Women reservation bill: सियासी दलों के लिए आसान नहीं राह, टिकट से लेकर चुनाव में रिकॉर्ड बयां कर रही चुनौतियां

महिला आरक्षण बिल के पास होते ही उत्तराखंड में भी सियासी दलों की रणनीति बदलनी होगी। महिला आरक्षण बिल के लागू होने के बाद लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा तक आधी आबादी को नए जोश और नए सियासी समीकरण के हिसाब से चुनाव में उतरना होगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि महिलाओं की राजनीति में जितनी सक्रियता है, वो ही काफी है या फिर और अधिक महिला नेताओं को चुनावों में सक्रिय होकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना होगा। लोकसभा में उत्तराखंड की पांच सीटें हैं। ​इनमें एक सीट एससी के लिए रिजर्व है।

 Women reservation bill: The path is not easy for political parties, from tickets to election records, the challenges are telling.

वर्तमान में लोकसभा में 5 सीटों में से एक टिहरी सीट पर महिला सांसद हैं। म​हिला आरक्षण लागू होने के बाद कम से कम दो सीटे महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी। खास बात ये है कि माला राज लक्ष्मी शाह के अलावा किसी भी महिला सांसद ने लोकसभा में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व नहीं किया है। कांग्रेस ने 2019 में लोकसभा चुनाव में किसी भी महिला नेता को टिकट नहीं दिया।

विधानसभा की बात करें तो इस बार 70 में से 9 ही महिला विधायक हैं। खास बात ये भी है कि टिकट के मामलों में भी भाजपा हो या कांग्रेस दोनों दल महिलाओं की दावेदारी में काफी कंजूस नजर आते रहे हैं। विधानसभा चुनाव 2022 में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ाने वाली सियासी दल कांग्रेस, बीजेपी और आप ने कुल मिलाकर 10 फीसद महिलाओं को भी टिकट नहीं दिए। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 5, बीजेपी ने 8, आम आदमी पार्टी ने 7 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया।

2022 के विधानसभा में आठ महिलाएं चुनाव जीतीं। इसमें छह महिलाएं भाजपा के टिकट पर जबकि दो कांग्रेस के टिकट पर जीतीं हैं। अब उपचुनाव में भी पार्वती दास के जीतने के बाद 9 महिला विधायक हो गई हैं। इससे पूर्व वर्ष 2017 में कुल 6 महिला एमएलए कांग्रेस की दो और भाजपा की 4 महिला प्रत्याशियों को जीत मिली थी। इसके अलावा प्रकाश पंत का निधन होने पर उनकी पत्नी चंद्रा प्रकाश पंत को उपचुनाव में जीत मिली थी। इस तरह 2017 में 7 महिला विधायकों ने प्रतिनिधित्व किया। 2012 विधानसभा में भी 6 महिला विधायक चुनकर आईं। लेकिन 2014 में हुए उपचुनाव में ममता राकेश के जीतने के बाद महिला विधायकों की संख्या 7 हो गई। 2007 में 4 महिला विधायक चुनकर जबकि एक नामित समेत 5 महिला विधायक​बनें। उत्तराखंड के पहले विधानसभा 2002 में 4 महिला विधायक चुनकर विधानसभा पहुंची।

महिला आरक्षण बिल को लेकर नैनीताल से भाजपा की विधायक सरिता आर्य ने कहा कि

महिलाओं के बारे में अगर कोई दल सोचता है तो वह भाजपा है। भाजपा हमेशा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करती आ रही है। यही वजह है कि चुनावों में भाजपा हमेशा महिलाओं को अधिक टिकट देती है। पंचायत में भी 50 प्रतिशत नियम लागू होने के बाद महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। अब संसद और विधानसभाओं में भी इसका असर दिखेगा और मातृ शक्ति का प्रभाव नजर आएगा। मोदी जी का हम सभी महिलाएं आभार प्रकट करती हैं।

हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस विधायक अनुपमा रावत का कहना है कि

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का सपना स्वर्गीय राजीव गांधी जी का है। सोनिया गांधी ने भी इसे समर्थन दिया और वे भी इसे जल्द लागू करवाने के पक्ष में है। लेकिन जिस तरह भाजपा की मंशा रही है। उससे ऐसा लगता है कि ये भी कहीं झुनझुना साबित न हो। महिला आरक्षण को इसी बार चुनाव में लागू कर देना चाहिए। सरकार जब नोट बंदी रातों रात कर सकते हैं, तो बिल को पास करवाकर लागू क्यों नहीं करा सकते हैं।

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