2 KM की खड़ी पैदल चढ़ाई के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया पहुंचे मां चंद्रबदनी मंदिर,जानिए सिद्ध पीठ क्यों है खास
Jyotiraditya Scindia: केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने देवभूमि उत्तराखंड के देवप्रयाग में सिद्ध पीठ मां चंद्रबदनी के दर्शन किए। ज्योतिरादित्य सिंधिया मां चंद्रबदनी मंदिर में पहुंचे और पूजा अर्चना की, इस दौरान उन्होंने मंदिर परिसर से खूबरसूरत दृश्यों के साथ हिमालय का नजारा मंदिर परिसर से देखा।
ज्योतिरादित्य सिंधिया 2 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई को पैदल तय करने के बाद सिद्ध पीठ मां चंद्रबनी के मंदिर पहुंचे। ज्योतिरादित्य सिंधिया मां चंद्रबनी के दर्शन करने और पूजा अर्चना करने के बाद काफी सुखद महसूस करते हुए भी नजर आए, वही इस दौरान उनके साथ देवप्रयाग से भाजपा विधायक विनोद कंडारी भी मौजूद रहे।

हेलीकॉप्टर से उतरे,पैदल चढ़ाई पार की
मंदिर से कुछ किलोमीटर पहले बने अस्थाई हेलीपैड पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का हेलीकॉप्टर उतरा जहां भाजपा विधायक विनोद कंडारी ने उनका स्वागत किया तो वहीं उसके बाद कार से सिंधिया मंदिर परिसर पहले उतरे,और फिर मंदिर परिसर की डेढ़ से 2 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई को पैदल सफर किया।
मन्नत होती है पूरी
सिद्ध पीठ मां चन्द्रबदनी में क्षेत्र के लोगों की बड़ी आस्था रहती है, मान्यता है कि जो भी मन्नत क्षेत्र के लोग मां चंद्रबदनी से मांगते हैं, मां चंद्रबदनी उनकी मनोकामनाओं को पूरा करती है। दूर-दूर से लोग मां चंद्रबनी के दर्शन करने के लिए रोजाना पहुंचते हैं।
धड़ की पूजा
चंद्रबदनी मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, हालांकि श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। यहां माता की मूर्त नहीं यंत्र रूप में पूजा होती है। चंद्रबनी मंदिर टिहरी जिले के देवप्रयाग में हिंडोलाखाल मोटर मार्ग पर लगभग 22 किमी दूरी पर है।
कैसे बना सिद्ध पीट
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता सती के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भगवान शंकर को छोड़ सभी को आमंत्रित किया। सती ने भगवान शंकर से वहां साथ जाने की इच्छा जाहिर की। भगवान शंकर ने उन्हें वहां न जाने की सलाह दी, लेकिन सती अकेले ही वहां चली गई। सती की मां के अलावा किसी ने भी वहां सती का स्वागत नहीं किया। यज्ञ मंडप में भगवान शंकर को छोड़कर सभी देवताओं का स्थान था।
शिव ने किया तांडव
सती ने भगवान शंकर का स्थान न होने का कारण पूछा तो राजा दक्ष ने उनके बारे में अपमानजनक शब्द सुना डाले। जिस पर गुस्से में सती यज्ञ कुंड में कूद गईं। सती के भस्म होने का समाचार पाकर भगवान शिव वहां आए और दक्ष का सिर काट दिया। भगवान शिव विलाप करते हुए सती का जला शरीर कंधे पर रख कर तांडव करने लगे। सभी देवता शिव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु से आग्रह करने लगे।
चंद्रकूट पर्वत पर सती का बदन गिरा
तब भगवान विष्णु ने अपना अदृश्य सुदर्शन चक्र शिव के पीछे लगा दिया। जहां जहां सती के अंग गिरे वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि चंद्रकूट पर्वत पर सती का बदन ,शरीर, गिरा। इसलिए यहां का नाम चंद्रबदनी पड़ा। कहते हैं कि आज भी चंद्रकूट पर्वत पर रात में गंधर्व, अप्सराएं मां के दरबार में नृत्य और गायन करती हैं।












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