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उत्तराखंड में न्याय के देवता के मंदिर में श्रद्धालुओं का जागड़ा, शाही स्नान के लिए निकली पालकी

जौनसार बावर के महासू मंदिर हनोल में जागड़ा पर्व की धूम

देहरादून, 31अगस्त। जौनसार बावर क्षेत्र में महासू मंदिर हनोल में जागड़ा पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान देवताओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही। मंदिर को इस बार भव्य रूप में सजाया गया है। कोविड के बाद दो साल में यह पर्व धूूमधाम से मनाया गया। महासू मंदिर हनोल में जागड़ा मेले को इस बार राज्य मेला घोषित किया गया है, इसलिए हनोल मंदिर में बड़े स्तर पर मेला आयोजित किया गया।

जागड़ा पर्व पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ें

जागड़ा पर्व पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ें

जागड़ा पर्व पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ें
महासू चालदा देवता मंदिर में जागड़ा पर्व पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ें। मेले में उत्तराखंड के टिहरी, रवाईं, जौनपुर, हिमाचल प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। पहले दिन रात को जागरण, दूसरे दिन देवता की पालकी दर्शन के लिए मंदिर से बाहर आती है। महासू मंदिर हनोल में जागड़ा मेले को इस बार राज्य मेला घोषित किया गया है, इसलिए हनोल मंदिर में बड़े स्तर पर मेला आयोजित किया गया।

जागड़ा का अर्थ होता है जागरण

जागड़ा का अर्थ होता है जागरण

जागड़ा का अर्थ होता है जागरण। टौंस नदी के तट पर हनोल में स्थित महासू से सम्बंधित एक धार्मिक उत्सव मेले या उत्सव का आयोजन हनोल में महासू देवता के मंदिर में भाद्रपद के शुक्लपक्ष की तृतीया ,चतुर्थी को किया जाता है। जागड़ा उत्सव महासू देवता की विशेष पूजा होता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर रात भर पूजा पाठ स्तुति और जागरण करते हैं। सुबह पुजारी महासू देवता की मूर्ति को यमुना में स्नान के लिए बाहर लाते हैं। भक्तजन देवडोली का दर्शन करते हैं। देवता को यमुना और भद्रीगाड़ में बारी बारी से स्नान कराया जाता है। देवता की डोली को एक बार उठाने के बाद मंदिर में ही उतारते हैं। दयाड़ो वादन पर मंदिर में महिलाएं लोक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। मंदिर में पुनः स्थापना के बाद देवता की पूजा होती है। पूजा की समाप्ति के बाद व्रती व्रत ख़त्म करके भोजन करते हैं।

महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम

महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम

महासू देवता मंदिर में महासू देवता की पूजा की जाती हैं, जो कि शिवशंकर भगवान के अवतार माने जाते हैं। मिश्रित शैली की स्थापत्य कला को संजोए यह मंदिर बहुत प्राचीन व प्रसिद्ध हैं। महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम है और स्थानीय भाषा में महासू शब्द महाशिव का अपभ्रंश है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार,बावर क्षेत्र, रंवाई, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, बिशैहर और जुब्बल तक महासू देवता की पूजा होती है। इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मन्दिर को न्यायालय के रूप में माना जाता है।

मंदिर में हमेशा एक ज्योति जलती रहती है

मंदिर में हमेशा एक ज्योति जलती रहती है

महासू देवता के मंदिर के गर्भ गृह में भक्तों का जाना मना है। केवल मंदिर का पुजारी ही मंदिर में प्रवेश कर सकता है। यह बात आज भी रहस्य है। मंदिर में हमेशा एक ज्योति जलती रहती है जो दशकों से जल रही है। मंदिर के गर्भ गृह में पानी की एक धारा भी निकलती हैए लेकिन वह कहां जाती हैए कहां से निकलती है यह अज्ञात है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग,एएसआई के संरक्षण में है। मान्यता भी है कि महासू ने किसी शर्त पर हनोल का यह मंदिर जीता था। यह मंदिर देहरादून से 190 किमी और मसूरी से 156 किमी दूर है। यह मंदिर चकराता के पास हनोल गांव में टोंस नदी के पूर्वी तट पर स्थित है।

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