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Monkey sterilization: उत्तराखंड में क्यों हो रही सिर्फ नर बंदरों की नसबंदी? जानिए पीछे का विज्ञान

Monkey Sterilization Uttarakhand: उत्तराखंड में बंदरों के आतंक से जूझ रहे लोगों को अब बड़ी राहत मिल रही है। प्रदेश में बंदरों की अनियंत्रित आबादी पर काबू पाने के लिए देश का सबसे बड़ा नसबंदी अभियान चलाया गया, जिसके नतीजे अब सामने आने लगे हैं। इस अभियान के तहत अब तक 1 लाख 19 हजार 970 बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है। उत्तराखंड वन विभाग के अनुसार, इस प्रयास से राज्य में बंदरों की आबादी में 24 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है।

बंदरों ने पहुंचाया खेती को भारी नुकसान

उत्तराखंड में बंदर लंबे समय से खेती-बागवानी के सबसे बड़े दुश्मन बने हुए हैं। पहाड़ी इलाकों में किसान फलों और सब्जियों की खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। बंदर न सिर्फ फसलें उजाड़ते हैं, बल्कि ग्रामीणों पर हमला करने से भी नहीं चूकते। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 15-20 वर्षों में बंदरों की आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, जिसमें पड़ोसी राज्यों से छोड़े गए बंदरों की भूमिका भी रही है।

Monkey Sterilization Drive in Uttarakhand

सिर्फ नर बंदरों की होती है नसबंदी

अधिकारियों के अनुसार, झुंड में रहने वाले बंदरों में केवल लीडर नर बंदर ही प्रजनन करता है, ऐसे में सिर्फ नर बंदरों की नसबंदी करना ज्यादा प्रभावशाली होता है। इस ऑपरेशन के दौरान बंदरों के शरीर में माइक्रोचिप भी लगाई जाती है ताकि भविष्य में उनकी पहचान हो सके।

बंदरों की नसबंदी पर खर्च और लक्ष्य

वन विभाग के मुताबिक, एक बंदर की नसबंदी और माइक्रोचिप लगाने में करीब 1,750 रुपये का खर्च आता है। साल 2025 में विभाग ने 40 हजार बंदरों की नसबंदी का नया लक्ष्य रखा है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष में बंदर भी शामिल

उत्तराखंड में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। गुलदार, हाथी और बाघों के बाद बंदरों द्वारा इंसानों पर हमलों की संख्या सबसे अधिक है। पिछले दो वर्षों में सरकार को मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित लोगों को 19.5 करोड़ रुपये का मुआवजा देना पड़ा है।

बंदरों की उम्र और आबादी पर अनुमान

भारत में पाए जाने वाले बंदरों की औसत उम्र करीब 17 साल मानी जाती है। हालांकि, बंदरों की सटीक जनसंख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन वन विभाग के अनुसार उत्तराखंड में इनकी संख्या ढाई लाख से अधिक हो सकती है।

अभियान बना मानव-जीव सहिष्णुता की मिसाल

यह नसबंदी अभियान अब देश की सबसे बड़ी मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व पहल बनकर उभरा है। इससे न सिर्फ बंदरों की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने में मदद मिली है, बल्कि कृषि और ग्रामीण जीवन को भी नई उम्मीद मिली है।

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