Badrinath: Vasant Panchami पर कपाट खुलने की तिथि होगी निर्धारित, जानिए क्या है वर्षों पुरानी गाडू घड़ा परंपरा
26 जनवरी को बसंत पंचमी पर बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि निर्धारित होगी। वर्षों पुरानी परंपरा है कि जब गाडू घड़ा टिहरी नरेश के राज दरबार में बसंत पंचमी के पर्व पर पहुंचता है तब कपाट खुलने की तिथि तय की तय की जाती है।

26 जनवरी को वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि निर्धारित होगी। इससे पूर्व परंपरा के अनुसार गाडू घड़ा (तेल कलश) सोमवार को जोशीमठ नृसिंह मन्दिर से पाण्डुकेश्वर योग बदरी मन्दिर में पहुंचा। योग बदरी मन्दिर में पूजन के बाद गाडू घड़ा नृसिंह मन्दिर से डिमर जायेगा। वर्षों पुरानी परंपरा है कि जब गाडू घड़ा टिहरी नरेश के राज दरबार में वसंत पंचमी के पर्व पर पहुंचता है तब बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय की जाती है।

बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय होने की वर्षों पुरानी परंपरा
बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अजेन्द्र अजय ने जानकारी देते हुए बताया कि बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खुलने से पूर्व परम्परानुसार गाडू घड़ा नृसिंह मन्दिर से योग बदरी मन्दिर पांडुकेश्वर में गाडू घड़ा पहुंचा। मंगलवार योगबदरी मंदिर पांडुकेश्वर में भगवान उद्धव कुबेर के मंदिर में गाडू घड़ा पूजन किया जायेगा। वर्षों पुरानी परंपरा है कि जब गाडू घड़ा टिहरी नरेश के राज दरबार में वसंत पंचमी के पर्व पर पहुंचता है तब बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय की जाती है। गाडू घड़ा(तेल कलश) का टिहरी नरेश के राज दरबार में वसंत पंचमी के पर्व पर पहुंचने से बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय होने की वर्षों पुरानी परंपरा है।

राजमहल में पिरोये गए तिलों के तेल से ही बदरी विशाल का अभिषेक होता है
टिहरी जिले के नरेंद्रनगर राजमहल में पिरोये गए तिलों के तेल से ही कपाट खुलने पर भगवान बदरी विशाल का अभिषेक किया जाता है। राजमहल में पीत वस्त्रों में सुसज्जित राजपरिवार से जुड़ी सुहागिनें तिलों का तेल निकालती हैं। तेल निकालने के बाद उसे एक घड़े में भरा जाता है, जिसे गाडू घड़ा कहते हैं। इसके बाद गाडू घड़ा (तेल कलश) यात्रा बदरीनाथ धाम के लिए प्रस्थान करती है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया टिहरी जिले के नरेंद्रनगर राजमहल से कलश यात्रा के प्रस्थान के साथ शुरू हो जाती है। वसंत पंचमी पर नरेंद्रनगर राजमहल में राजपुरोहित महाराजा की जन्म कुंडली देखकर भगवान बदरी विशाल के कपाट खोलने की तिथि एवं मुहूर्त निकालते हैं। इसी दिन तेल पिरोने की तिथि भी तय होती है।

जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर लाया जाता
परंपरा के अनुसार टिहरी रियासत (पूर्व में गढ़वाल रियासत) के राजाओं को बोलांदा बदरी (बोलने वाले बदरी) कहा जाता है। यही कारण है कि बदरीनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि एवं मुहूर्त राजाओं की कुंडली के हिसाब से निकाले जाते हैं। तेल कलश डिम्मर गांव स्थित श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर में रखा जाता है। गांव में पहुंचने पर तेल कलश की पूजा-अर्चना होती है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से चार दिन पूर्व तेल कलश को डिम्मर गांव से जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर लाया जाता है।
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परंपरा के अनुसार कपाट खोले जाते हैं
अगले दिन नृसिंह मंदिर से बदरीनाथ के मुख्य पुजारी रावल ईश्वरी प्रसाद नंबूदरी की अगुआई में तेल कलश के साथ आदि शंकराचार्य की गद्दी रात्रि विश्राम के लिए योग-ध्यान बदरी मंदिर पांडुकेश्वर पहुंचती है। अगले दिन यात्रा बदरीनाथ धाम के लिए रवाना होती है। इसमें गरुड़जी, देवताओं के खजांची कुबेरजी व भगवान नारायण के बालसखा उद्धवजी की डोलियां शामिल होती हैं। परंपरा के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त में बदरीनाथ धाम के कपाट खोले जाते हैं।












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