती है, जिसके किनारे हजारों वर्षों से खेती की जाती है और सिंचाई प्रणाली 4,000 ईसा पूर्व की है.

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दो समस्याओं से जूझ रहा सिंध

मौजूदा समय में सिंध दो समस्याओं का सामना कर रहा है. प्रांत में रिकॉर्ड बारिश हुई, लेकिन बारिश का पानी नदी में नहीं बह सका, क्योंकि सिंधु नदी पहले ही लबालब थी और उत्तर में सहायक नदियां भी भर गई थीं और कई जगहों पर तटबंध टूट गए.

भांबरू का कहना है कि एक समय में लगातार 72 घंटे बारिश हुई और अकेले खेती में 27 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. उन्होंने कहा, "यह उर्वरकों और कीटनाशकों की लागत थी. हम मुनाफे को तो इसमें शामिल भी नहीं कर रहे हैं, जो काफी अधिक होता क्योंकि यह एक बंपर फसल थी."

जब तक बाढ़ वाले खेतों से पानी कम नहीं हो जाता, भांबरू और उनके जैसे अन्य किसान सर्दियों की गेहूं की फसल नहीं उगा पाएंगे, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है.

सक्कर शहर से 40 किलोमीटर दूर सामो खान गांव में अपने खेत में उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "हमारे पास केवल एक महीना है. अगर इस दौरान पानी नहीं निकलता है तो हम गेहूं की खेती नहीं कर सकते."

पाकिस्तान सालों से गेहूं के उत्पादन में आत्मनिर्भर था, लेकिन हाल ही में वह यह सुनिश्चित करने के लिए आयात पर निर्भर रहा है ताकि उसके रणनीतिक भंडार के हिस्से के रूप में भरा रहे. दूसरी ओर पाकिस्तान आयात का खर्च उठा नहीं सकता है, भले ही उसे रूस से सस्ता गेहूं खरीदना पड़े.

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पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज भी

देश पर विदेशी उधारदाताओं का अरबों रुपये का बकाया है और पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को और अधिक उधार देने के लिए मनाने में कामयाब रहा. हालांकि यह कार्यक्रम बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई से कोसों दूर है और पिछले कर्ज की किश्तों को चुकाना मुश्किल है. एक अनुमान के मुताबिक देश को बाढ़ से अब तक 10 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. सक्कर से समो खान गांव तक का सफर बाढ़ से हुई तबाही की भीषण तस्वीर दिखाता है. कुछ-कुछ जगहों पर तो जहां तक ​​नजर जाती है वहां तक ​​पानी ही नजर आता है और बाढ़ वाले खेतों में कपास की फसलें देखी जा सकती हैं, जिनके पत्ते खराब हो गए हैं.

सक्कर से 30 किलोमीटर उत्तर पूर्व में सालेहपत के एक किसान लतीफ दीन्नो ने कहा, "अब कपास की फसल को भूल जाओ." बाढ़ का खामियाजा भले ही बड़े जमींदारों को उठाना पड़ा हो, लेकिन हजारों खेतिहर मजदूरों को विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.

सूबे में फैले गांवों में बहुत से मजदूर खेत में काम कर पैसे कमाते थे और जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर फसल उगा कर अपना जीवन यापन करते थे. अब वे भी पानी में डूबे हुए हैं और हजारों लोग बाढ़ में डूबे अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित ठिकानों पर चले गए हैं.

अपने परिवार के साथ फसल उठा रहे एक मजदूर सईद बलूच कहते हैं, "अब चुनने के लिए कुछ नहीं बचा है."

बाढ़ से न सिर्फ किसान प्रभावित हैं, बल्कि इस क्षेत्र से जुड़े सभी लोग चिंतित हैं. सालेहपत के एक कपास व्यापारी वसीम अहमद ने एएफपी को बताया, "हम तबाह हो गए हैं." इस क्षेत्र के अन्य लोगों की तरह वसीम ने कपास खरीदने के लिए एडवांस भुगतान किया है.

सामान्य तौर पर सिंध के कपास बाजारों में इस मौसम में चहल-पहल होती है, लेकिन इन दिनों एक अजीब सूनापन है.

एए/वीके (एएफपी)

Source: DW

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