Uttarakhand में सावन 17 जुलाई से होगा शुरू, जानिए इसकी वजह, हरेला पर्व से है खास कनेक्शन

सावन या श्रावण ​भगवान शिव का प्रिय महीना है। 4 जुलाई से सावन शुरू हो गया है। लेकिन उत्तराखंड में 17 जुलाई सोमवार से श्रावण प्रारम्भ हो रहा है। इसी दिन लोकपर्व हरेला त्यौहार होता है।

सावन या श्रावण ​भगवान शिव का प्रिय महीना है। इसके पीछे की वजह माना जाता है कि भोले को जलधारा पसंद है। इस माह में भोले के भक्त शिव की उपासना कर जल चढ़ाते हैं और पूजा करते हैं। 4 जुलाई से सावन शुरू हो गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड में 17 जुलाई सोमवार से श्रावण प्रारम्भ हो रहा है। इसी दिन लोकपर्व हरेला त्यौहार होता है। जो कि प्रकृति को समर्पित है।

Sawan will start in Uttarakhand from July 17, know reason special connection with Harela festival

ज्योतिषाचार्य पंडित राम लखन गैराला ने बताया कि सावन की संक्रांति से पर्वतीय क्षेत्रों में सावन शुरू होता है। इसके पीछे की वजह पहाड़ी लोग सूर्य को मानते हैं। जबकि मैदान में चंद्रमा से श्रावण को मानते हैं। हिंदू धर्म में ज्योतिष गणना के अनुसार सूर्य मास और चंद्र मास होता है। जहां तक हरेला पर्व मनाने की बात है तो ​कर्क राशि पर जब सूर्य आता है तो हरेला पर्व मनाया जाता है।

हरेला को गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। हरेला सालभर में तीन बार मनाया जाता है, लेकिन सबसे विशेष महत्व सावन माह के पहले दिन मनाये जाने वाले हरेला पर्व की है। लोक परंपराओं के अनुसार, पहाड़ के लोग खेती पर ही निर्भर रहते थे, इसलिए सावन का महीना आने से पहले किसान ईष्टदेवों व प्रकृति मां से बेहतर फसल की कामना व पहाड़ों की रक्षा करने का आशीर्वाद मांगते थे।

हरेला सावन के पहले संक्राद के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं में इसे हरियाली व गढ़वाल क्षेत्र में मोल संक्राद के रूप में जाना जाता है। हरेला को लेकर मान्यता है कि घर में बोया जाने वाला हरेला जितना बड़ा होगा, पहाड़ के लोगों को खेती में उतना ही फायदा देखने को मिलेगा।

मान्यता है कि , हरेला से 9 दिन पहले घर के मंदिर में कई प्रकार का अनाज टोकरी में बोया जाता है और माना जाता है की टोकरी में अगर भरभरा कर अनाज उगा है तो इस बार की फसल अच्छी होगी। हरेला पर्व के दिन मंदिर की टोकरी में बोया गया अनाज काटने से पहले कई पकवान बनाकर देवी देवताओं को भोग लगाया जाता है जिसके बाद पूजा की जाती है। हरेला मानव और पर्यावरण के अंतरसंबंधों का अनूठा पर्व है। हरेला पर्व पर फलदार व कृषि उपयोगी पौधा रोपण की परंपरा है। हरेला केवल अच्छी फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि ऋतुओं के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।

हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है। पहला चैत्र माह में जब पहले दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है। दूसरा श्रावण माह में सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है। तीसरा आश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है। चैत्र व आश्विन माह में बोया जाने वाला हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है।

श्रावण माह में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता​ है। जो कि एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूं, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। इसे पूजा जाता है और परिवार के सभी सदस्य अपने माथे में लेकर सम्मान करते हैं।

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